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#माकंणडेय पु
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4 # माषा टीका सहित € ॥ णे ७ -<+- ¢ 1 4 जिसको- र १८६ \ अनेक पुस्तकों के रचयिभा रः ६ . बा ० इन्दावनदसि.बा०ए°ः एड-एछण्गार ` £ १६ 4 न 1 र बहुत शद्ध भोर सल हिन्दी भाषा ् त ६ अनुवादित किया । 1 १ ौ प (135 ( र ६ सुद्रफ श्रौर प्रकाशक ध (२ ध ख इवमरखढ हारडड र र ८ द्यामकाशी प्रेष £ € 4 मयुर । त 4 16 अथमवार ११०० 1 सच् १६५१ ई० [ मूल्य ४) ऋ र ! र >~ ०4८62८25 59८५8 | ऋ 2
ए) (षटवा ति तणठन्वाह 0४ प्तं 22351134 725 (प्ि)) 011 4 €€1110€1' 2014
माकंर्डेय पुराश। # भाषा रक्रा साहित # विषय-सूची
~~ न्द ~
श्ध्याय चिषय १ जेमिनिश्रषिका माकौरडेयजी से महा- भास्तके सम्बन्ध मे पाँच प्रश्न करना ` भरत्युत्तर खरूप मार्कणडेयजी का चु नाम अप्सरा को दुवांसाजी द्वारा ` शाप दिये जाने का चरणन करना २ कनक श्रौर कन्धरः नामक पक्तियो का
पृष्ठ [अ०
4
रा्तसङे साथ युद्ध श्नीर पक्चर्यो की उत्पत्ति ४
३ पर्सिया दारा शमीकसुनिको अपनेशाप “क्रा कारण बताया जाना, पर्चियों का ` ` विध्याचल पर्व॑त पर पर्टुचना 8 जैमिनि ऋषिका विध्याचलस्थ चासं ` पक्षियों के पास पर्हुचकर अपने पाचों प्रच करना, उनका उत्तर देते इषः - प्रतिय दवाय चलुच्धू ह अ्रचतार का वरन , ४ इन्द्र चिक्रिया क्रा वैन तथा द्रौपदी कार्पाच खामियोँ की पत्ती होने का कारण ६ वलदेवजी द्वारा ब्रह्म हत्या का वणेन तथा उसका कारण "७ विश्वामिन्नके कोप के कारण राजां हरिश्वंदर का साज्य-च्युत होना तथा ` , द्रौपदी के पुर्ोंकी उत्पत्तिका नंन ८ पत्तियों दवाय साजा दरिश्न्द्रकी कथां ` को वणन ६ विश्वामित्र श्चौर वशिष्ठ का क्रमशः ` बगला श्रौर सारस बनकर श्रापसमें
,“ धरोर युद्ध करना ह ' १० पितापुज संवाद (शमे मरणके ९८४८
र
५ |
जीव की गति चौर दशा का वर्णन ११ पितापुत्र संवाद (गेम स्भंस्थ जीव ` "के दुखं का वरेन
५२
~
७
विषय
१२ पिता-ु्र सम्याद मे सौर्वादि नरकं का वर्णन
१२ राजा विपश्चित श्रौर यसमदूतका संवाद
१ यमरकिकर द्वार यह बताया जाना कि किस किख पाप से पीन कौन नरक मिसता है
१५ वैश्यराज विपश्चिवका सव नरफबालों के साथ स्वं गमन
१६ पतिव्रता ब्राह्मणी की कथा शौर शलु- सूया के पातिवतके महत्वका चरणन
१७ ब्रह्मा के छरंश से चंद्रमा, शिवके धंश से दुवांसा चनौर विष्के थंशसे दत्ता- त्ेयकी उत्पत्ति की कथा
१८ दन्तात्रेयजी की श्राराधना करने से देवतानां की दैत्यो पर विजय क्रा चरेन गग पि दाय
१६ दत्ताञेयी प्रकरण मे राजा कर्तंवीयं की कथा
२० राजा शनुजित के पुत्र ऋतध्वज का चृत्तान्त, उसका कुवलयाश्व नाम की उपाधि धारण करना
२९ शुवलयाश्वका पातालकेतुनाम राच्तस दती मारकर पाताल में मदालसा स चिवाह करना
२२ मदालसा वियोग
२३ नागराज श्मश्वतर के प्रयत्न से पुनः अदालसाकी उत्पत्ति श्रीर कुचलयाभ्य का नागराजके धर जाना रादि त
२७ कुवलयाश्व का नागराज अश्वतर से मदालसा को प्राप्त करना
२९ मदालसा को पुत्र-पासि तथा उखको
बदलानेके मिखसे मदालसयाका पुश्को
(५,
६८६
६१ ६६
१०३
१११
० विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ निर्ममात्सक उथदेश करना ११४ त खष्टिका विस्तारपूर्वक घर्ण॑न १८० (द मदालसा के तीनो पुर्न का विरक्तो 8 ता के आदि मे मद्यो की दशा जाना, चौथे प्र को मदालसा का ह तितं ११४ | ५० स्वायम्मुवमज॒ शरोर श से श्रनेक !७ मदालसा का भ्रपने ष्वौथे पु श्रलकै ' सन्तत छो त र ब्रह्माजीका से राजाश्नौका कर्म वयन करना ११८ ० नामी यक्तको अचुशासन व ए८ मदालसा का अलकँके परति वणांश्रम ५१ ड्खदरूप दुःख की सन्तान, उसके ध्म का वर्णन करना ५6 १९१ ११ गीर यण, ९९५ २६ ग्रहस्थ धर्मका सविस्तर वर्णन 9 ५ ३० पञ्चयक्ष, जातक, नैमित्तिक क्रिया, [ स्वायम्धुव मन्वंतरका परारम्म-१ | रौर राद्ध च्रादि का चरन १२६ | ५३ मन्वंतर की संख्या ्नौर सातो द्वीप ६१ पार्वण श्राद्ध की विधि १२८ का चृत्तान्त २०७ ३२ राद्धं मे बज्यावज्यं का वरन १३२ | ५४ पृथ्वी श्रीर दीपो का माण, सखसुद्ध ३३ तिथि श्रौर नक्त के अ्रनुसार श्राद्ध पर्वत जीर जम्बूद्धीप का चन २०७ काफल १३४ | ४५ मन्दायदि पर्वतो का वणन १०६ ३४ सदाचार श्रादि व्यवस्थाका वणन १३५ | ५६ गङ्धावतारः की कथा २११ ३५ शृद्धाशद्ध श्नौर वज्याबर्ज्यका निर्णय १२३ | ५७ भारतवषे का विभाग वथा उसके ३६ मदालसा का श्रपने पुत्र श्रलकं को पवेत श्रौर नदियोका वणन २.९९ श्रन्तिम उपदेश देकर श्रपने पति श्८ भगवान कूम पर भारतवषं की स्थिति २९६ राजा ऋतध्वज के साथ तप करने के ५६ भद्राश्व, केतुमाल श्नीरः कर नाम वर्षो हेतु बन को जाना १४७ का बृत्तान्त २२९ ३७ राज्य चिन जाने पर अलकंको आत्म ६० किम्पुरुष, हरि, इलावसं, रम्यक् श्मीर विवेक दोना १४ दिरएमय नाम बपौका वणन २२३ ८ दन्ता्रेयजी का राजा अलक से [ स्वारोचिष मन्वंतर प्रारम्भ-२ | श्रात्मक्ञान कना १५० | ६१ प्क ब्राह्मण का हिमाचल पर्वतः पर ३६ दत्तात्रेयजी का ्रलकंके भति योगा- पहुंचना, बरूथिनी नाम श्रप्लया का भ्यासक्ा बरन करना १५२ उखपर आखक्त होना श्नौर ब्राह्यणका ४० योग की सिद्धयो कां वेन श्रीर् उखकी प्रार्थनाको कस देना २२४ योगियों का परब्रह्म मे मिल जाना १५६ | ६२ कलि नाम गन्धर्वं का ब्राह्मण रूप हो ७१ योगिचय्या _ „ १५६९ कर बरूथिनी से भोग करना २३० ४२ योगिधर्मे कार स्वरूपका वरन १६१ | ६३ वरूथिनी से स्वेचि नाम पक पुत्र ४२ सयु च्रादि अरिष्टो के लक्तण॒ दर की उत्पत्ति २३२ ४४ जड़ोपाख्यान की समाप्ति, खुबाह् शरीर | -स्वरोचि का मनोरमा, विभावरी श्नौर काशिराजका संबाद् ओर क्ञान पाकर कलावती आदि से विवाद दद. अलक का विरक्त दोजाना १५७८ ६५ हंखनी श्नौर चक्रवाकी तथा हरिण ४५ माकरडेयजी का करीषटुकिके भ्रति बरह्मा द्नौर हसिणियों का परस्पर वार्तालाप. . की उत्पत्ति का बरन करना ९७० तथा स्वरोचि का उसे सखुनना मेद ४६ मन्व॑तरो ओर देवता के वष की दद स्वरोचि के पुत्र स्वारोचिष के जन्म संख्या तथा बह्याजीकी ्रायुकाप्रमाण १७५ की कथा २३९ ` १० र्था जगत् की ६७ स्वारोचिष मन्वंतर के देवतान, उत्पत्ति का वशेन १७ अषियो चौर राजां ॐे नाम २७२
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छम विषय , पृष्ठ विषय , दम पद्चिनी नाम विद्या की अं निधियों ८७ चंडमुंड फे वध का चान्त ` 8 का वणन . २७३ | धद रक्तवीज चध ३: , ( ओौत्तम मन्वंतर का पारम्भ-र ) ८६ निष्म्म वध ३० ,६९ राजाउन्तमका अपनी पल्लीको त्यागना, ६० शम्भ वघ | ३९ एक बाह्ध्ए की खरी का खो जाना तथा ६१ सव देवतान छारा देवीकी स्त॒ति १. , उसको दंढनेके लिये ब्राह्मण का राजा ६र्देवी के चरित्र का मादात्स्यतथा ` सेप्राथना करना २७६ देवता को वरदान ~ ३९ ७० राजा के प्रयत्न से ब्राह्मण की खी ६३ राजा सुरथ नौर एक वेश्य का देवी ` .. कामिल जाना १५९१ की तपस्या करना श्चौर उन दोनों को ७१ राज्ञा उत्तम का श्रपनी खी को भी ` देवी का बरदान ३२४ , - ढंढने का प्रयत करना, इस विपय मे &४ दत्त खावणं लाम नवं मन्वंतर से . पक मुनि घे बा्तालाप २५४ रौच्य नाम तेरवें मन्वंतर तक का ` , ७२ तजमद्िषीकी पुनः पराति श्रौर श्रीत्तम चृत्तान्त तथा उन; मन्वंतरं के देव कै जन्मकीकथा २४६ तायो, ऋषियों श्रौर राजार्श्ो के ` ` ,७३ श्रौत्तम मन्वंतर के देवता, इन्द्र^षि =. नाम ( ६-१३) २२१ , ..श्नौर रताश्रोःके नाम २४६ | ^६५ रुचि नाम ब्राह्मण को विरक्त देखकर : .. ७४ तामस मन्वंतर की कथा (४) गद पतसे का उसको गृहस्थ धर्म का „^> 9 रेवत मन्वंतर की कथा (५) रद उपदेश देना ' दरद ` .७६. चाचुष मन्वंतर की कथा (६) २७० | ६६ रुचि कृत पितर्य की स्वति ३२९५ ७७ वैवस्वत मन्वंतर प्रारम्भ (७ ) &७ पितसेँ का वप्षद्ोकर वरदान देना ३२६ - ` वैवस्वत मु की उत्पत्ति श्रौर सुं । & रुचि का प्रम्लोचा नाम शरष्सया की का तेज शमन दोने की कथा ++ पुत्री मालिनी से विवाह करना श्रौर ७८ देवपिंछत सर्य-स्तोत्न तथा अश्विनी" उससे रौच्यनाम मञुका उत्पन्न होना ३३१ छमारो;की उत्पत्ति धियो २७६ | ६६ भौत्य मन्वन्तर धरारम्भ ( % ) ७६ तैवखत मन्वंतरे देवताओं, ऋपियो शातिमनि द्वारा भनि की स्तुति ३३२ श्रीर सजा के नाम २७६ | १०० भूति मुनि से भौत्य नाम ॒चीददवे ८० सावरिक मन्व्तर भार्म (८) मज की उत्पत्ति श्रौर उस मन्वन्तर इ मर््वतर के देवताओं, पिरयो के देवतान, ऋषियों न्नर राजाशोँ न्नर राजाश्चो के नाम ५ के नाम 1, च देवी माहात्म्य का ्ररस्न-- १०१ सूर्यं भगवान् कीं उत्पत्ति तथा उनके मधुकेटम वघ ५ ० स्वरूप का वणन ३४८ ८ महिपाञर की सेनाके चधकी कथा = >>> | ९०२ ऋग्, यजः, साम श्चौर श्रथवेवेद = ` न का र्स्| की उत्व दथ न व ४ ४ , २६४ | १०३ ब्रह्माजी दवारा सूं भगवाकी स्त॒ति दथ , ८५ श्म निशुंभका देवीको बुलानके लिये १०६ न्य खष्ट र व १ दूतमेजना, देनी प्रर दूतका संगा । <“ गास कौ उत्पत, ९ 9 = निथ॒म्म का रासो मे तल य॒, युध मे देव- दै देवी के न जाने पर शुस्भ शु 5 देवताच श्रौ दी श्रपने सेनापति धूम्रलोचन को देनी ताश्मा का पराजयः द ॥ की ् करने को मेजना धूरलोचन मातां ्रादिति का भगवान् सूयं की 1 युद्ध न ३०२ स्तुति करना 39४. ॥
का बध
# न श ` - कन = क = न ध,
.-घ |
य विषय सूयं भगवान् का अ्रदिति को वरदान देकर उसके गभं से उत्पन्न होना शरीर रान्तसों को पराजित करना
६ विश्वकर्मां द्धाय सूयं का तेज कम करिया जान
9 विश्वकर्मां दवाय स्यं की स्तुति
> स्यं भगवान् से अश्विनीङ्कमारो श्रौर रेवत सनु की उत्पत्ति; स्यं का माहात्म्य
६ राजा राज्यचर्खन की च्रायु-चृद्धि के लिये पजा दासा सथं की उपासना
० राज्यवद्धंन च उनकी प्रजाश्मौं की छ्यु का वद् जाना, सूयंका मादात्स्य
१ सु्ंवंश का अनुक्रम
२ राजा पृषध्र को कथा
३ रजा नाभाग की कथा (१)
8 राजा नाभाग की कथा (२)
५ राजा सुदेव का चरित्र
६ भनन्दन-नत्समरी चरि
७ मद्ाराज खनित्र की कथा (१)
पृष्ठ
२७५
2८०
श्मध्याय « विषय
९१८ महाराज खनिज की कथा (२) ११६ महाराज विर्विश का इत्तान्त १२० राजा खनीनेच का वर्णान
१२९ महाराज करन्धम की कथा १२२ वीक्षित चरि (१)
१२३ अवी्ित चरि (२)
१२७ अीक्तित चरित्र (३)
१२५ अवीक्तित चरित (४)
१२६ वीचित चरित (४)
१२७ अनीक्तित चरित्र (६)
१२८ अवीर्तित चरित्र (७)
१२६ मरुत्त चरि ( १)
१३० मरुत्त चरित्र (२)
१३१ मरुत्त चरि (३)
१३२ नरिष्यन्त चरित
१३३ महाराज दम क्रा चरित (१) १३७ महाराज दम का चरित्र (२) १३५ महारज दम का चरि (३) १३६ महाराज दम का चरि (४) १३७ पुराणएकी खमाप्ति श्नौर माहात्म्य
# हति शभम्भुयात् %
रि
श ॐ नमो भगवते बाहु र
माकरडेयपु भाषाटीका रदित
= सपद. €^
पहला अध्याय
नारायणं नमछृत्य नरंचैव नरोत्तमम् । च नरो म श्रेष्ठ नर, देवी सरस्रती देवीं सरवतींवैष = तथाव्यासक्रो नमस्कार करके जयरूप इस प्रन्थका दैवी सरसवर्तीचिव ततो जयमुदीरयेत् ॥ वणन करता हं । ष्यासजीः फे शिष्य, परम तेज
तपःसखध्यायनिरते माकंरडयं महामुनिम् । | बाले जैमिनि ऋषि ने तप बीर धम म युत व्यासशिष्यो महातेजा नेमिनिः पर्यपृच्छत। १। महामुनि श्रीमाक॑रड्यजीसे पृदा ॥९॥ हे महात्मन् !
भगवन् भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना । | अनेक विमल णवं खन्दर शाखो के समूह से युक्तं भारत श्राख्यान नाम महाभारत कथा की भवान्
एंमस्तमलेः शब्दैनानाशाखसयुचयः ॥ २॥ व्यास ने का है ॥ २॥ वह .पाचीनतायुक्त, पवित्र जातिशद्धिपमायुक्त साधृशब्दोपशोभितम् । | तथा पूर्वापर उक्तियों शरीर सिद्धान्तो से . परिपू पूल्॑पकषोक्तिसिदधान्त-परिनिष्ासमन्वितम् ॥ ३॥ दै ॥ ३॥ जिस प्रकार देवतां मे धिष्णु, मवुप्यो
विपदा मे ब्राह्मण चौर सव भूषणम प्रे चूडामरिै ॥ ्रिदशानां यथावि ब्राह्मणो यथा | तथा लिख प्रकार शदो सें वज्र शौर इन्दियों मे
भूषणानांच सर्वेषां यथा चृढामणिवरः ॥ ४॥| मन उम दै उसी भकार सव शासं म मदामारत यथायुधानां कुलिशमिद्धियाणां यथा मनः । | उतम है ॥ ५॥ श्रौर यहाँ (महामार मे ) धम, तयेह सनव्वशास्राणां महाभारतयुचमम् ॥ ५॥ श्रथ, काम, मोक आदि चारों पदाथ के परस्पर
अत्रायश्यैव धर्मश कामो मोक्षश्च वरयते । | सम्बन्ध का पथक् षृथक् वरन है ॥ ६ ॥ यदी घ्मशाख् है, यदी ध्रेष्ठ अर्थ-शाख तथा कामश
परस्परारुवन्धा् सानुबन्धाथ ते प्रथक् ॥ ६॥ रीर उत्तम मो्ञ शाख है ॥७॥ हे महाभाग ! धर््मशाद्धमिदं श्रेष्मर्थशास्रमिदं प्रम् । | महावद्धिमान् वेदव्यास ने समे चारों श्राभ्मों
1 & ८
कामशाल्लमिदश्राग्रयं मोक्षशास्रं तथोत्तमम् | ७॥ धमे, आचार व साधन का वर्णन क्रिया दै ॥८॥
हे तात ¡ उदारः आशय वाले व्यासजी ने इसका
1
[न # 4४
ध ‰ ष्ठ ६ चतुराश्रमधम्माणामाचारस्थितिसाधनम् । याव व वा वा
ˆ तथा तात श्रतं देतद्व्यासेनोदारकम्मणा व्यासजी का वाक्य एक नदी केसमनदहैजो
यथा व्याप्तं महाशाखं पिरोधेनाभिभूयते ॥ ६ । कतकैरूषी बतो को उखाड़ कर पोर देती है श्रौर ओ वेदरूपी पवेत से निकल कर प्रथ्वी को धूलि-
६ व्यासवाक्यनलौपेन इतकतरुहारिणा । व 011
ेदशेलावतीैन नीरनस्का मही ता ॥१०॥| वाक्य. (नदी के ) हसो ओ समान §, बङेबडे कलब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्वुनम् । | इतिदास कमल के समान ठ, कथा फैले हए जल
कथानिस्तीणंसलिलं काष्ण वेदमहाृदम् ॥११॥ ॥९१॥ हे भगवम् ! म उस महामारत की कथा फो तदिदं भएरदार्यालं बहुथ॒श्रतिविस्तरम् । । जे वदत छम से पूरं वथा वेदः शरीर चिस्तार
के सदश है तथा सम्पू वेद उसक्ता हदयङूप है "
। माकंण्डेयपुराख ० १
_____ ~
है तत्वरूप से जानने केः लि श्रापके पाक्त उपस्थित इश्मा दह ॥ १२ ॥ जगत् की. उत्पतति, स्थिति शौर संयम के आदि कारण जनादन ने' `
भासो त संयमं निगुण दोते इष्य भी किख प्रकार मचुष्य का श्व- सुदेवो नगत्सूति-स्थिति-संयमकारणम् ॥६२॥ तार क्या श्नीर वादेव कलाय ॥ १६॥ श्नौर
कस्माच पाणडुपुत्ाणामेका सा दष्दात्मना। ,. | राजा दुपद की त्री कृष्णा श्रथात् दरौपदी किस ' पानां महिषी कृष्णा त्र नः संशयो महान्।१४।| मकार पारड ॐ पाचों पुता की सानी हह इसमें. . पलं बतरेषो महाबल; । | मगरो वद्य सन्देह दै ॥ १४ ॥ छीर मदावलवान् ५4 वलदेवजी ने तीथै यात्रा करके किंस प्रकार ब्रह्म शीर्थयात्रामसगीन कस्माचकरे हलायुधः ॥१५॥ हत्यार्वी रोग की श्रौपधि छो १।९५॥ शरीर कृयश्च प्रौपदेयास्तेऽृतादारा महारथाः ।
द्रौपदी के पाचों ्रवियाहित इुमार जिनके श्रभि- सण्डुनाथा महात्मानो वथमापुरनाथवृत् ॥१६॥ व 1 | ध ॥ ५. विस्तरशो हरि ठ्दे स्वं (कथ एतत् सत्यं विस्तरशो ममास्यामिहाहसि । | छाप ^ ६६॥ तद सव ‹ कथा । सुभसे विस्तार पू्ेक कने के योग्य है । पभबनतो ूदवुद्ीनामनबोधकराः सदा ५३ ॥ १७; | राप सदा मूख को ज्ञान देने लि दै ॥ ९७ ॥ उनके इति तस्य वचः श्रुत्वा माकण्डेयो मदाुनिः। स षन ं दोषरदितो वन्तः समुपचक्रमे ॥१८॥ दोषों से रदित चचन जेमिनि पि से बोले 1१ `
तवतो इातुकामोऽदं भगवंस्त्वाएुपस्थितः ॥१२॥ शरसमान्मालुषतं भप्त निगणोऽपि जनाईनः |
यह वचन सुनकर महामुनि ` माकरडेय श्रगर्टो `
! माक॑रडय उवाच माकंरडेय चोले-- | (६ | एकरियाकालोऽ्यमस्माकं सम्पातो श॒निसत्तम । दे मुनिश्रेष्ठ ! यद श शनिक कार्य र करा
2 समय दै । यह खुमय निस्तार पूर्॑क कने का नी. विस्तरे चापि षकत्ये नेप कालः मास्यते ॥१६।॥ है ॥ १६॥ हे जैमिनि ! जो कथा श्राप सुभे ्ये तु वक्ष्यन्ति व्येऽ्य तानहं जेमिने तव ।
। कहलवाना चाहते हँ वद कथा मेरी दी सदश ` , तथा च नष्सन्दहं त्वां करिष्यन्ति पक्षिणः ॥२०॥॥| पत्तीगण श्पको. खनाकर श्चापका सन्देह दर दगा विबोष् सुतः सुलस्तथा । | भार = म वै भ्रष्ट पी पि्् निवोध, चु रषाः सगयाः श्चिताः ॥२१|।२९। द ल क वदान उ हाव पदशालानिह्नाने येपामन्याहता मतिः । | है, र वि्ाचल परवत करी न्दर मे रहते हे । विन्ध्यकन्दरमध्यस्थास्ताजुपास्य च पृच्छ च ॥२२)| उनके पास जाकर पो ॥ २२॥ परम चिद्धान् . एवसुक्तस्तदा तेन माकण्डेयेन धीमता । माकरुडेयजी से यद सुनकर पि श्रेष्ठ मिनि फे ^+ ॥२३॥ ह चकित होगये श्नौर वे बोलते ॥२२॥ - जभमान वाद्ये म ५ अतयदरुतमिदं ब्रह्मन् सखगवागिवं मालुपी । | दे बहन् ! यद अत्यन्त शाञ्च की वात है नि यत् पक्षिणस्ते पिङ्ञानमापुरत्यन्तदुर्लभ् ॥२४॥ ह सी दै येते चिकानी रिच्य्योन्यां यदि मवस्तष बानं इतोऽभवत्। | उतपच व क | कथ ्रोएतनयाः चन्त ते पतत्रिणः ॥२५॥ र पठ रोर के धच रिख मकार कहलाये ॥ २४ ¦ कथ द्रोणः भविरूयातो यस्य पुत्रचतुष्टयम् ।
1 तें धर्मानं शरोर यट द्रोए कौन है जिसके चारों पुत्र इतने | जातं शुवतां तेषां धम्मजञानं महात्मनाम् ॥२६॥|| शंणवान्, धमातमा, कानी तथा महात्मा दए ॥२६ ;. ` ~ .: माकंरडेय उवाच ` भाकैरुडेय वोले- न.
भ्यान. से सुनो, ` एक वार पराचीन काल भे व इन्द्र ्रण्सराध्ों फे साथ ` नन्दन बन मे थे कि. ।
{
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भ्र० ९ माकरुदेयपुराण १
शत्रस्याप्सरसांचैव नारदस्य च सङ्गे दैवात् नारदज्ी का भी वटँ समागम दगया ॥२७॥ नारदो नन्दनेऽयश्यत् एुं्चलीगणमध्यगम् । | नारद ने नन्दन बन 1 1 कर सुराधिरानानं तन्दुखासक्तसोचनम् श्रण्सरा्ं के मध्य भ वेढकर उनके सुखो को व पुर लापकतलोचनम् ॥२८॥| सस येष से ल सदे £ ॥ र श्र ने नर्षिवरिष्ठन दमत शचीपतिः । नारद ऋषि को देखते ही उठकर उनको सम्मान सत्स्थौ खक्वास्मे ददावासनमाद्राद् ॥२६॥| पूथ॑क श्चपना आसन खयं दिया ॥२६॥ श्रौर तं इष्ट बलत्रष्नसुत्थितं व्रिदशाङ्गना; । क ने भी बलब् के मारने बलि इन्द को भरशेुस्ताश्च देवर्षिः विनयावनता; स्थिताः । २०॥ ग त काभिरम्यदितः सोऽय न भणाम किया ॥,३०॥ अण्ससाघ्न से बन्दित दोकरः ॥ ; साऽ्यञुपाचष्ट शतक्रत। । | नारदजी वैरगये च्रौर इन्द्र॑ ते उनकी पूजा कर यथाहं कृतसम्भाषः कथाश्चक्रे मनोरमाः ॥२१।॥ मनोहर वातालाप से उनका सत्कार किया ॥ २१ ॥ ततः कथान्तरे शक्रस्तयुयाच महाघुनिम् । | बातचीत करने वीयि व 4 शा देयं ध कहा “श्ाज्ञा दीजिये क्रि आपको इच्छादसार देतां 1 तव यामिमतेति वै ॥३२॥ ष्यक गायन च मृतय खुनाया तथा दिखाया रम्भा वा मिश्रकेशी वाउव्वंश्यथ तिललोत्तमा। जावे" ॥ ३२॥ रम्भा, मिश्रकेशी, उशी, तिलोत्तमा, धृताची मेनका वापि यत्र षा भवतो रुचिः ॥३३॥ धृताची अथवा मेनका जिसपर भी श्ापकी रुचि एतच्छ ला द्विजश्रेष्ठो वचो शक्रस्य नारदः । हो ॥ ३२ ॥ इन्द्र का यदह वचन सुनकर दविजशेषठ विचिन्त्याप्सरसः पराह पिनयावनताः स्थिता५॥।२४॥
नारद विचार करे विनयपूर्वक चेटी र श्रष्सरा-
सर्वासां श्रो के पति वोक्ते ॥ २४॥ चुम सव म से जो श्रपने
ुप्माकमिहं व्वांसां रूपौदार्यगुणाधिकप्। | को रूप, सौदाय्यं शरीर शख की अधिकता मे प्रेष्ठ
आत्मानं मन्यते या तु सा रृत्यतु ममाप्रतः॥|२४।॥ मानती दो वहमेरे प्रागे नृत्य करे ॥ ३५॥ गुण
गुणस्मबहीनायाः सियिनाव्यस् नासि ब | रस स भिदीन छ मन्ड श चागधषटठानवन्नत् मृत्य वदी दै जो गुखः रूप, ध्वने खाद स क्त
ध, दृत्यमन्यदिडम्बनम् ॥२६॥| अन्यथा विडम्बना श्रथात् नकल मान दै ॥ २६॥
् भाकेरडेय उवाच माक्रडेय बो्ते- =
तदवाक्यसमकालश्च एकेकास्ता नतास्ततः । ता 9 स
५ ८ एक दूसरे के पति कटने लगीं भ ठमसे अ्रधिक
अहं गुणाधिका म त्वं न लं चान्याऽ्रवीदिदम्२७॥ यवान् ह! दूसरी कदतीथी कि त् नीं मे + तासां सम ; राजा इन्द्र ने उनका विश्वम देखकर नारदजी
घासः भ्रमसालोक्य भगवान् पाकशासन । | पदर पदी ददाम क्रि चन लप ओ अभिक
पृच्छ्यतां शुमिरित्याह वक्तायाबोयुणाधिकाम् ३८|| युणवाएली कौन दै ॥ ३८॥ इन्द्र के शब्द सुनने पर
शक्रच्छन्दालुयाताभिः पृष्टस्ताभिःस नारदः । | तथा शा त त ट व ने जो
जरि वाद्य जैमिनि ! बे सुभसे खनो ॥२६ ॥ खव
भोनाच ५ सिने र्ननी भे २९॥ पर्वतों मे शरे परवत पर तप करते हुए ुबांसासुनि
पप्मतति नगेन्द्रस्य या बः कषोभयते बलात् । | को जो च्छया श्रपने मन से लमा ले बी ससे
दुव्वाससं मुनिश्रेष्ठं तां बो मन्ये ुणाधिकाम्४०।| अधिक गुरवाली समसी जवेगीं ॥ ४०॥ ए
। { वेपितकन्धराः की यह यात सुनकर खव अण्सयापं कम्पित टोग
स्व तद्वनं ला सनन। पपितकन्धराः । | ओला कियद् वाल हमारी साम्य ते
शरश्यमेतदस्माकं न््रशश््रिरे कथाः ॥४१॥
। वार है ॥ ४१॥ फिर वयु नाम _चरण्छया जिखकी तत्रप्षरा वपुनाम भनिक्षोभणएग्िता । कि बहुत से सुनिर्यो को लभा लेनेका गव था चोली पल्युवाचाय यास्यामि यत्रासौ संस्थितो शुनि;४२॥
“जसँ बह सुनि दै बदँ म जां गीः" ॥ ४२ ॥ शरोर अयं तं 'देहयन्तारं परयुक्तन्दियवाजिनम् ।
काकि पि की देह मै श्रपने इन्द्ियरूपी छ्मभ्ब जोत कर कामदेव के वाणो का वाग लगा ,
र
ध माक॑र्यषुराण ्र०
-त्मरशख्रगलद्ररिमं करिष्यामि इसारथिम् । ४२ | कर उनको कुसारथी वना गी ॥ ४२ ॥ यदि ब्रह्मा,
धरह्या जनारनो वापि यदि बा नीललोहितः विण्ु अथवाशिवभीहों तो उनको भी काम- बल्या जनाईनो वापि यदि वा नीलल।हतः । | चां से वेधन करूंगी ॥ ४४ ॥ यह कहकर वह
तमप्यथ करिष्यामि कामबारक्तान्तरम् ॥४४।| श्य व परत पर इवास पि के आथ इत्युक्त्वा परनगासाथ प्रालेयाद्र वपुस्तदा । परजो करिपिकेतपके मभाव से श्रापत्तियां से नेस्तपःपमापेए प्रशान्तश्वापदाश्रसम् ।॥४१।, रष्देत था. गई 8 जहाँ दुवांसा 4 चां
लोकि महायनिः से एक कोस की दूरी पर बद श्रण्सा कोकिल के १ = यत्रस्े स महायुनिः। खमान मधुरता से गायन करने लगी ॥४६॥ उसके क्रोशमात्रं स्थिता तस्मादगायत वराप्सराः ।४६।|| गीत की भ्यनि सुनकर आश्चयं मन बाजे वे सुनि तद्रीतध्वनिमाकणएयै॒युनिर्विस्मितमानसः । | जरा बह खुन्दर युखवाली थी बां गये ॥ ४७॥ जगाम् तत्र यत्रास्ते सा वाला रुषिरस्वना ॥४७।] उस पाह अ्ण्छरा को देखकर सुनि स्वर्भित तांद चारप एनिः संस्तभ्य मानसम् होगये । फिर अपने लुमाये जानेका कारण जानकर
विणते व । क्रोचयुक्त दोगये ॥ ४८ ॥ श्नौर फिर उन तपस्वी ४ ज्ञाला पामषसमन्ितः ॥ 1४८। ॥ मदरपिं <| उससे इसे प्रकार कटा ९ ॥ ह द्मक्ाण
उवाचेदं ततो वाक्यं महर्षिस्तां महातपाः ॥४६॥ भ चिचरने बाली मूं ! यचयपि तू सुमे दुल देने ।यस्मादुदुःखार्ितस्येह तपसो विष्नकारणात्। | तथा मेरे तप मे विष्न डालने के लिये आई दहै । आगतासि मदोन्मतते मम दुःखाय सेचरि ॥५०}॥ तथापि तृत रपे दी लिये दुःख उत्पतन किया है ॥ तस्मात् इषणंगोतरे लं मत्ोथकलुषीकृता । | भरतपुर करो से कलक्ित दोकर परं पतते
= - गोज भे जन्म लेकर सोलद वर्षं तक जीवित जन्म म्स दुङञे याबदपांणि षोडश ॥५१।| रनौ ॥ ५९१ हे नीच श्लसः! पने स्वरूप बोः
(निनरूपं॑ परित्यज्य पक्षिणीरूपधारिणी । | छोडकर तू पचती रूप धारण करेगी श्रौर तुभे "चत्वारस्ते च तनया जनिष्यन्तेऽ्थमाप्सरः ॥५२।॥ चार पुज उत्पन्न होगे 1 ४२ ॥ फिर त उनकी परीति ] अपाप्य तेषु च भीति शच्पूता पुनर्दिवि ! | चोड़कर किसी शख दारा मरण पातत कर पवि
[नोच 8. 1 होकर खगं मे पडुचेगी 1 इसके उच्तर मे तुमको वासमाप्स्यसि वक्तव्यं नोत्तरं ते रथंचन ॥५२॥ य म कहना धिये ॥ ५६॥ क्रो से र्कवयं .
भावयित्वा वचनो को नकर वह अप्रा कम्पायमान गईं
तरततर्तरङगा गा परित्यञ्य विपः न श्रौर अपने खुन्दर खरूपको दोडकर विप्र दुवांसा प्रथितगुणगणोषां सम्भयातः खगङ्खा्॥ ५४ ॥॥ दारा कथित पदी का रूप दोगई ॥ ४ ॥
[५1 [४ ५ [९१ इति श्रीमाकण्डयपुराण में वपु शाप नाम प्रथम अध्याय समप् । ~ व ~ =+ ~
. . द्स्रा अध्याय्
। माकररडेय उवाच माकैरडेय वोलते - ` अरिषटनमिपुत्रोऽभूहर्टो नाम पक्षिराट् । अरिनेमि के पुन गरुद हष जो सव परियो
` गरुदुस्याभवेत् पुत्र! सम्पातिरिति विश्रुतः ॥ १ के राजाधे। गक्ड्का पुज मसिद्ध सम्पाती इया : तस्याप्यास।त् स॒तः शूरः एुपारर्थो बायुषिक्रमः। | ॥१॥ उसका पुर शूरवीर तथा पवन के समान
सुपाश्वेतनयः दुभ्मिः कुम्मिुतरः लोलुपः ॥ २ ॥ ४ इमा । छपाश्वं का :: ९५५५ तनयानास्तां ककः कन्धर एव् च ॥ ३॥ मलोलुप्े दो ध 1 भ
०.९
मारक॑र्देयपुराण
४.
१ ग्रै हि कड! कलासमिखर विद्येति विभुतम् ।
ददशम्बनप्रक्षं रक्षसं घनदाठुगम् ॥ ४ ›
-्रापानासक्तममल-सण्दामाम्बरधारिणम् । ( भार््यासहायमासीनं शिलाष्ट्टऽमले शमे ॥ ५। तददषटमात्रं कड्ेन रक्षः क्रोधसमन्वितम् ।
भरोषाच कस्मादायातस्त्वमितो ्ण्डजाधम ॥ ६ ।
सरीसननिकपे तिष्ठन्तं कस्मान्माुपसपसि ।
नेष धम्म सुबुद्धीनां मिथोनिप्यावस्तुषु ॥ ७।'
कड उवाच साधारणोऽयं शेलेन्द्रो यथा तव तथा मम ।
न्येपांचैव जन्तूनां समता भवतोऽ् का ॥८॥
माकैरुडय उवाच तुवाणमित्यं खड्गेन कङ्कं [चच्छेद् राक्षसः ।
रर्षतनवीभत्वं विस्फुरन्तमचेतनम् ॥ & ॥:
{ क्क विनिहतं शरुता कन्धरः क्रोधमच्छितः ।
विच् दूपवधायाश्च मनशक्रऽण्डनेश्वरः ॥१
स॒ गलया शैलशिखरं कङ्को यत्र हतः स्थितः| तस्य सङ्कालनं चक्रे भ्रतुरज्यष्स्य खेचरः ।
कोपमर्पं वितानो नागेन्धं इव निश्रसन् ॥११॥
जगामाथ स यत्रास्ते भ्रातृहा तस्य रक्षतः
पक्षवातेन महता चालयन् भूधरान् वरान् ॥१२॥ र पटाद दिल गये ॥ १२॥ क्रोध से र्तवशं ~
वेगाद् पथोदनालानि पिक्षिपन् क्षतनेक्षणः । क्षणात् क्षयितरत्रुः स पाभ्यां क्रातभूधरः पानासक्तमरतिं तत्र तं ददशं निशाचरम् । च्ाताश्रवक्तरनयनं हैमप्यंकमाश्रितम् सण्दामापूरितरशिखं हप्चिन्दनभूपितम् । केतकीगर्भत्रामैदन्ेरघोरतराननम् पामोरूमाभितांचास्य ददशांयतलोचनाम् ।
पतनी मदनिकां नाम पुंस्कोकिलकलंस्वनाम्॥।१६॥ नाम तेरी हरै. दै ॥ १६॥ क्रोध से मि | ॥ कल्थ॒र ते इख हालत मे उस राक्षस को , खोद. |
ततो रोपपरीतात्मा कन्धरः कन्दरस्थितम् ।
कन्धर '॥.३॥ कैलाश परयतं फे शिखर पर विज लीके समान प्रकाशमान् कङ्क रहता थो ! उसने एक वारः कमल के समान नेच वाले एक राक्तस को जो कुयेरकः श्रजुचर था देखा ॥७॥ बह मदिरा च्राडिके नशे मे चुर, स्वच्छ फूलों की माला तथा, खुन्दर चख पदिन दये श्रौर एकं रदच्छ एवं पवित्र पत्थर पर अपनी सी का सहासा लिये वैडा था ॥ ५॥ बह राच्स उस कङ्क को देखते दी श्रत्यन्त करोधित दोगया छरीर उससे वोला, “रे दुष. पत्ती, तू यहाँ किस तरह श्राया“ ॥ ६ ॥ श्रपनी खी के साथ वैदे हये सुभको त् क्यों देखता हे, बुद्धिमोनों का यह धमं नहीं है । त् निश्चय दी इसी चण वध कियो जने के योग्य है॥७॥ ` क कङ्क वोला- . यद पर्व॑त जनसाधारण् का दै, यद जैसा.तेय है वैसा दी मेरा है, च्नन्य जीयो का भी यह पव॑त है । इसे तुमको ममता क्यों इहई॥ ८॥ . - . मा्क॑रडेयजी चोल्ले- १
इख प्रकार कते हुये कङ्क को उस राज्ञस ने लरभर मेँ तलवार से कार डाला „ बह अचेत होकर गिर पड़ा श्रीर निर्जीव दोगया ॥ ६॥ कङ्क के वध को खूनकर पक्तिराज कन्धरः घ्रोधसे
मूचछित होगया रौर फिर अपने मनको स्थिर .
करः विजली के समान ददा ॥१०॥ बद् उस पर्त॑त
के शिखरः पर पषा जां कङ्क मरा हुश्रा पड़ा था, ; उख पक्षी ने बडे भाई का क्रियाकमं किया, ~ “
द् =€ ~ € # फिर कोध से श्रंखं विकृत करके सपं के समान ¦
चे
फुसकार मारने लगा ॥ ?१॥ वह बां की
चला जहां उसके माई की हत्या करने वाला, :
क्तख मौजूद था। उसके पंलो.की हवा से .2
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शे है जिसके पेखा वह पत्ती त्षणभर मे .. ˆ
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के समीप पर्हच गया श्रौर उसने श्रपने पंख _ `
॥१३।। पवेत को ढक लिया ॥ ९३ ॥ उसने बहा <. =
राक्तस को शराच के नशे मे चूर तथां सुख
वाई जं परः वदी-वड़ी आसो वाली, कोकिल? समान मधुर करट बाली उसकी पतनी ५1"
नेन को तमतमाये हये सोने के पलङ्गः पर भै ` ॥१४।। देखा ॥ १४ ॥ कूलो की माला पदिने, चन्दन, ; हये, नौर केतकी के पुष्प की सदश पीले +“ ‡ | ११५। बाले श्रौर.भयानक सुख वाले ॥१५॥ तश्रा जिस ``
६ माकेरडेयपुरास अ०२ ~ ~ सनम यथ्यख ॥१७॥ वैया देखा श्रौर उससे कटा, ^२ ट ! आरा, समसे छएव्राच सुटुष्ठात्मन्नेहि युध्य वै मपा यद कर॥ १७॥ जिस धकार दने भरे वड़े भं [स्मल्चयष्ठो मम भ्राता विश्रब्धो घातितस्त्वया। | को मार कर चैन क्या है उसी रकार मै भी ठक
¡ मदसंसक्तं दनम् नशे मे चूर को यमराज के प्रर भेजे देता हं ॥ १८॥ 4 नयिष्ये यमादनबर् ॥५८॥ जहाँ वि्बासयाती अथवा, वालक शरौर खीयावक वेश्वस्तथातिनां लोका ये च स्ीवालघातिनाम्। | जते ह वरदा दी त् सुभे माया जाकर श्राज
परास्यसे निरयान् सन्वौस्तांस्सरमध मया हतः १६॥ प्टवेमा ॥ १६॥
माकरडेय उराच माकैर्डेयजी वोले- त्येवं पतोनदरेण भोक्त' श्ीपन्निधौ तदा | इस प्रकार स्त्री के सामने पक्षिराज द्वारा धम- ५ ती काया हु वह रच्तस ऋोधितदो प्के प्रति बोला एसः करोधसमाविष्ट भ्यमापत पक्षणम् ॥२०॥| ॥ २०॥ हे पत्ती ! जिस ध्रकार मैने तेरे भाता का
दि ते निहतो भ्राता पौरुषं तद्धि दर्शितम् । | वध किया था उसी पकार तेरा भी पौर्प देखकर आमष्यद्च हनिष्येऽहं खडगेनानेन खेचर ॥२१॥| इस तलवार से तमे मारूगा ॥ २१९॥ “र नीच ४ पकती ¡ तनिक ठहर, ्षण॒भर मे तेरे जीवन का श्त तष्ट क्षणं न मे जीवन् पतगाधम यास्यसि । | दोगा” यह कहकर उस गक्तस ने जिसका श कालोच के ठेर फे समान था एक स्वच्छं तलवार (सयक्लाद्धनपुञ्ञामं धिमलं सदगमाददे ॥२२॥| हाथमे ध ॥ २२ ॥ इसके श्यनन्तर 4 प पतगराज पि य कन्धरः श्रोर यत्तं के राजा राक्षस में योर युद्ध ‡ पतः व. (क | हु जिस धकार कि गरुड़ श्नौर इन्द्रम इत्र था [भूच युद्ध॒मत॒ल यथा गरुड्-शक्रयीः ॥२२॥ || २३ | इसके वाद् उस यात्स ने कोधित दे. ।तः स राक्षसः क्रोधात् खड्गमागरिध्य वेगवत्। | तेजी से श्रङ्गारे के समान स्वच्छ तलवार को [4 (3 निर््वाणाङ्गारवर्चसम् कन्धरः = २४ पत्तियों य चेष पतगे्द्राय ॥२४॥ ( ष १ ¦ लडगं किरि भू पृथ्वी से कुद उदध॒ल कर उस ३ कोद्र तं खढगं | ध अ । | चोच से दस प्रकार उढा क्लिया जिख प्रकार रख व्त्रेण जग्राह तदा शरेढ्ः पृं यथा । सपं को ले लेता है ॥ २५॥ फिर पक्षिराज कन्धर क्त्रपादतलेमडक्त्वा चक्रे क्रोधमथांडनः । | ने चच श्चौर पवो के.वीच भे स्खकर उख तल- १ त ¢ को तोड डाला श्नौर {~ दोनों छन्द ५ स्मिन् भग्न ततः खड्गे वाहयुदधमवत्तत ॥२६॥| च १८६ अला = शाना स व ६ हुश्मा ॥ २६ ॥ फिर कन्धरः ने रत्तस को ्ै परत्मराजन ५ र रि = ५ । ` | वक्षस्थल से दवाया श्नौर उसके शिर हाय शरीर न्त्र-पाद-कररद्यु शरसा च्च वियोजितः | [२७ चैसें छो न्चोच से कार डला ॥ २७ ॥ उस याच्तस (स्मिन् विनिहते सा सरी सगं शरणमभ्यगात्। | भे मर जाने पर भय से समी हई उसकी स्वी ततने ह पत्ती की शरण मे आग ओर उसे बोली, “भँ कचित् सञ्ञातसन्त्रासा प्राह भाय्यां भवामि ते २८॥ तेशै स्त्री होकर षर" ॥२८॥ वह भरष्ट पत्ती मादाय खगशरे्टः खकः ग्रहमगात् पुन; । | जका भह न तोमरदीद्धुका था उख स्वी ६ कगे लेकर विजली को तरह वेग से अपने धर 0 स निष्कृतिं भ्रातुर्धच् टूपनिपातनात् ।२६॥| गया ॥ २९ ॥ इच्छानुसार रूप धारण कएने वाली न्धरस्य च सा वेश्म परापयेच्छारूपधारिणी। खीने ध वड सुन्दरं थीं श्रौर । ‡ शुष सूप वस्तुतः सनका की पुव्री थी कन्धरके धर {नकातनया सुभ्रूः सपण रूषमाददे ॥३०॥ आकर र रूप धारण करज्िया ॥ ३० ॥ उसी स्यां ख जनयामास ताक्षीं नाम सुतां तदा! | खी से वाती नाम की कन्या रत्पन्च इई जो कि
। निशपामनिवष्ुशं वपुमप्सरसां वराम् । बसा युनि के शाय की अग्नि से नयु नाम
ता्षीमिति अप्सरा कौ जगह पक्षिरी हो ग थी उसी का प्य नाम तदा चक्रे तार्षीमिति विहङ्गमः ॥२१।॥ नाम कल्धर ने ताकौ रकल ॥ ६१॥ डे द्विज षठ
श्र०२ । माकंण्डेयपुराण ७
0 , मन्दपालसताभासंशत्वारोऽमितव॒द्धयः । । । ५ ष पत्ती फे चार एु्र थे देखा क । जानो 1 उनमें ( उनके नाम ) जरितारि से लेकर जरितारिमभूतयो रन्ता द्विजसत्तमाः ॥३२॥ दो तक थे ॥ २२॥ उनम दोर् के साथ जो तेषां जघन्यो धम्मात्मा वेदवेदांगपारगः । | धमां्मा तथा वेद-ेदा्गमे पूरं था कम्धरने प्रपनी उपयेमे स तां ताक कन्धरालुमतेः शुभाम् ॥३३।॥| जन्द्री क्या ताक्ती का 0 ॥ ३२॥ ¢ कट खमय वाद तारत गर्भवती इहै शरीरः. सात ~ 9 गभ ५ ५ पस्यचित्वय किस्य तक्षी (० पखवाड़े अर्थात् सादे तीन महीने वाद वह रदे सप्रपक्षाहिते गभ इर जगाम सा ॥२४। गई ॥ ३४ ॥ उस समय वदाँ कौरवो रौर पांडवों हृरुपाण्डवयोयुद्धे वत्तमाने सुदारुणे । | म घोर युद्ध हो श्ा था! होनहार व॒ कार्थ -से भावित्वाशचैव का्यैस्य रणमध्यं पिवेश सा।।२५।|| बह रण के वीच.मे ति र ॥ २५॥ उसने सव ॐ दी + पृथिवीक्षिताम् रजिाश्राका तर, शकत श्रस्मालास पृर वह तत्रप्द्यत युद्ध प सपा पृः । _ | मीपण् एद इस प्रकार देखा जैसा कि देवताश्च त्यष्टिभिर्भीमं यथा देवासुरं रणम् ।॥२६॥ श्नौर
र ्रसुरो मे इश्मा था ॥ ३६ ॥ इसके वाद् उसने तत्रापश्यत् तदा शुद्धः भगद्त-किरीटिनो; । | भगदत्त नर श्र्यन का रद देखा डस निरन्तर निरन्तरं शररासीदाकाशं शलभैरिव ॥२७॥
तीरों से आकाश इस प्रकार आच्छादित होगया था जिस प्रकार टीदीदल से होता है ॥ २७॥ उस पर्थकोदण्डनिम्यक्तमासन्नमतिवेगवत् 1 | समय श्न ॐ धचष स (निकला इरा एक तीर तारित तव ठर भ्त्यन्त वेग से काले सपे के'समान तार्ती के पेट तस्या भहमदिश्यामं तचं चिच्छेद जाढरीम्॥२८।] मै चिद गया ॥२८॥ उसके पेड के फटने पर चंद्रमा भिम कोष्ठे शशांकाभं मभृमावर्ठचतुषटयम् । श र ८ ष गिर ¦ सावरोपलवात् डे रौर वह ५ रु की आयुषः सारे तू्तराशाषिवापतव् ॥३६।॥ वी पिर १ त: -* तत्पातसमकालंच. सुपमतीकाद्गनोत्तमात् । | गिरने के समय दी सुप्रतीक नाम उत्तम हाथी का पपात म॒हती घटा वाणसैञ्छिन्नेवन्धना ॥४०।|| वड़ा धरय भी वाण से ध के कारण गिरा ॥ समं समन्तात् माक्ष तु निर्भि्नपरणीतला । | बद् धरटा इस भकार धथ पर या 5 व् ॥ पेशितं ट्डे इष्टी उस पक्षिणी के ्रंडे उसके नीचे स्थित. लादयन्ती खगांडानि स्थितानि पिशितोपरि| ४१ गये) ध. पिर रा सद स मारे जां हते च तस्मिन् वपता. १ नरेश्वरे । पर कौरवो श्नौर पांड्थों की सेना मे वेडुत दिन बहून्यहान्यभूदुयुद्ध' इरुपाण्डवसेन्ययोः ।४२॥ तक घोर टच इत्रः ॥ ६ युध फे दोने ¦ इते युद्ध -धम्ब॑ुत्रे गते शान्तनवाम्तिकम् । | पर वमुच युर भ व ९ व ब -तोषान् श्रोतं उन्दने उन मदात्मा से वहत सी धमे की वाते भीष्मस्य गदतोऽेषान् शतु पर्मान् महात्मनः ०३|| खु ॥ ४३॥ दे दिजभे जैमिनि ! जद वरदे क घण्टागतानि तिष्ठन्ति यत्राडानि द्विजोत्तम । | चन्दर श्रडे रक्ते इ थे वदां दैवात् मीक ' आजगाम तद्देशं शमीको नाम संयमी ॥४४।| नामक ऋषि पड ॥ ४५॥ उन्दोनि पत्ती के 1 शन्दमशृणोचिचीङकची , - | ची प्रावाजे सुना परन्ु वालक क श्रस्पष् वाक्या, स तत्र शन्दमगृणोचिचीडचीति वाशताम् । ` | = त इ समभ म न शासक ९५॥ इसके बार्यादस्फुटवाक्यानां विहानेऽपि परे सति ॥४५।| वाद सुनि मै रपे शिष्यो समेत उस 2, ञमथर्षि; शिष्यसहितो घण्टायुत्पाव्य विसिपितः। | उढाया तो विस्मित होकर माच-पिपूविदीन उन |
९ क ~ ¢, + तरमात्- थ शिशकान् स ददशं च ॥४६॥॥ पत्ती के वों को देखा ॥ ४६॥ उनको पृथ्वी .परः मात् पिवरपक्षांध श ददश् ५०५ मयु देकर ` सुनिष्ठ शमीकी तास्ठु तत्र तथा भूम शमक मगृवान "^ | अपने शिष्यो से वोलते ॥ ४७॥ देवताश से मर्दित , दृष्ट्रा स विस्मयाषिष्ः भोवाचाुगतान् द्विजा्७७।॥| स्कर राच्तसों की सेना जव भागी थी उस समय
सम्यगुक्तं द्विजा्येण शक्रेणोशनसा स्वयम् । उनको भागते हुये देखकर जो ङ बाह्मण श्रेष्ठ,
[0 ५. 14 ५। १ [६ ॐ
८ माक॑रडेयपुराण ग्र०२.
र -----------------------------------~----- -----~--~--- ~~~
-- ------------- पललोयनपरं दृष्टा दैत्यसैन्यं सुरार्ितम् । त मन्तव्यं निव्त्वं कस्मादू्रनथ कातराः । उत्छल्य शौख्ययशसी इ गता न मरिष्यथ । | नश्यतो युध्यतो वापि तावद्भवति जीवितम् ।
यावद्धाताख्चजते पूल्वं न यावन्मनसेप्सितम् ।॥५०॥ ए भरियन्ते स्वे पलायन्तोऽपरे जनाः ।
।७८॥ शक्राचायं ने कडा था वह वडत ` ठीक था ॥ ध ॥ , श्भाग करन जारो, कातर होकर क्यों भागते हो? श्रता दौर यश को छोटकर काँ जाकर न मसेगे” ॥ ४९ ॥ अथ तक विधाता ने लिखा है युद करते बाला भी नहीं मर सकता } श्चपनी इच्छा ` से विधाता के प्रतिकरुल फोईै जीवित नदीं रह सकता ॥ १ ॥ कोई अपने र ममर इ है, ` , कोई भागते समय मरता है, कोड अन्न खाते समय भुज्न्तोऽ्नं तथेवापः पिवन्तो निधनं गताः ।\११।॥| तथा कोई पानी पीते समय मरता ॥ ५१ ॥ कितने पिल्लासितस्तथेवान्ये कामयाना निरामयाः दी चिल से, ठ चोर से, क विना वीमासी, अपिक्षताङ्गाः शश्च मेतराजवशं गताः ॥५२॥॥ उछ विना घान् क श्रीर कुछ हथियारों से यम्- अन्ये तपस्यभिरता नीताः परेतदपाङुगैः राज क घर पवते है ॥ ८६1 कषठ लोग तपे
स लीन इए तथा कु योगाभ्यास मे तत्पर टोते हण योगाभ्यासरताशवान्ये नेव | पापुरणयुताम् ॥४२॥ सृलयु को श्रत द्योते है ॥ ५३॥ प्राचीन कालमे इन्द्र ` शम्बराय पुरा क्षिप्तं वज इुलिशपाणिना
१1
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ने एक वार शम्बर नामक्र असुर को वञ् से छाती
हृदयेऽभिहतस्तेन तथापि न गृतोश्ुरः ॥५४॥ मे मारा था परु शससे बह अघर स्यु को भात तनैव सन क्जेण तननदरेण दानवाः । | गहा ॥ ५४ ॥ फिर उसी वज्र से उसी इन्द्र ने
सताने समय श्राने पर उस दैत्य को एक क्षणं मे मार प्ते कसे हता दैत्यास्तः गताः॥५४॥ व्याग कर वै दैत्य रण॒ करने को लौे॥ ५६॥ इन ति कवचः सत्यंकृतमेभिः खगोत्तमः । न इप ॥ ५७॥ हे बह्मशो ! कयं ररुडों का गिरना श -रक्तेभमेर £ 5 च मसि-वसा-क्तमूमेरास्तरणक्रिया ॥५८॥॥| उ ट ॥ हे ब्रह्मणो ! सर्वथा ये साधारण परती नरी हँ, श्ख एवशुक्तरा स तान् वीय पुनवंचनमत्रषीत् । | देखकर उन चालकों को लेकर श्रपने श्रा्रम को एयेनतो नङुलाापि स्थाप्यन्तां तत्र पक्षिणः||६१।|| धीक नहीं ॥ ६१॥ दे ब्राहमणो ! बहुत यल करने से तथापि यतः कत्तव्य नर, सर्वेषु कम्पु माग्य से जीवित हे ॥ ६२॥ तथापि सखव कमो मै ` व पतषणस्तान् । तठवटपमाभितातिरङ्ं | मनि मीरः दाय के जाने पर वेश्य,
£ नो ति डाला ॥ ५५॥ यद वात जानकर किं कोई भय नदीं पिदिलैवं न सन्त्रास; कचैन्यो तृ । | है श्रपने-त्रपने करव्यं धर लौटो । मरने के भयको पतो नि्टतास्ते दैत्यास्त्यक्त्वा मरणं भयम्॥५६॥ यो पू व ने श॒क्राचायं का वचन सत्यं कर . ५ कू खाया किं युद्ध मे रहकर मीये सत्यु को पराप पे युद्ध ऽपि न सम्पाप्ठाः पञ्चत्वमतिमाटुषे ॥*५७॥ + भ । काणडान। पतनं विभराः क धर्टापतनं समम् | कहां घरुटे का गिरना श्रौर कट मांस, मजा च रुधिर से भरी इ पृथ्वी मे , इनका वचना ॥४८॥ = ¢ नैते ऽ था न्पपक्षिणः ८ म्यत स्वे व नेते साम यप । 1 ( दैव षी श्रुता षडे समानय की, - रषेबुङ्ूलता महामाग्पमदर्थिनी ॥४६॥ दयोचक ह॥ ५६॥ यद कटकर उन व्यौ की श्नोरं निवत्तताभमं यात शृृहीतवा पक्षिवालकान् ॥६०।| लोट गये श्रौर वोले ॥६०॥ दयँ पर षिल्ली, मूक, , मराज्जारासुभयं यत्र नैषामरडनजन्मनाम् । | वाज ब च्छल रहते दों वदाँ इन पक्की स्थिति ` द्विः पिः बातियसनेन मायने कमि खकः] | भ्या रोता दै १ समप जीवों कौ रकता अपने कमे - यथैते म ५ हेती [4 व ध एप्यन्त चाखिला जीवा यथैते पक्षिबालकाः ६२॥| खे होतौ दै, जिस मकार ये प्री-वालकं शपते , नयन् पुरुपकारनतु वाच्यतां याति नो सताम् ६३।|| यल अवश्य करना चाद्ये । यत्व करजे से मनुष्य ' इति शुनिबरोदिता्ततसते एनितनयाः परि- | # धते डच कटनः ष नी रता दे ॥द३॥ इस ` 1 उन पक्छियां को नेक चुचों से सुशोभित श्रपने
श्रण्३ २ माकरडेयपुराण .&
"~~ --------- * ~~~" ~~~ ~~~
स चापि चन्यं मनसाभिकामितं प्रग मूलं कैसुमं फल कुशान् चकार चक्रायुध-श्र-पेधपां सेरन््-बवस्वत-नातवेदंसाम् ॥६५॥
ग्रपाग्पतेगीप्यतिवित्तरक्षिणोः समीरणस्यापि , वश्खः वृहस्पति, कुवर्, पचन, धाता-प्रेधाता
तथा द्विजोत्तमः। धातुर्धिधातुस्वथ वैश्वदपिकाः , श्रन् ब्रह्मा च विश्वदेवियो की च्नेक क्रिया
| फल, मूलः, पफल कशां आदि से परसंन्न मन दोकर विष्णु, मद्र. व्रह्मा, इन्द्र, खच, ग्नि तशा ॥ ६५॥
श्ुतिपयुक्ता विषिधास्तु सक्रियाः ॥६६॥ | से ब्रेदविष्टित पूजा की ॥ दद ॥ [न १ ० ¢ + नस्कोत्यत्नि इति श्रीमाकणडेयपुराण मे चरकोतवत्ति नाम हितीय यध्याय समा । ~ ॐ ~ -ॐ ~~ । तीक्षरा अध्याय मार्यगडेय उचा | मार्कश्डेयजी वोले- -हन्यहनि विपेन्ध स तेषां भुनिसत्तमः | स व त ५ र 11 चकाराहरपयसा तमा गुकषवा च पोषणम् ॥ १॥ पालन किया ॥ ¶॥ पका महीना वीत सो प
मासमनरेण जग्ुस्ते भानोः स्यन्दनवत्मनि । | चे यच्चे कौल पूर्वक मुनि बालको देखते.देखते कातूहनेषिलालाक्षदषएा भनिषैमारकेः ॥ २॥| णके दिन ण रथ १ उद ह ॥२॥ कररथ्कष पास हनि पृथ््रा श टश्च मरही सनगरं सराम्भानिधिसरिद्धराम् । | नगर, समद्र, नदी दाचि जो रुथचकथमाणां ते पुनराश्रममागताः ॥ ३॥ श्रपने श्रामो वै वयिस श्यागये ॥ व मदान् रमहानान्तयतान प पियोनिना आन्मा चाले पकी परिश्रम सरे धकरिंत दोगये .परल्तु श्रपञ्कन्तान्तसत्मानां महालानां व व्रनिञ्य भकदीपुतं ततर तेषां पमायत; ॥४॥| यमद दुध्रा ॥ ४ ॥ जयौ परर व ५ { परा धम्मन याच्या पर छपा करक धमर क तत्व वर्च क्रत , चऋपेः एिप्यानुकम्पाथं कतां श्यम् | व प प क त्या परदक्षिणं सय्यं चरावभ्यत्ादयन् ॥ ५। चरणो मे थणम किया ॥५॥ श्रौर बोले, ५ डे मुनि! अचु मग्णाहुोरानमोषिताः समस्या मुने। | यापने टमो योर स से वचाय ह लया दय ध ॥ स ४ ि ४ = पतला ऋर दमाय पल्नें क्या दइ श्रतेः हमार श्रववाम-ल्प-पयसा त्व नो दतां पता गुरूः 1६ ॥॥ दाना. पिना, यरश्रापदी दद ॥ जव दम गर्भ॑ रभस्थाना मूला माता पितर नैवापि फलिता। | म दी थे हमारी मातां मग चौर न मो पिता ग [1 , ने टी पाला । श्रापने टये पत्रः की त् दूध ‹ त्रया ना जौचितं दत्तं शिशव यन रक्षिताः ७ || पिला-पिलाकर पाला है श्रीर मासो रक्ता की है ॥ \ ितायघरततैजास्त्ं कमीणामिव शु्यताम् । | इस प्रश्वी पर च्ापका तेज अलय दे, कीर कीः | तग्ट सूखते हणः हमको आ्रपने हाथी के ध्ररटे गजघरुट सथरुसवाच्य कृतवान. दुःखरेवनम् ॥ ८ ॥ नीचे से निकाल कर दुःख से मखं किया है ॥६॥ ७ ह नोर्गो ने कथ यद्धं गवना! खस्थान् दक्ाम्यहं कदा क्व दम लोगों को चल की घ्ाप्नि होगी तथो अप कथं यद्ध युगवनाः स्स्थान् द्रक्ष्याम्यहं कदा | कारो सानि व र कदा भये मं पराप्रान् दर्ये शकषान्तर॑गतान॥ € ॥ इक्षो पर पटच कर कव दम चृ. ४४२५ | प्रयः सख परल्गे ?॥ ६) हमार खाभातिक क कदा मे सहना ऋन्विः परशुना नागुमेष्यति। ` हसश्नो क्व भितेगी, नान पकार की गर इत्यादि
पर्या पक्षनिनोस्येन सत्पमीयव्िचारिणम्. ॥१०॥॥ से चमारी सकनाईं कव होगी तथी हमारे ` पलां से
"ॐ ~ + [रि
१० माकर्डेयपुराण - अ०३
इवा कव निकल्लेगी १॥ १०॥ श्रव हम यह सोचते
इति चिन्तयता तात भवता भतिपालिताः । | है कि श्रापने दभा पालन किया है, अव दम बड़े परवरा; स्मः भवदा; || दोगये है रपा कर वताश्ये श्चापकी आक्षा का ते सामतं दाः सः वद्धः करवाम िभ९१ पालन कर ॥ ११॥ शमीक पि ने इस प्रकार
इत्युषि्वचनं तेषां श्रु संस्कारयत् सुटम् । | संस्कार्युकत शौर स्प उन पदों के वचनो को त्यै त खना ! उस समय ऋपि श्रपने शिष्यो व पुत्र कै शिष्यः परितः सवः सह धरेण शृ्गिणा ॥१२॥| स वेड हये थे ॥१२॥ इतूहलवश तथा सोमांचित कौतृहलपरो भूत्वा रोमांचपटसम्डरतः । | होकर ऋषिं ते तत्वपूर्वक उनसे उनकी उत्पत्ति उवाच त्वतो ब्रत भ्हृत्तेः कारणं गिरः ॥१३॥| का कारण पा ॥ १३॥ किसके शाप से तुम इस ् बिकृव रूप मे श्राय श्नीर ये रूप तथा वोलने की
क्स्य शापादियं प्रक्षा भवद्वि्विक्रिया परा । वि त सपि रूपस्य वचसैव तन्मे वक्तुमिह ॥१४।॥ बतलाश्नो ॥ ९४॥
पक्षिण उचुः पक्ती वोले- विपुलस्वानिति ख्यातः भागासीन्सुनिसत्तमः। दे सुनिवर ! धाण्वीन काल भे विपुलान् नाम
। का पक पुरु था जिसके दो पुत्र हये जिनमे एक तस्य पत्रहरयं जज्ञे स्षस्तुसयुरुस्तथा ॥१५॥| का नाम खुश शौर दूखरे का नाम तुम्बुरु था ॥ सुदृषस्य वथं पुत्राश्चत्वारः संयतात्मनः; । | सुरु के म जितन्दिय चार पूत हये । दम लोगों
वसय्विनयानार , _ | की विनय, आचार, भक्ति र न्रता सव॑दा "भक्तिनम्राः सदेव हिं ॥१६॥ पियो की सी थी ॥९६॥ तपस्या करते हये, तथा तपश्वरणसक्तस्य शास्यमानेन्द्रिस्य च । | इन्दि को जीतते हये हमारे पिता, हेम लिप वस्तु की अभिलाषा करते थे, उसी को उत्पादन,
घुभितुष्पादिकं सव्यं यच्ेवाभ्यषहारिकम् । | थे शमी के एल श्चादि जो भी व्यावहारिक वस्तुः
+ = थीं सव मौजूद थीं ॥ १८॥ एक दफा बह्म राजा एवं तत्राय घसतां तस्यास्माकल्व कानने ॥१८॥| शध र द थर व व्वमव
¦ विशालकाय, पंख दरटा हा, बुदापा छाया इचा आनगाम् महावष्पं भसपञ्षो जरान्वितः । तावि के से नेतर बाले तथा डरे इ्येसेपेसे रूप मँ
तामरे स्तात पष मूला सुरेधरः ॥१६॥ भे ॥ १९॥ ऋषभे खु के पास भो सत्यसादी
सत्य-शौच-क्षमाचारमतीयोदारमानसम् ] पावच्र, क्षमावान्, सदाचारल्क्त पव उदर चित्त
= थे, राजा इन्द्र शाप के भय से डप्ते हृष्ट से उनकी जिक्ञासुस्तृपिश्रषठमस्मच्छापमवाय च ॥२०॥ पक्ता के लिये श्रये ॥ २० ॥
। पच्युवाच इन्दररूषीं पत्ती बोला-- । . , =.
द्जन्द्र॒ भां धुधाषिष्ठं पिरातुमिहाद॑सि । दे वि्रबर महाभाग ! मं भित्था ओर जुधा
1 से पीडितः म चलने फिरने मे असमथ हे.
विंध्यस्य शिखरे तिष्ठन् पत्रिषत्ररितेन वै। | म विध्या्टल पर्व॑त की चोरी पर रहता था, बहा
ब नरि खे पक्षियेःके राजाने सुभे निकाल दिया अौर न्ट पतितोऽस्मि महाभाग श्वसनेनापिरंदसा ॥२२॥| मुभे इस मकार हटाया कि दै गिर पड़. ॥ २२॥
सोऽहं मोहसमाष्ष्ठ भूमौ स्ताहमस्फृतिः | |मैषक साह तक पृथ्वी पर श्रचेत पड़ा रहा ! स्थितस्तत्रा्टमेनाहा चेतनां प्राप्तवानहम् ॥२२॥ आर दिन सु चेत हआ ॥२२॥ होश श्राने पर परप्तचेताः श्ुषापिष्ठो भवन्तं शरणं गतः । | भूख से व्याङ्ल दोकर इुःखित मन हो आनन्द्-
= द ष रहित दशा मे साने की दच्छा से ्रापकी शरण मं स्याथी चेतसा व मयार्थ षिगतानन्दो दूयमानेन चेतसा ॥२४।॥| जया ह ॥ २8॥ हे बिमल मति वलते ! टे बाह्मण;
बाममते मलाए।य(चजञा मतिभ् । । मै ऋषि ! मेसो स्सा करने के निमित्त अचल मति
श्र०र्
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परयच्छ भक्ष्यं विमरपं भारयव्राक्षमं मम ॥२१
स एवेयुक्तः पोयाच तमिन्द्रं पक्षिरूपिणम् ।
भ्राणसन्धारणार्थाय दास्ये भक्ष्यं तवेप्ितम्।२६॥
। इत्युक्तां पुनरण्येनमपृच्छत् स द्विजोत्तमः )
¶ आहारः कस्तषार्थांय उपफलप्यो भचेन्मया ।
` स चाह नरमांसेन रसनिभ॑वति मे परा श्एपिरुबाच
माकंरुडेयपुराण
११
बलि टौ जाश्नो श्नौर मुभे भोजन को आदार दो
9
जिससे मेरी जीवनकी याजा का अन्त न दो ॥२५॥ दरस धकार करैः जाने पर ऋषि ने उन पत्तीरपी इन्द्र से का, “तुम्हारी इच्छृ्सार भोजनं तुमको भाण धारण करने के लिये दंगा” ॥ २६ ॥ वह ब्राह्मण शरेष्ठ यह फटकर उससे पदयनेलगे “तुम्हारे ज्ये कीनसः श्रादार दम प्रस्तुत करे “बह बोला कि मेरी ठि भद्ुष्य का मांस भक्तण करने से
॥२७॥| होती दै ॥ २७॥
ऋषि बोले
हे पत्ती ! त॒म्दारी कुमार वस्था तथा जवानी वीत चुकी है श्नौर श्व तुम इस दुदृापिकी श्रवस्था पर पर्हुच शेः हो ॥ २८॥ इस वस्था म मयुष्यों फी षएच्छाश्रों की समासि दोजातीदै । इस लिये दस वृखावस्था मे भी कयोकर तुम तमे निर्दय श्रात्मा बलि दो ॥ २६॥ कदां तुम्दारी बुढ़ा की ्रवस्था श्नीर काँ नरमांस सानेकी लालसा ? यह सत्य है कि दु की दुभावनाग्नों की शन्ति कभी नदीं होती ॥ ३० ॥ अथवा यदह कि मुभे इन सव बातों के कटने से क्या प्रयोजन है । जो कदु तमने माँगा है चट मुभे देना दी योग्यै ॥ ३१९॥ चह बराह्मण गिरोमणि ( खुश ) उससे पेखा कद करः तश्रा तदतुसार निश्चय करके टम -सवक्रो शीध बुलार हमारे गुणो की प्रशंसा करने लगे ॥ फिर विनय से शुके इये श्रीर भक्ति पूवक दाथ
कौमारं ते व्यतिकान्तमतीतं योवनश्च ते । वयसः परिणामस्ते वर्तते नूनमएडन ॥२८॥
यस्तिन् नराणां सर्व्वेषामशपेच्छा निवर्तते । स कस्भादृद्धभयेऽपि सुदशंसास्मको भवान्॥२६॥ कर॒ मासुपस्य पिरितं फ वयश्वरमं तव।
सर्व्वया} दृषमावानां प्रशमो नोपपद्यते ॥२०। श्मथया रषिः ममेतेन भोक्तेनास्ति प्रयोजनम् ।
मतिशरुत्य सद् देयमिति नो भावितं मनः ॥३१॥ ९. इत्युक्तवा तं स॒ विमद्रस्तयेति कृतनिधयः ।
शीघ्रमस्मान् समाहूय गुणतोश्तुपरशस्य च ॥३२॥ उवाच ुब्धहूदयो युनिवाग्यं सनिष्ठुरम् ।
पिनयावनतान सथनि भक्तियुक्तान कृताजल्षीन२२॥ ृतात्माना द्विजश्रेष्ठा ऋणेमुक्ता मया सह ।
जातं शर्सपयं बो युयं मम यथा द्विना; ॥२४॥ गुरुः पू्यो यदि मतो भवतां परमः पिता ।
ततः कुरत मे वक्यं निरव्यलीफेन चेतसा ॥२५॥ तद्वाक्यसमकलञ्च भोक्तमस्मामिरादतः { यद्यति भवांसतद्रै कृतमेवावधार्ताम्
ऋषिरुवाच
मामेष शरणं प्राप्ने विहगः शुत्दषान्वितः । युष्पन्मसेन येनास्य क्षणं क्षिमवलिति । तृष्णक्षयश्च रतेन तथा शीध्र' विधीयताम् ॥२७॥ चप ततो यं प्रव्यथिताः प्रकम्योदभूतसाध्वसाः । कृष कष्टमिति मोच्य नैतत् कम्पति चा्रुवन्॥३८॥| "यद् काम वदे कट का दै, हम से यद ` न कर्थं परमसीरस्य हैतोदेहं स्वकं बुधः । । दोगा ॥ ३८ ॥ दुसरे के शरीर के लिये.
६ ४.
उन्पच हुये श्रे ब्राह्मणों की तरद उत्तम सन्तान कलने योग्य दो तथा मेर ऋण से अभी मुक्त नदीं हुए दो ॥ ३४॥ जिख प्रकार शुर पूज्य दै उसी प्रकार पिता भी प्म पुच्य है । इसरिये ज मँ करं उसे विना किसी दल के कयो ॥ ३५॥ हम सच ने कटाकिजो कु आप चाज्ञा करगे उसको हम श्रादर पूर्वक शिरोधाये करेगे ॥ २६॥ ऋषि वोले-
यह परी भूख श्रौर प्या से व्याञुल होकर मेरी शर्ण मं राया है । वुम््ारे मांस से इसकी क्षरभरम दपि दोजावेगी यह प्ी तुम्दारे रक्त से ती दठृपा शंत करेगा इसलिये शीघ्र तैयार
॥२६॥
जोड हुये टम से खित हदय सुनिने निद्र च्चन ` कटने शुरू किये ॥२३॥ दे पुमो ! तेम मुके
जानो ॥ ३७॥ इसके चाद दम लोग वहत पित हृ तथा मय से कपि गये श्रौ यह वलि, .
^ ५४१
१ ` माकरुटेयषुराण
०३
ष णि व~ ---------------------- ~~ ~ ~ ~ - -- =-=
विनाशयेहुघातयेद्दा यथा ह्यात्मा तथा सुत५|२६॥
पिदःदेवमलुष्याणां यान्युक्तानि ऋणानि बे
तान्यपृङ्करते पुत्रो त शरीरमदः सुतः ॥४०॥
तस्माचैतद् करिष्यामो नो चीणं यत् एरातने
जीवन् भद्राण्यवापोति जीवन् पुण्यं कयोति च१
मृतस्य ॒देहनाशृशध धम्माचयुपरतिस्तथा ।
आत्मानं सर्व्वतो रश्यमाहु्स्मैषिदो जनाः।४२॥
तथं भुत्वा वचोऽस्माकं सनिः कोधादिष उलन्।
मोवाच पुनरप्यस्मान नि्हन्निव लोचनैः ॥४२॥
प्रतिह्ञातं यचो मयं यस्मान्नैतत् रिष्यथ ।
तस्मान्मच्छापनिर्धास्तिर्ण्यम्योनौ परयास्यथ।४४॥
एवशुक्छा तदा सोऽस्मास्तं विहङ्गमथात्रवीत् ।
अन्तयष्िमात्मनः कृत्वा शास्रतशौदुध्यैदेदिकम्४१५॥
भक्षयस्व सुविश्रव्यो मामत्र द्विजसत्तम ।
आहारीकृतमेतत् ते सया देहमिहात्मनः ।४६॥
एतावदेव धिपरस्य ब्राह्मणत्वं प्रचक्ष्यते ।
यावत् परतगनत्यग्रूय स्वत्यपरिषालनम् ॥४७॥
न यद॑कषिणावद्वस्तत् पुर्यं प्राप्यते महत् ।
कर्मणान्येन वा विमेयेत् सत्यपरिपालनाद् ॥४८॥
` इतयपेवंचमं श्रुता सोऽनतर्धस्मयनिभेरः ।
` भरयुवाच युनि शक्रः प्षिरूपधरस्तदा
| योगमास्थाय मेन त्यजेदं खं कलेवरम् ।
: जीबज्जन्तुं हि विभेद न भक्षामि कदाचन ॥५०॥
{ तस्येतद्टचनं श्रुत्वा योगथुक्तोऽमवन्धुनिः ।
तं तस्य नियं ज्ञात्रा शुक्रोऽप्याह स्वदेहभृत् ५१
[ भो भो विभेद वुध्यस्वुदध्या बोध्यं बुधात्मक ।
> जिह्ञासायं मयाऽयं ते अषराधः कृतोऽनय ॥५२॥
तत् क्षमस्व मलते का चेच्छा कियतां तव |
॥ पालनात् सत्यवावयश्य पतिर्मे परमा खयि॥५३॥ प
प्रय भृति ते ज्ञानसेनट्रं पादुर्भिष्यति।
५.
४
श्रपने शरीर को क्यो त्र करे? जैसा श्रषना शरीर दहै वेसा ही पुत्र का होता है ॥ ३६ ॥ मनुष्य मे पिवदेव का छरी तो पुर द्योता है परन्तु जो २, फक्त ख दौ उनको छुकाना चाये, पच को भाणो की वलि न देना चाये ॥ ४० ॥ दृसलिये हम पेखा लीं कर सकते, यदि जीवनहै तो शरीर केः कर्थाणके निमित्त वइुत पुरय क्रिया जा सक्ता है ॥ ४१॥ सर जाने पर तथा देह के नष्ट होजाने पर ध्मा का श्चुमाचरण किसर प्रकार होगा ? इसलिप ध्म के तत्व को जानने वाल्ञे पुरुषो ने कटा है किं पनी दे की सर्वथा रक्ता करनी चाहिये" ॥ ४२॥ ठमारा इस प्रकार चन सुनकर मुनि ने क्रोध से जलते हुए लाल-लाल आसं कर हम से कदा ॥४३॥ तुम लोगों ने पिले वचन देकर प्रतिक्ञा की यर श्रव कहते हो रेखा नहीं करेगे । इसलिए मेरे शाप से भरम टोकर परियों की योनिने प्ुचोगे॥४७ाहमसे यह कहकर वद स इन्द्ररूपी पक्तीसे वोले.“श्रपनी अंत्येषि शाख्राट॒क्रूल करके श्राद्ध किये लेता. ह ॥ ४५॥ दे पर्चिराज ! चकि तुमको विश्वास दिया जा चुका है इसलिए तम मुूको मकण क्ये श्रौर मेरी देह को अपना छहर वनाच्च ॥ णद ॥ विथ क्रा बाह्मशत्व तभी. तक समश्ना चाद्ये जव, तक कि वह पने वचन च सत्य का पालन करता है ॥४७॥ जो महान् पुरय यज्ञ करने, दक्षिणा देने रौर तप करने से भी नदीं होता बह केवल ब्राह्मणो दवारा सत्य चचन पालन करने दी से दो जाता है” ॥४८ ॥ तव उख ऋपि के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय को भाप हु पर्टीरूप राजा इन्द्र मुनि से यह वोले ॥ ४६ ॥ हे विप्रघर ! योग की शुरण लेकर शच इस शरीर को छोड दगा । श्रव म कभी किसी जीवं जन्तु को न खाङं गा ॥५०॥ उसके इस प्रकार वचन सुनकर सुरण मुनि ने योगाभ्यास दाय विचारा । उनके इस प्रकार निय को देखकर इन्दं अपने अदखली शरीर को धारण कर बोला ॥ हे व्राह्मण श्रेष्ट! त्प निष्पाप श्नौर बुद्धिमान श्राप च्रक्षनियो को वोध कराने बले है । शने परीक्ञा करने के हेतु यह अपराध च्पमे भिर पर लिया ॥ ४२) रतः हे स्वच्छ वुद्धिवालत महात्मन्! मुमको कमा करो । श्रापकी क्या इच्छा है १ उस की ५ जाय । ्रापके सत्य बचन पालन से त्राप मे मेरी दढ् भीति दोग है ॥ ५२॥ श्राज से
आपका शान इन्द्रं सस्वन्धी परगट होगा । श्राप
ष माकंण्देयषुरण । १२
तपस्यथ तथा धम्मे न ते पिष्नो भविष्यति ॥५४॥ तपस्या कीलिये, श्रापके धम मे कोई विध्नन इत्युक्तया तु गते शक्रे पिता कोपसमन्यितः 1 र न ध्र पू ने श्रपने पिता.से'हम शिर से परणम्य शिरसास्माभिरिदश्ु्छो महानि; ॥५५॥ कर यह वोले ॥ ५५॥ “हे पिता ! हे महान् तिभ्यतां मरणात् तात खमस्मकं महामते । ध 1 ९ जीधन भिय दै । हम तुमहसि दीनानां जीषितभियता हि नः ॥५६॥ समथ ह ॥ ४१ ॥ य 4 त्वगस्थिमांससङ्काते - पूयशोणितपूरिते । | श्रौर स्थिर से पूरं है इसमे श्रिक श्रासक्ति न कर्तव्या न रतिर्यतर तत्रास्माकमिं रतिः ॥४७' | दोनी चाहिये 1 दम इस श्रधिक रत होगे ॥५७॥ श्रुयतां च महाभाग यथा ल्लोको विद्यति । कमक्रोपादिमिदौपिरवशः प्रवलारिमिः ॥५८॥
हे महाभाग ! सुनिये, जिस तरह संसार मे हर णक्र प्राणी काम, क्रोध, लोभ, मोह श्रादि प्रबल शनुश्रों से मोहित होता हुश्रा घ्रवशदै ॥ ५८ ॥ यह शरीर पक महलके सदटशरै जिसम सदद् ॥ प्क कोड के सेमनि है चमडा जिसमे भीत समान हेः तथा मांस श्रौर रुधिर जिसका से , शरथात् प्लास्टर के समान हे ॥ ५६॥ शसक = वड़-बडे दरवाजे हं जिनपर स्नायश्रं का पहरा इसका जा जो उसके श्न्दर वरैखता है पुरुष दे ॥ ६० ॥ उसके दो मन्त्री है, वे है * . मे प्क दृसर के विरोधी मन श्रौर वुद्धि, जहां ५ णक दृखरे से भग्ने लगते हें बां यजाका ग : हो जाता दै ॥ ६१ ॥ उस राजा का नाश ` बहुतं ` वेगी चाहते हैः । उनमें काम, क्रोध, लोभ, प्रादि तथा श्रीर् भी दूसरे इस राजा के शत्र है | यदि राजा श्रपने द्वारो को वन्द करके रक्षा ५, हृ वेडता है तो वद स्वस्थ, वलवान् श्रौर भयः रहित होता द ॥ ६२ ॥ वह सुखी रहता है श्रौर शचश्रों से दलित नदीं दता है ॥ ६४ ॥ यदि हं सव द्वा को ग्यज्ते रताद तो राग नाम | शचं उसके नब्रह्वार मे होकर प्रवेश करने षः इच्छा करता दै ॥ ९५ ॥ वह राग नामक शत्र ९ ` व्यप होत्ता ह्र पाँच द्वायों से प्रवेश चाहता मर उसक्रे साथ तीन शरीर शत्र उसके मां - छारा प्रवि होना चाहते दै ॥ ६६ ॥ वह् २ श्राभिक् श्रनकों यों से घुस कर मन तथा रिफिश्या स सहकारिता प्रात्र करसेता दहं ॥ ६ फिर वह इन्द्ियो शौर मन को वश प करके द्वासें को श्रधीन फर उस कोटको तोता है ॥ मन को उसक्षे श्राभित देखकर वुद्धि भी उसी म्रहो जाती है श्रौर फिर चेतन पुरुप चि मन्ञियो ऋ श्रकला स्ह जाताद् ॥६६॥ शस ¶# जिसके त्रश्च ने छिद्रों को प्राप्त कर लिया पेखा यजा नाण फो प्रात होता दै । यदतो
भन्नापराकारसंयुक्तमस्थिस्युणं परं महत् ।
चम्भैभित्तिमहारोधं मांसशोणितलेपनम् ॥५६। नवारं महायासं सव्यतः स्नायुवेष्टितम् । . ` सप्च ॒परुपस्तत्र चेतनावानघस्थितः ॥६०॥ ` मन्तिणौ ततस्य बुद्धिश्च मन्यव व्रिरोधिनौ ।
यतेते वैरनाशाय तानुमावितरेतरम् ॥६१॥ सृपस्य तस्य. चत्वारो नाशमिच्छन्ति विष्ठिपः। कामः क्रोधस्तथा लोभो मोहथान्यस्तथा रिपुः ६२॥ यदा तु स दृपस्तानि दाराण्पाृस्य तिष्टति । तदा सुस्थवलश्ैव निरातङ्क जायते ॥६२॥ जातानुरागो भवति रत्रमिनामिभूगते ॥६४॥ , यदा तु सरव्हाराणि विदतानि स शुश्चति । रागो नाम तदा शतूरनत्रादिदवारणृच्छति ॥६५। सर्वव्यापी महायामः पएश्वदारमवेशमः तस्याञुमागं विशति तद्र करं रिपु्रयम् ॥६६॥ परतरिर्याथय वं तत्रे द्वाररिन्रियसंज्गकः रागः संश्छेपमायाति मनसा च सहेतरः ॥६७)' हन्दिपाणि मन्यव ब्र कृतया दुरासदः ।
. द्वारि च बर खा भकारं नाशयत्यथ ॥६८॥ ` मनस्तस्याशितं द्रा युद्धिनश्यति तस्षणात् । अ्रमास्यरहितस्तत्र परवरगोभ्मितस्तथा ॥६६॥
रिपुभिर्लन्यधिवरः स॒गृपो साशगृच्छतिः ।
माकैएडेयपुराण
्र° र
~. - ~ -----------~
एवं रागस्तथा मोहो लोभः क्रोधस्तथैव च वर्चन्ते दुरालानो मदुष्यस्एृतिनाशकाः । एगात् कोधः भमि क्रोधाह्योभोऽभिनायते ७१॥ तोाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मतिषिभ्रमः)
अतिभ्रंशाद्युद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति७२॥
एवं भनष्ुद्धीनां र गलोभादुवर्िनाम् ।
गीविते च स लोभानां भरसदं कुरु सत्तम ॥७२॥
मोऽयं श्वापौ भगवता दत्तः सन भवेत् तथा ।
१ तामसीं गति कष्ठ व्रजेम मुनिसत्तम ॥७४॥ ऋषिरख्वाच
न्पयोक्तं न तन्मिथ्या भविष्यति कदाचन । १ मे वागतरतं पराह यावदध्येति पुत्रकाः ॥७१५॥ वमत्र परं मन्ये धिक् पौरुषमनथैकम् ।
काय्यं कारितो येन वलादहमचिन्तितम् ॥७६॥| शरनं रूप कायं का दिया ॥ ७६॥ अव जञ कि
स्मा युष्माभिरहं प्रणिपत्य प्रसादितः । स्मात् तिय्यंक्लमापन्नाः परं ्ानमषाप्स्यथ।७७॥
नदरितमारगाशच मिदध.तहेशकल्सषाः । स्सादादसन्दिग्धाः परां सिद्धिमवाप्स्यथ ।७८॥ वं शक्ताः स्म भगवन् पित्रा दैवशात् पुरा ।
त; कालेन महता योन्यन्तरणुपागताः | ताश रणमध्ये बै मता परिपालिताः । मित्थं द्विजश्रेष्ठ खगं सथुपागताः ॥८०॥ सयसाविह संसारे यो न दिष्टेन वाध्यते | ववैषामेव जन्तूनां दैवाधीनं हि चेष्टितम् ॥८१ | माकरडेय उवाच
ते तेषां षचः शरुता शमीको भगवान् मनि; । दयुषाच महाभागः समीपस्थापिनो द्विनान्॥८२॥ प्रेमेष मया भोक्त भवतां सम्नियापिदम् । पिमान्यपक्षिणो नेते फेऽ््येते ह्िजसत्तमाः । १युद्धेऽपि न सम्पाप्ठाः पश्चतमतिमानुपे ॥८२॥ 1; प्रीतिमता तेन तेभ्नङ्गाता . महात्मना ।
पुः रिलरिणां भेटं व्यं दुमलतायुतम् ॥८४॥
७०} | का दाल कदा इसी भकार मोह, लोम श्नौर क्रोध
को समना चाहिये ॥ ७०॥ मयुप्य की स्यति श्रथात् वुद्धि को नाश करने वाक्ते ये दुरात्मा रूप शरु हर समय भौजूद रहते है । राग से क्रोध होता है जौर कोध से लोभ दोता है ॥७१॥ लोम से मोद ओौर मोद से विश्रम दोता है । स्मृतिके विश्चम से बुद्धिका नाश होता है श्रौर वुद्धि नष्ट होने पर पराणः का श्रपदरण दो जाता है ॥ ७२॥ हे मुनिशेष्ठ ! हम नच बुद्धि वाल, सग श्नौर लोभ के पीले चलने बालों तथा जीवन के ल्लोभ करने बालों पर कृषा कीजिये ॥ ७३॥ टे मुनिवरः ! जो यह शाप ्रापने दिया है व्ह नदो नौर टम तामसी गति को प्राप्न हों" ॥ ७४॥ पि बोलते
“जो मैने कटा है वह कभी भिध्यानदींदो
| सकता । हे पुत्रो ! मेरा वाक्य आज तक मिथ्या "नदीं हुआ ॥ ७५॥ भ यहाँ पर पुरुपा से देवर को.
श्रधिक._ मानता ह्व जिसमे बल॒ प्रवेक युह.. वि तुमने सुभे प्रणाम कर भ्रखन्न किया है श्सलिमे तुम-
पत्ती योनि में प्रात दोकर भी परम ज्ञान से युक्त
| होगे ॥ ७७ ॥ ज्ञान द्वारा दिखाये हण जितने मागं
दै उनपर चलने से तुम क्तेश शौर पाप से रदित होगे । मेरे प्रसाद् से निश्चय दी तुम परम सिद्धि को प्राप्त होगे" ॥ ७८ ॥ हे भगवन् ! हे शमीक मुनि ! दैवयोग से पिता द्वारा इस भ्रकार शापित इए हम उस समय पक्षी योनि में पच गये ॥ ७६॥ हे द्विजवर ! हम रणभूमिमे.. श्राकर उत्यन्न हुए ओर श्रापने हमारा पालनकिया, इस धकार हम पक्तीरूप मे मौजूद हे ॥ ८० ॥ इसे संसार मे एेसा कोह नदीं है जिसक्रो प्रारब्ध से वाधा न परहची हयो । सव जीव-जन्तु -दैवके ही आधीन वतेन करते है ॥ ८१ ॥ मारकरडेयजी वोल्े-
दस प्रकार उनका वचन सुनकर महात्मा शमीक अपने पास वटे हुए शिष्यो से वोज्ञे ॥८२॥ मैने त॒म लोगो को पिले दी वताया था कि यद साधारण पकती नदीं है वरन्. कोई भरे जीष है जो किये माननी रणभूमिमे भी शल्यको प्राप्न इये ॥८३॥ पिर परेम पूर्ंक उन मदात्मा ने उन पक्तियां को देश किया कि पवतो मे श्रेष्ठ तथा पडो ओर लतां के सहित विध्याचल पर्वत पर श्राप लोग.जाद्धे ॥ ८४ ॥ हे पक्ियो ! वक्षं जाकर `
ननन न~" ~ --~------------------- ~~ स न~-- -----
० ४ माक॑र्टेयपुराण १५
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यावदद्य स्थितास्तस्मिननचले धस्पपक्षिणः । | श्नौर रहकर तप, स्वाध्याय श्रौर समाधिमे निश्चय.
तपःसाध्यायनिरताः समाधौ दृतनिधयाः ॥८१॥| रप से तस्र रदे ॥ ८५॥ इस धकार शमीक मनि इति निवरलन्धसत्तियासते मितनया बिह. वे पीर व ५ ~ न पोयेयत ४ । प मुन-पुत्र ` त्यन्त. गहनं [वभ्याचल. गत्वमभ्युपेताः। निरिवरगहनेऽतिपुएयतोयेयतमं वत पीड स अदौ अस्य पिशं सं शवा लघो निवसन्ति विन्ध्यप्९॥८६॥ था प्रसन्न गन से ण्टमे लगे ॥ ८६॥ ` इति श्रीमाक॑र्डेयपुराण मे विन्ध्य-माप्ि नाम तीसरा शरध्याय समाप्त । | -- >ॐ-०-€4-
चौथा अध्याय
मार्करडेय उवाच माक॑र्डेयजी वोल्े- ।
एवं ते दरोणतनयाः पक्षिणो ज्ञानिनोऽमवन् । दे मुनि जैमिनिजी । इस भकार वे दरोरके भुव पक्षी ज्ञानवान् हष श्रौर चव वे विध्याचल्ल पवेत
बसन्त इचरे निन्य ५ त ९.९ पर रहते है । उनके पाख जाकर पृथिये ॥१॥ ऋषि हृत्यषेवचनं शरुत्वा माकण्डयस्य जमिनिः । | माक॑रडेय ॐे यद बचन सुनकर जेमिनिओी विर््या- जगाम विन्ध्यशिखरं यत्र ते धम्पैपक्षिणः ॥ २॥ चल के शिखर पर गये जां वे धर्मरूप पत्ती रहते तन्नगासमभूतस्च शुभराव पठतां ध्वनिम् । ¦ थे ॥ २॥ उस पर्वत के समीप पहुंचकर उन्टोने
विसया सैमिनिः , पक्चियों की पाट-ध्वनि सुनी । उसको सुनकर विस्मय परनि! ! ३। {त < ~ शरुत्वा च चिन्तयामास जरि | जैमिनि मनि आश्चयांन्वित होकर सोचनेलगे ॥३॥
स्थानसोष्वसस्पन नितश्वासमविश्रमम् । | किये ष्ठ पदी विना श्वास रोके वदी सुषुता विरपष्टमपदोषञ्च पठ्यते द्विजसत्तमैः. ॥ ४ ॥ श्रौर सक्र से तथा दोष रदित पाड करते ह ॥४॥ तियोनिभपि सम्भकषानेतान् सुनिष्मारकान् । | इषौ 4 ष न युनि इमा को व | सरस्वती नदीं छोडती दै यदह वड़ा ्रा्चयं है ॥५॥ चिन्रमेतदह मन्ये वि नहाति सरस्वती + माई-वन्धु, मित्र श्रौर पभरियजन ये सव पने को वन्धुवरभस्तथा मित्र यच्च्मपर ग्रहे । छोड़ देते दै परन्तु सरस्वती नदीं = त्यक्तवा गच्छति तत्सव्वं न जहाति सरस्वती - ६॥ ह ॥ ६॥ इस प्रकार विचार करते हप जैमिनि ने इति स्िन्तयन्नेव विषेश गिरिकन्दपम् । पर्वत की गुफा में भवेश क्या श्मौर वहाँ परवेशकर
[* अ [२9 1] ९ गता । ७ । | कर पर्या को एक शिला पर वेट ह् देखा ॥७। रिर्य च ददशौसौ शिलापदगतान् दिनान् ॥ ७! | उन पियो को. दोष रहित उचारण से पठते &“
परतस्तान् समालोक्य एखदोपविबन्नितान । | देखकर जैमिनि वड़े पसनन हए श्रौर कुठ चिन्ता सोऽय शोकेन हेण सव्वानेवाभ्यमापत ॥ ८ ' | शक हो उनसे वोक्ते ॥०॥ हे शम परियो ! ९, ०.९ सवस्यस्तु बो दविनशेष्ठ समिति मां निवोधत्त। | कल्याण हो, मुमको व्यास शिष्य जैमिनि संममो
ध ¡ दशनोरसुकम् मै श्रापके दशनं की इच्छा से यदय आया हं ॥ ६। व्यासरशिष्यमनुप्ाघ् भवता द &। पिता कै क्रोचित होने सेजोश्राप लोग * ^
मन्युनं खल कर्तव्यो यत् पित्रातीवमन्युना । होकर पर्ति योनि मे प्रा इष्ट है इसका श्याल °
६ करना चाहिये, ~ ~ इच्छा थी पस् शप्ताः खगत्वमा५न्ाः स्वथ दिष्टमेव तत् ॥१०॥| मानना चाहिये ॥ १०॥ कुल के च्व्ये कं नाशं होः
¦ किल मनस्विनः । | पर बहत से सम्धान्त कल के लोग नीच कल ३ सीदे कले केचिऽनाताः मल लोगों से आश्रय पाति ह ॥ ९१॥ तपकं ची ह
्रवयनाये द्िजे्रात शव्रेण ससान्तिताः ॥१९॥ जानिपर जिन भधुप्योने दान दिया वे भीख मग दत्वा याचन्ति पुरुषा द्त्वा वध्यन्ति चापरे | चै, जिन्दनि मार है वे मारे जति ह तथा १1 “2 पातयित्वा च पा्यन्ते त एव तपसः ्षयात्॥९२॥ दूखणे को भिराया है वे गिरये ` जते ह ॥ १२
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४०, ६ = १८५६ 1;
१६ माकरडेयपुराण | अन -------------------------------- तदच सुबहुशो विपरीतं तथा मथा । ` | इस भकार मैने वहुतंसौ वाति परस्पर विरोधी देखी सच्दैस १ है । भाव मे च्थवा श्माव मे लोग निरन्तर व्या- [चामावसुर व्यङ्लं जगत् ॥१२॥ कुल हो ण्डे ह ॥१३॥ इस पश्र मनमे बिचार कर. ति सश्चिन्स्य मनसान शोकं कर्तमहथ | | याप लोग शोक नकर ज्ञानका फलदी यदहं
च्योकपरध्ष्य ध १४॥ कि-सख दुख मे समान रहे ॥ १४॥ इसके वाद नस्य फलमेतावच्यीकहपरघरषयता इन सव पर्चियां ने पाथ, दध्यं शादि से जैमिनि. समिर ७ तस्ते जैमिनिं सर्व्व पाद्ाघ्याभ्यामपूनयन् । प्रनामयञ्च पच्छः परणिपत्य महामुनिम् ॥१५॥ प्थोचुः खगमाः सर्वे व्यासशिष्यं तपोनिधिम्
कीं पूजा की श्नौग उन महाम॒नि को प्रणाम कर. उनकी कुशल पृद्धी ॥ ६५॥ फिर उन सव परक्षियों पखोपनिष्टं विश्रान्तं पक्षानिलहतक्ृमम् ॥१६ पक्ति उचुः
ने तथखीं योर व्यासजीके ष्य जमिनिसे जो कि सख से वेठ गये थे तथा जिनकी धकान पर्चियों ने श्रपने पंखोंकी हवा से दर करदी थी कटा ॥ १६॥ ` रर नः सफलं जन्म जीवितञ्च सुजीवितम् | पत् पयामः सुरषन्ध तव पादा्जद्वयम् ॥ ः पेत्रकोपागिरुटभृतो मो नो देहेषु वत्ते | मोऽ्व शान्तिं गतो विप्र युप्मदशंनवारिणा॥१८॥ कचित् ते दुशलं बहमन्नाश्रमे मृगपक्षिषु । ृेष्वथ लतागुसम-त्वकूसार-तृणनातिंषु ॥१६॥ प्रथवा नेतदुक्तं॒हि सम्यगस्मामिराहतं मृता सङ्कमो येषां तेषामङृशलं इतः ॥२०॥ परसाद्य इरष्वात्र ब्रह्मागमनकारणम् । देवानामिव संसर्गो भवतोऽभ्युदयो महान् ।
फेनास्मद्वाग्यगुरुणा आनीतो दृष्टिगोचरम् ॥२१। जामननिस्वाच
रयता द्विजशाद लाः कारणं येन कन्द्रम् । वरन्ध्यस्येहागतो रम्यं रेवावारिकणोक्षितम् ।
न्देहान् भागते शासे तान् प्रष्टुं गतवानहम्॥ २२ भकण्डेयं महत्मानं पूव्यं भगुह्लोददम् ।
मह् पृष्टवान् पाप्य -सन्दहान भारतं प्रति .॥२३॥ ¶ च पृष्टो मया पाह सन्ति वध्ये महाचले। णपुत्रा महात्मानस्ते बष्थन्त्यथविस्तरम् ॥२४॥
दवाक्यचोदितरेममागतोऽं महागिस् |
£च्छरुध्वमरेषेण श्रुता व्यार्थातुमहथ ॥२५॥ प्ण उः ` पषये सति वक्ष्यामो निर्धिशंकः शूरुष्व तत् ।
पत्ती लोग बोलते -
जो दोनों चरण कमल शआ्पके देवताश्रोंसे पूजित ह उनको आजे देखकर हमारा जन्म सफल होगया ॥ १७ ॥ हे विप्र ! पिताजी की करोधाननि में जलते इए टम इस योनि मे मौजूद दै । बह श्रनि आज श्नापके दशनरूपी ज॑ल से शास्त हुई ॥ १८॥ टे भगवन्. ! आपके आ्ाश्रम तरे श्रग, पकती, वक्त, लता, पुप्प, त्वकखार रौर ठण इनमे कोन सुखी नीं है श्रथात् सव कुशल दह ॥ १६ ॥ अथवा दमनं आदर पूर्वक ठीक नदीं कहा । जो श्रापके संगमं है उनका श्रमङ्गल कँ १॥ २०॥ -छृपां कर श्रपने शागमन का कारण वताद्रये । आपका संसग पेसा
+
है जैसे देवताश्च का । सम्भव है हेमारे भाग्योदयं से ही ्यापका नां हुश्ा हो ॥ २१ ॥ जैमिनि वोले- ठे शरेष्ठं पक्तियो ! सुनो, म जिसक्रार्णसे विन्ध्याचल पतेत कां इस कन्दरा मं जहा रवा ग का जल चिडका हुदै श्राया ह । पटाभारन म मुभे कई जगेह संदेह है उखको पृष्धने के लिये थात् उसकी निन्रत्ति के तिये मे आया हं ॥२य पिले मं भ्रयुङुलोप्पन्न महात्मा माकरड्यजी के पास महाभारत मं इप संदेहो को पूदने के लिये गया ॥ २३॥ मेरे पृद्ुने "पर उन्दने वताय कि चिन्ध्यष्वल पवेत पर द्रोण के महात्मा पुत्र रदतेहै वे विस्तार पूरक तुम्दे वतबेगे ॥ २४॥ उन्दी की परेर्णा खे म देस महा पवेत पर श्राया ह, श्सलिये आप व्रिस्तार पूर्वक उन संदेहो को सनिये श्चौर उनकी निचत्ति कीजिये ॥ २५॥ पत्ती वो्ते-
जो विषयो उसे निस्संदेद किमे हम उसको
ध्वं तन्न वदिष्यामो यदम इडुद्धिगोचरम् ॥५६॥। सगे श्नौर जो क इमास बुद्धि मेँ वेगा उसे
५ ध्र 1 द
चतुष्वेपि दि वेदेषु षर्ममशास्त्ेषु चैव हि ।
-माकौरुडेयपुराण
१ ७
क्यो न कगे ॥ २६॥ चारो वेद; वेदाङ्ग, धमशा
समस्तेषु तथागिषु यचान्यदेदसम्मितम् ,{.२७॥| तथा अन्य शाख जो वेद से सम्मत दै ॥ २९॥ हे
एतेए गोचरोऽस्माकं बुद्ध ब्राह्मणसत्तम ।
भतिङ्ान्तु समारोदुं तथापि न हि शक्तुमः । २८॥
तस्माषटदस्व विभ्वं सन्दिग्धं यद्धि भारते ।
` व्ष्यामस्तव धर्मत न वेन्मोहो भविष्यति ।२६॥
जैमिनिमवाच सन्दि्धानीह पस्तूनि भारतं भरति यानि मे । शृशध्पममन्तास्तानि शरुत्वा व्याख्यातुमर्हथ ॥३० करमान्पादुपतां भाप्नो निगणोऽपि जनाईनः ।
वासुदेवो ऽसखिलाधार; सन्ध॑कारणकारणम् ॥३१॥ ¦ | एँ की एकदी भायां द्रुपदं राजा की पुत्री.रृष्ण के हुई इसमे महान् संशय है ॥२२॥ महावलवान्
कस्माच पाणएडुपत्राणमेका सा दुपदात्मना ।
पश्वोनां महिषी कृष्णां समानत्र संशयः ॥३२॥ भप व्रह्महत्याया वलदेवो महाबलः । तीयेयात्राप्रसगेन कस्माचक्रे हलायुधः ॥२३॥
` कथंच द्वपदेवास्तेऽकृतदासा महारथाः ।
1
पणडनाथा मदात्मानो वधमापुरनाथवत् ॥३४॥
एतत् व्यं कथ्यतां मे संदिग्ं मारतं भरति ।
कृतार्थो सुखं येन गच्छेयं निजमाभमम् ॥२५॥
क्र पक्षिण उचुः नमस्कृत्य सुरेशाय विष्णवे प्रभविष्वे ।
पुरुपायाभमेयाय शाश्वतापाग्ययाय च ॥२६॥
€ द, चतुव्यहातमने तस त्रियुणापायुणाय च ।
वरिष्ठाय गरिष्ठाय व्रेणएयायामृताय च
यस्माद्रणुतरं नास्ति यस्मान्नास्ति दत्तम् ।
येन विश्पमिदं व्याघ्चमजेन जगदादिना ॥३८॥
. अरनि्माव-तिरोभाव-द्रा्विलक्षणम् ।
` छऋकूसामनयुद्विर् यक्ते; पुनाति जगत्रयम् ॥४०॥ परणिपत्य `! तथेशानमेकवाणविनिरधनतेः । ^ यस्यासौ विज्प्यन्ते न यस्िनाम्, ॥४१।॥'तमस्कार करक ॥ ५९ ॥ दन + `
- दन्ति थत् चष्टमिदं त्ैवान्ते च संहतम् ॥२६॥
ब्रह्मणे चादिदैवाय नमर्छृत्यं समाधिना ।
दिजवर ! वै सव हमारी बुद्धिगोचरः हैँ । इससे श्रतिरिक्त ज ज्ञान है बह भी हम श्रापको वता सकते हँ ॥ २८॥ हे धर्मक्ञ ! जो कुदे महाभारत म श्रापको संदेह दो हमसे कषठिये, वह दम श्रापको वताेगे श्रौर आपको संदेहरहित करेगे ॥ २६॥ जेमिनिजी वोले- व महाभारत शाखे जो धमे सन्देदं वे सुनिये छरीर उनको सुनकर उनकी व्याख्या कीकिये.॥२०॥ परमेश्वर जो निर्ण है तथा सवांधार श्नौर सव | कारणे; कामी कारश है व मुष्यत को प्रप्तहो कर वासुदेव क्यो कदलाया १।३१॥ पाड के पाचों
चलरामजीने घरह्म हत्या के पापसे मुक्त दोनेके लिये तीर्थयात्रा किस तरह की १।३३॥ श्रीर द्रौपदी के पोँचों पुत्र जो ऊुमार, मद्टारथी तथा महाता. थे श्रौर जिनके अभिभावक रपर से, पारडव लोग मौजूद थे, कर्योकर श्रनाथौ की मांति मारे गये १॥ ` महाभारत के परति ये सव सन्देह मेया दर ` करिये जिससे भें तार्थं होकर सुख से श्रपने आम ` को जाड ॥ ३५॥ पत्ती चोले- निव
सवस पिले देवताश्रौँ के स्वामी भमु विष्णु ' को जो पुरुष, श्रपमेय शाश्वत श्रीर श्रन्ययद हम नमस्कार करते दै ॥ १६ ॥ उनके चारं स्वरूप हे,वे निगण दै तथा गुणातीत है । वे -बडे शट, गरि, ' ञवर्श॑नीय तथा अमरः दै ॥ ३७ ॥ उनसे न तो को छोटा है श्नौर न वड्ा,श्रथात् वे सुरमातिसस्म ओर ` बृददाति वदत् द । उनसे सम्पूणं अगत व्यौ दे शरीर वे जगत के श्रादि कारण है ॥ ३८॥ जो जन्म
८
न्रौ मरण, दशय श्रौर अद्य से परे है रौर जिनसे सष्टि का आदि शौर चन्त है उनको नमः स्कार है ॥ ३६॥ पिर समाधिस्थ ब्रह्माजी को: नमस्कार करते है जिनके मुख से ऋक्, साम्, युद तथा श्रथ वेद निके है तथा-जो तीनो जगतो को पविच्च करते है .॥ ४०॥ उसी भरकर, शिवजी को जिनके पक वाण से यज्ञ, कएने बालं ॐ यज्ञा से श्रसुसो ॐ समूह लघ हो जाते है ४ कर्म करने वाजे
१८
-माकंरढेयपुराण
०४
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पवध्यामो मतं कृचं व्यासस्यादथुतकम्मंणः । ` | व्यास का जिन्दों ने कि महाभारत लिखकर धमा
येन भारतिय धर्म्माधाः भकटीकृताः ॥४२॥ आपो नारा इति भोक्ता भुनिमिस्तत्वदर्शिमिः।
दिकोंको भगट किया है सम्पूणं मतत ्रापको वतलायेगे ॥ ४२॥ तत्वदर्शी भुनियों ने जल को ,
नारा कदा है श्रौर उसमें जिस पुरुप का बास है .
श्रयनं तस्य ता पूर्व्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥४२।॥ उसको नारायण कहते हँ ॥ ४२॥ वहीं भगवान्
स देवो भगवान् सत्वं व्याप्य नारायणो विथु; । चतुद्धा संस्थितो घरहमन् सगुणो निरएस्तथा ४४ एका भूर्िरनिदेश्या शु्ां पयंति तां बुधाः।
नारायण देव ईश्वर सर्व-व्यापी टोकर चार स्वरूप ,. म स्थित है तथा सगुण श्रौर निगु है ॥४४॥ पिला स्वरूप अनिर्हश्य है जिसको विद्धान् श॒ङ्ग कहते ह श्नौर परम योगी जिसको ज्योतिःस्वरूप
ज्वालामालोपरुदढाङ्गी निष्ठा सा योगिनां परा॥४५॥| कहते है ॥ ४५॥ गी लोग कते है कि वह दुर
दूरस्था चान्तिकस्था च धिजञेया सा गुणातिगा ।
रूपवणंदयस्तस्या न भावाः कल्पनामयाः । ञस्त्येव सा सदा शुद्धा सुपरतिष्टेकरूपिणी ॥४७॥
द्वितीया पृथिवीं मूद॒धां शेषाख्या धारयत्यधः । तामसी सा समास्याता तिय्यक्त्वं समुपाथिता८॥ ठतीया कम्मं॑इरते प्रनापालनतत्परा 1
पक्तोद्िक्ता तु सा ज्ञेया धम्मंसंस्थानकारिसी४६। चतुथी जलमध्यस्था शेते पन्नेगतत्प्गा । ए्नस्तस्या गुणः सगं सा करोति सदेव हि ॥१०॥ या ठृतीया दरेमृिः मनापालनंतत्परा ।
पा तु धम्म॑न्यवस्थानं करोति नियतं श्वि ॥५१। ्ोदूतानसुरान् न्ति धरम्म॑विच्ित्तिकारिणः। पाति देवान् सतशान्यान् घमरक्षापरायणान्॥५२॥ य्दा यदा हि धम्य ग्लानिर्भवति लेमिने । अभ्युत्थानमधम्मस्य तदात्मानं सनत्यसौ ॥५३॥ भूत्वा पुरा वराहेण त॒ण्डेनापो निरस्य च । एकया दृूयोतूसाता नलिनीव वसुन्धरा ॥५४॥ त्वा उसिहरूपञ्च दिरणए्यकशिपुरंतः । विग्रचित्तियुखाश्चान्ये दानवा विनिपातिताः॥५१॥ वामनादीस्तयेषान्यान् न संख्यातुमिहोत्सहे । अवतारं तस्येह माथुरः साम्बतं त्वयम् ॥५६॥ हति सा साचचिकी मू्भिखतारान् करोति वै ।
चय म्नेति च सा स्याता रकताकम्म॑रुयवस्थिता ५७॥
ज्नीर पास दोनों है । उसी वो बासुदेव कटते हं
तिमपलेन शरीर वह ममत्व रदित लोगों को दीं दिखाई देता वासुदेवाभिषानाऽपौ निम्मेमत्ेन दृश्यते ॥४६॥| है
॥ ४६॥ उस स्वरूप का रूप रङ्ग नदीं है, उस का भाव कल्पनामय है । वह सदा शद्ध, सुपि. तिष्टत नौर पक रूप वाला है ॥ ४७॥ दूसरा खरूप शेपनाग है जो नीचे से श्रपने शिर पर पृथ्वी को उटाये हष है । इस खरूप को तामसी , कते है ॥ ४८ ॥ तीसरा खरूप वह है जो कम॑ करता है अर्थात् पजा पालन मे तत्पर है शौर धर्मः का संस्थापनं करता है इसको सास्विक खरूप कहा दै ॥ ४६॥ चौथा स्वरूप बह है जो शेषशायी है इसको गजोगुरी कदते. दै ॥ ५० ॥ तीस जो स्व्ररूप पजा पालन मे तत्पर है बट पृथ्वी पर नियत रूप से धमे की व्यवस्था करता है ॥ ५१॥ ( भगवान् ) राक्तसों को जो ध्म के
नाश करने वलि है, मारते है ओर धर्म की रक्ता म प्रायण देवतां की रक्ता करते हं ॥ ५२॥ हे जैमिनि ¡ जव-जव धस का हास होता है श्नौर मधम की वृद्धि होती हे तभी भगवान् मगर होते ह ॥ ५३॥ प्राचीन काल मे वाराह ने अपने पक दात से पृथ्वी को जल मेसेक्मलकी तरह निकाल कर स्थित किया ॥ ४४ ॥ चौर चसह रुप धारण कर हिररयकशिपुका चध किया श्नौर विध- चित्ति आदि रासो को मारा ॥ ५५॥ उन्न दी वामनादिक अनेकों श्रसंख्य ्रवतार धारण कयि है ओर उन्टोने ही आज-कल मथुरामे
अवतार लिया दै ॥ ५६॥ यह सात्विकी भूति दी
परमेश्वर का अवतार लेती दै । दूसरी तामसी सूतिं शेष अथात् च् स्न का श्रवतार लेकर रक्ता कम भं तत्पर रती है ॥ ५७॥ बासुदेव की इच्यु
ञ्० ५ माकरएख्यपुराण १६
देव्मेऽथ मुष्यते तिवयम्योनौ च संस्थिता । । से देवताश शौर मद्यो की. योनि स्वभावानु-
५
गहाति तत्छमावंच वाघुदेवेच्छया सदा ॥५८॥ सार मिलती हे ॥ ५८॥ इटलिये परमेश्वर विष्णु इत्येतत् ते समाख्यातं कृतङकत्योऽपि यल; । | मानच ्रवतार हेते ह । श्व दूसरे भशन का माुषत्वं गतो विष्णुः ृरष्वास्योत्रं पुनः ॥५६।॥ उन्तर सुनिये ॥ ५६॥
स्ति श्रीमाकरुडेयषुराण भे चतु्यंह अवतार वणन नामक चौथा श्रध्याय सम ।
-- स्णक-@969 < -~ पोँचवां अध्याय | चिण् उचुः | पी बोले # त्षपत्रे हते पूवं व्रह्मनिन्द्रस्य तेनसः । भाचीन काल मे इन्द ने त्वरा के पुत्र फो
| तेजस्वी बाह्मण था मारा था । इससे. उसको ्र्हत्यामिमूतस्य परा हानिरनायत ॥ १॥|| ्रहत्या का पाक लगा शौर इ्दकी वद हानि तदधम भमियेशाय शाक्रतेोऽपचारतः । | इं ॥ १॥ उस पाय के लगने से इन्द्र निस्तेज हो न्ते भचछको षम तेनसि नित ॥२॥ गया श्रौर उसका तेज निकल कर धर्म मे प्रविष्ट नाश्वामव होगया ॥ २॥ जव प्रजापति त्वष्ट ने श्रपने पु का, ततः पुत्रं हतं श्रुचा लष्ठ करुद्धः मनापतिः । (| मरण सुना तो क्रु होकर श्रपनी प्क जया अवसव्य जटामेकामिदं वचनमत्रवीत् ॥ २ ॥| उलाडृ कर चद् वचन थला ॥ ६॥ श्रव मेरी शुक्ति अच पश्यन्तु मे बी रयो लोकाः सदेवताः। को देवतां सदित तीनों लोक तथा ब दुुद्धि स च पश्यतु दववद्धि्रंहदा पाकशासन; ॥ ४ ॥ 1 + २ । मे लगे हु मेरे पुज का वघ किया है यह ककर स्वकम्माभिरतो येन त्युत विनिपातितः । | लाललाल ने करके जटा को श्रगिनि मै डाल इयुक्तवा केोपरक्ताक्षो जटामश्री घाव ताम् ॥ ५ ॥ दिया ॥ ५॥ उस व श्रग्नि 9 नासु नाम वाल्ला ण्स › बड़-वड़े दांतों
तता छ; सए्स्थौ ज्वालामाली महासुरः । | बाला तथा काले पषाड़ की सी आरामा वाला था `
महाकायो महादे भिन्नाञ्जनचयग्रभः ॥ ६ ।|| निकला ॥ ६॥ बह इन्र का शयु, मावली, तथा ५ व्व्ठके तेज से उत्पन्न हुश्रा रात्तस वृत्ासुर नित्य-
हरशवरुरमेयात्मा -लषटेनोष हितः । प्रति वढृता था इस तरह किं जिस प्रकार छूटा । श्रहन्यहनि सोभवद्ध दिषुपातं महाबलः ॥ ७ ॥ हु तीर ऊँचा जाता दै ॥ ७॥ इन्दर न महाश्रसुर वधाय चात्मनो दृष्ट श्रं शक्रो महासरम् । | चन्र से अपना मर्ण जानकर, भयान्वित हो,
सप्तश्कषियों को सन्धि की खवर लेकर ब्न्नासुर
मषयामसि सपर्पीन सन्धिमिच्छन् भयातुरः ॥ ८ ॥ के पास सेजा ॥ ८॥ उन ऋषियों ने जो पराणि मात्र
सर्यंचरुस्ततस्तस्य छण समयांस्तथा । | का. दितचिन्न करते थे, इनदर की चचार के ऋषयः भीतमनसः स्वभूते रताः ॥ ६ ॥ साथ एक अवधि के लिये मित्रता 1 ॥ ६॥
+ अवधि के वीतमे पर शक्र ( इन्द्र ) ने बूच का वध ; छो हस्याभिमूतस्य तदा वलमशीय्यत ॥१०॥| गया ॥ १० ॥ इसके वाद इन्द्र कौ देहस बल निकल तच्छक्रदेहविभरष्ं ' बलं भारुतमाबिरत् । कर सर्वव्यापी, श्रव्यक्त तथा वल के देवता पवन `
सर्व्वव्यापिणमव्यक्त' बलस्येवाधिदैवतम् ॥॥११॥ मै भेण कर गया ॥११॥ जव इन्र ने गौत्तमका रूपं. श्रहरयाश्च यदा शक्रो गौतमं रूपमास्थितः, | , | धारण कर अस्या के सतीत्व करा नाश क्रिया तच
६६, ` माक॑रुडेयपुराण ` भ्र* १
~~ ------------------------------------ ~~ न~~ = ~ - ~ ~न =------~
प्यामास दवद्रस्दा रूपमदहीयत ॥१२।| उसका रूप भी कीर होगया ॥ १२॥ श्रौर बह
॥ मनोरम लावरय उस दए इन्द्र फे श्रङ्गग्रह्न से अ्गमतयङ्गलपरए्यं यदतीव मनौरमम् । निकल कर ्रश्चिनी कुमाय में प्राप्त दुश्ा ॥ १२॥
पिहिय दुष्टं देवेन्द्रं नासत्यावगमत् ततः ॥९२॥ धर्म, तेज, वल च्रीर स्प से इन्द्र॒ को दीन ह्र धर्म्मेण तेनसा त्यक्तं बलदीनमरूपिणम् | | देखकर दैत्यो ने इन्द्र को जीतने का उद्रम दिया नाला सुरेशं दैतेयास्तज्जये चक्ररुधमम् ॥१ ॥ १४॥ हे महासुनि जेभिनि ! इन्द्र॒ को जीतने
देवेद्ध विजिगीषवः की दृच्छासे प्रथ्वी पर श्रनेक वलवान् राजाग्रोँ के ज्ञदयं देवे ४ राज्य-कुलों से राकस ने जन्प्र लिया ॥ १५॥
हृलेष्वतिवला दैत्या अनायन्त महान ॥१५॥| इन यत्तस्य के भार से घ्याकुल देकर पृथ्वी दां
कस्यदित्वथ कालस्य धरणी भारथीडिता । | खमेर पर्वत पर देवतां की सभाथी वटं ग लगाम मेरुशिखरं सदो यत्र दिवौकसाम् ॥१६।॥ ५९९१ त्यन्त भर र सीदित सोकर उने तेषां सा कथयामात भूरिभारावपीडिता । देवताश्रले कदा कि ैत्योके भारे पीदित होकर
यतयं से ,| मै यहाँ राई ह ॥ १७॥ श्रापने जो भगा पराव्रम दुजात्मजदत एद्कारणमात्मनः ॥ १७ वाले रा्तसो छो मारा हे चे लव मलुष्य-लोक मे एते भवद्विरखुरा निहताः पथुलोजसः । | राजाच के धर भ उतपन्न हण द ॥ १८॥ उन्देनि ते सर्वं मापे लोके जाता गेहेषु भूमृताम् ॥१८।॥| ्ननेक च्रौदिसी, सेनाश्रों के भार ॐ भुमको , | ःखित क्रिया ह रौर इसी कारण से मे नीचेन अक्षौहिण्यो हि बहुलास्तद्वारात्तं व्रनाम्यधः। | बीर जाती. ह 1 दे शेवा } पेसा करिकर तथा इुरुध्वं त्रिदशा यथा शान्ति्बेन्मम ॥१६; | जिससे मै शान्ति पा सँ ॥ १६॥ पक्तिः ध पत्ती बोले-- श 4 त ,। इखकारण श्रपने-खपने तेजा भाग लेकर देव- तेोमागेसततो द्वा अवतेरूदिषो महीम् । | ताच्मो ने प्ृध्ठी पर परजा फे उपकार के निभित्त प्रजानष्घुपकाराथं भूभारहरणाय च ॥२० | तथा पएृथ्वीखा भार उनारमे के ह््ियि श्रवतार
यदिन्रहनं तेनस्तनधुमोच सयं एषः । | क्तिया ॥ २०॥ इष् के शरीर स जो तेज धर्म न
धः ग्रहण किया उससे न्ती दाय महा तेजखी राजा कृन्त्यां नाती महातेनास्ततो राजा युधिष्ठिरः ॥२१. शथिष्ठिर उत्पन्न इए ॥ २१॥ इन्द्र॒ से निकल कर ५ जो वल पवन म मिला उससे भीम उत्पन्न हु । ५ मोच पवनस्ततो भीमो व्यनायत । तथा इन्द्र के वीर्यं से उद्धव पाथं नाम अर्जुन शक्रवीय्यादतश्चेव जङ्ग पाथा धनञ्जय; ॥२२॥| उत्पन्न दु ॥ २२॥ इर् का जो रूप श्ण्विनी- यलो ध कुमारो म मिला था उखे इन्द्र खरूप दो पुत्र उत्पन्न `पमजौ माद्रयां शक्ररूपी मदाच् ती । मद्री के उत्पन्न हप जिनके नाम नकल श्नौर सहदेव ध } इस प्रकार भगवान इन्द्र खयं पांच । खरूपो मे प्रगट इए ॥ २२॥ श्रीर हे जैमिनिजी । श्रनि से उत्पन्न इह द्रौपदी उन इन्द्र रपी प्च तस्योत्पनना महाभागा पत्नी कृष्णा हुताशनात्९४॥॥ पारडयों की पत्नी हई ॥ २४ ॥ इसलिये वह द्रौपदी नान्यस्य कस्यवित्। | प्क इन्द्र की दी पतली दै श्ौर किती की नदीं । ` शक्रस्येकस्य सा पत्नी ष्णा कस्यपित्। योगीश्वर भी अयते योग ॐ चल से चनेक शरीर : योगीश्वराः शरीराणि इव्बन्ति बहुलान्यपि ॥२५।॥| घारण् कर तेते दै ( जिस इन्दर तोः देवत है ) पचानामेकपत्नीतवमित्येतत् कथितं तष । | खनि जमिनिजी ¦ पां पारड्ों की पक ही तौ । पः्नीका रदस्य आपसे कटा । श्रव खुनिये कि किस श्रुयतां बलदेवोऽपि यथा यातः सरस्वतीम् ॥२६॥. भकार बलदेवजी सरस्वती तीथं को गये ॥ २६॥
। . इति श्रीमाकरुदेयपुराण मे हृरधिकरिया नाम पच. अध्याय समापन ।
पथ्चधा मगवानित्थमवतीरं; शतक्रतुः ॥२३।
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कठा अध्याय
॑ पर्षिण ऊ पती वोले- रामः पाथं परां मतिं ज्ञास कृष्णस्य लद्खली। ` _ वलरामजी श्रीृष्ण श्रे शञुन में परस प्रीति
६ ' करो लानकर् यट सोचने लगे कि जुभे कौनसा चिन्तयामरस बहुधा रि एतं सुकृतं मवेत् ॥ १॥ काम ेसा करना चाहिये जिससे पर्य दो ॥१॥
कृष्णेन हि पिना नादं यास्ये दु्योधनान्तिकम्। ह क विना दुर्योधन क्री तरफ जाना उचित थं रोधनं पम् नही । इसी रकार णजा दुर्योधन को छोडकर पारडषं [भनि ट भ *ॐ ५८ 1: ॥ 1 ९॥ पारड की शोर जाना च्छा नरी ॥ २॥ एक जामतरं तथा शिष्यं घातयिप्ये नरेश्वरम् । | श्रोर जामात्रा दै छरीर दृसरी ओर शिष्य श्रौर य पोधनं दृथम्॥२॥ यज का वध । इसलिये मे न तो श्न की ओर ब्र प्रि (६ नारि द्र्् ष्य 1 २ ४ ७ (५ [१ खु थं यास्यामि नारि दुरधधिनंवरपम्॥२ ॥ जरगा शौर न दुर्योधन की शरोर ॥ २॥ इसलिये तीर्थेष्वाप्लव्रयिष्यामि तावदत्मानमात्यना । जवर तक कौर श्चौर पारडवों का रद्ध समाप्त हो वि क ोवनीवपि कर गा ॥ ४॥ इस प्रकार श्रीकृष्ण, श्रयुन श्चौर सत्यामन्य हरक प यापना (6 दुर्यधन रे मिलकर एनी सेना सहित वलदेदजी जगाम हारफां शारि, खसेन्यपसवारितिः
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॥ ५ ॥| द्वारकापुर को गये ॥ ५॥ व्तदेवजी ने द्वारकापुर
गत्वा हारवतीं रामो दषटपु्टजनाङ्लाम्र् । | मे जिसमे हपु श्रौर खी मनुष्य रहते है जा स्वगन्तव्येषु तीए पए पानं द्रलादुधः ॥ ६ । कर मदिरा एन किया ॥६॥ मदिरा पाय कारके वे पीतपानो जगामाय रवतोचानगृद्िमद् । | खत गने भे जीर वह जाकर न्न मदोतमच
द स र रेवतीको जो श्रण्ससके तुल्यथीं हासे पकड्ल्लिया॥
( सीफदम्बकमध्यरथो चयौ मतः षदा स्खसन्। | तथा उन्मत्त द्यो डिगमरिगाते हए पतों से 1 ददशं च वनं वीरो रमणीयमलुतमम् ॥ ८ ॥| शौर उन्दने रमशीक णयं उत्तम वनको देखा ॥८॥ ९५ शाखाभृयगणा्कल ¦ घंट महावन सव ऋतुं के फलः पुष्प,.शाखा, (| ० त ५ गरलम् । श्म समूह तथा पित्र कमल चीर न्दर वाव- प्यं पञ्चय सपस्वलमदायनम् ॥ ६।| लियो से य॒त था॥६॥ वहाँ पियो के सुख से स भरएयन् मीतिनननान् बहून. मदकलान् मान | उचारित मधुर एष्द् जो ख॒नद्रः छम, मदोन्मत्त भो्रम्यान् सुमधुरान शब्दान् खगघखेरितान् १०।॥| करने वाले शरौर 1 व क्त 40) खव छल ॐ खच्छ शूला श्रीर फलो से लदा => , सव्यतुफलमाराल्यन् सर्ङुमोज्नवलान्। | चर "चय परियां के यष्ट खे निनादित ५" श्राप्रानाम्रातकान् मव्यान नारिकेलान् सतिन्दुकान् श्राविदयकास्तथा जीरान् दादिमानधीजपूरकान्९२। पनसान् लक्कचान् भोचान् नीएंधात्तिमनोहरान्। पारावता कङ्लोल्लान् नलिनानस्लवेतसन १२ भट्ारकानामलकांस्िन्दृकांध महाफलान् । 1 हगुदान् करमदरीशच हरीतक-पिभीतकान् ॥१४॥| कर्मच, छर शौर वदेडे ॥९४॥ यदुनन 2 एतानन्थांथ स॒ तरन् ददं यदुनन्दनः । | नै दलको तथा इसी भकार अन्य छ चस ~ 1 तेवाशोक-घुनाग-रेतकरी-बङलानथ ॥१५।॥| पुग, केतकी चौर मौलसिरी को भी देखा ॥५ चभ्पकान् स्पर्ध किकारान सम।लतीन् । | चस्या, सवण, कनेएमालती,पारज त, ५ ५५५
सि्, चेल, शञजीरः नार् श्नौर नीवू ॥ १२ ॥ . ^
1 कटहल, बद्दल, भ्रोचरल, कदम शरीर †- ` | मनोहर पायनत, कक्कोल, चल्िन श्रौर २
॥ १३ ॥ भल्लातक, दुक शरीर महाल , ६५५ ५
माकैरुडेयपुराण श्र ६ _ -___ ~~~ = पारिजातान् कोषिदारानन्दारान् वदरांस्तथा१६।| मंदार चनौर वेर ॥ १६॥ पार्ल त्ऋदि सुन्दर पुष्य पाटल्लान् पुधितान् रम्यान् देवदाद्मास्तथा। तथा देवदार श्राद्रि वक्त, गालः ताल, तमालः श्लास्तालास्तमालांधर्ि्कानधज्ुलानवरा न १७॥ परस च खुन्दर चञ्चल ॥ १७॥ चकोर, शतपत्रः चकोर; शत्तपत्रेथ मृद्गराजस्तया शकः । भरे, तोते, कोयलः मैना, हारीत तथा जीजजीवक
२२
कोकिलैः कलविङ्ध हारातरजािलावकः मियपुतरेषातकेव ॒तयथान्ये्विविधः सगः । श्रोत्ररम्यं सुमधुरं इलद्विशवप्यधिष्ठितम् सरसि च मनोज्ञानि भसचरपलिलानि च । इषुः पुएढरीकौश्च तथा नीलोत्पलैः शुभैः ॥२ कारेः कमतेश्चापि ्राचितानि समन्ततः ऊाठम्वेश्चक्रवाकेश्च तथेव जलङ्क्टः ॥२१॥ कारणैः प्लवैहतेः सृ्येमदगुभिरेव च । एभिश्चान्येश्च कौशंनि समन्ताल्जलचारिभिः२२ करमेेत्थं यनं शोरिवीभ्रमाणो मनोरमम् । जगामालुगतः द्वीमितायहमसुत्तमम् ॥२२॥ स॒ददशं द्विजास्तत्र बेदयेदाङ्परगान् । कौशिकान् भार्गवाश्चैव भारद्वाजान् सगोतसान्२४॥ विविघेषु च सम्भूतान् वंशेषु द्विजसत्तमान् । कथाश्रवणएवद्धो्कासुपविष्टान् महत्य च ॥२१५॥ छृष्टाजिनोत्तरीयेु ङ्दोषु च दृषीषु च । सत्व तेषां मध्यस्थं कथयानं कथाः शुभाः ।।२६॥ पौराणिकीः सुरषीणामाच्यानां चारिताश्रयाः
1१८] ॥ दख ॥ तथा पपीदा श्रौरं श्रन्य श्रनेक ध्रकार के पकती अपने प्रिय पुतो सदत वरैडे हुए द्धी श्रुति १&॥॥ मधुर चौर मीठी वासी बोल रे ये॥ १६॥ बडे
स्वच्छं जकन वाते मनोहर तालाव थे जिनमे खुन्दर स्वच्छ कुमुदिनी व लाल श्चीर नीले कमल खिल रदे थे ॥ २० ॥ जिनमे कर्टार श्रौर कमल इत्यादि चारं तरफ खिल रदे घे 1 तथा कदम्ब, [4 चकवा रौर चतस्र ॥ २१॥ श्रौर फारतड, प्लव, दंस, कलु मदटलियों तथा चौर भी श्रनेक जलचरो से तालाव चारों चोर से पृणँ थे ॥ २२॥ वलरामजी क्रम से इख खुन्दर चन को देखते हुए लियो के साथ एक अन्यन्त उत्तम लतागृह मेँ गये ॥ २३॥ उन्नि वहां पर वेद वेदाङ्ग म पार्त कौशिक, भार्गव, भारद्वाज च्रौर गौतम व्री ब्राह्मणों को देखा 1 २ ॥ श्रौर भी अनेक वंशीय श्रेष्ठ बाह्रा वहाँ वरे हुए कथा सुन रदे ये ॥२५॥ खगच्छालाओं, कश्ाश्यां अथवा श्रास-पात पर वैठे हुए उन व्राह्मण के' वीच मेँ स्थित घूतजी शभ कथा छुना रहे थे ॥ २६॥ चे कथायं पुसर-संवन्धी तथा प्राचीन देवताप्रो ओर ऋपियां के चरि सम्बन्धी शीं । वे सव ब्राह्म मदिरा के नये मे
द रामं दिनाः सुच सधुपानार्छेक्षणम् 1}२७॥ चूर वलराम्ञ् का ठख कर ॥ २७॥ श्रौर यहे
;सत्तोऽयमिति मन्वानाः समु्स्युस्छरान्विताः पूनयन्तो हलधरमृते तं सूतवशजम् ।ततः क्रोयसमाविषठो हली सूतं महाबलः । पवरिजयान विदतताक्षः क्षोभितारेषदानवः
ऽश्ध्यास्यति प्रदं त्राह्यं तस्मिन् सृते निपातिते निष्क्रान्तास्ते द्विजाः सते बनात् कृष्णालिनावराः अवधूतं तयात्मानं मन्यमानो हलायुधः
॥२८]
समः कर कि यह मतचलेद्योरटे है, शीव्रदही उनके स्वागताश्रं उर वेड परन्तु सूती न उरग) सूत के इस प्रकार अवदेलना करमे पर महावली चलदेवडी ने जिलकी शख कोध से विगड्् रीं
२६ धा सूत का राक्तस चग भातत मार डल्ला ॥२६॥
सूत के मरने को वह्म-दत्या समस करवे चूमि सव ऋपने-अपने गचमं को केकर वनको द्टोड़ कर खल्ते यये ॥ ३० ॥ वलरामजी श्रपमे उन्मादको समभ कर सोचने लगे कि रने यह वड पाप
प्रचिन्तयामासर सुमहन्पया पापमिदं कतम् ॥\२१।॥| या ॥ ३९ ॥ जाह्यण के स्थाने मे आक्र हमने
बिं स्थानं गतो शष यत् सूतो विनिपातितः
सथाहमे द्विना सर्व मामवेक्ष्य विनिर्गताः ॥३२॥
एरीरस्य च मे गन्थो लोहस्येवायखावहः ।
खूतजी का वध च्या! इसी कारण सेये सव
लोग सको देखकर अ्रथोत् सुकसे धरा करके इस वन को छोड़ कर चले गये हँ ॥ ३२॥
मेरे शरीर मे से खृतात्माकी सी दर्गन्धि अतीद
` अ्र०७ मावरडेयपुराण २३ ----------------------------------------------- ~~~ -- --~----- भ्ातमानध्वावगच्चामि बरहम्नमिव इत्सितम्॥२२॥ इस क के पापको र २३॥ मर कराध, मादः 9 क धिगम॒भ तथा भ्मतिमानमभीरताम् । | को भिका स रान यरा येराविष्टेन सुमहन्मया पापमिदं तम् ॥३४॥ ववि 1 ८ ४ इख पाप कफे नाश करने
ततेक्षयाथं चरिष्यामि व्रतं दादशवार्षिकम् । को वारहवर्पं तक बत तथा उत्तम प्रायधित्त करूंगा
सकम्मख्यापनं इव्वन् मायधित्तमयुत्तमम् ॥३१॥ ॥ २५॥ शरव मै तीर्थं याचा करूंगा श्रौर पिजत भू अथ येयं समारव्या तीरयया्ा मयाधुना । | यनिलोमा सरस्वती तीथं पर. जाकर श्पनीं चात्मा “ एतामेव भयास्यामि प्रतिलोमां सरस्वतीम् ॥३६॥| को पवित्र करूंगा ॥ २६॥ श्नतः बलरामजी भरति.
ञ्रतो जगाम रामोऽसौ प्रतिलोमां सरखतीम् । लोमा अर्थात् खरस्बती तीर्थको गये । अरव पांडवों
ततः परं शृशष्वेमं पाण्डवेयकथाश्रयम् ॥२३७॥ के पु की कथा को सुनो ॥३७॥
इति श्रीमाकण्डेयपुराण म बलदेव ब्रह्महत्या कथन नाम छटा अध्याय समाप्च ।
= ("द 4१ , द्द -- सातां अध्याय पत्तिण उचुः धर्मपक्ती लोग वोल्े-- हरिष्चन्दरेति राजर्षिरासीत् प्रेतायुगे पुरा । पूवे काल में तेता युग मेँ राजपिं हरिन
राज्य करते थे । बे धर्मात्मा, पृथ्नी पालक, तथा
धर्म्मात्मा पृथिवीपालः परोसत्कीर्चिरुत्तेमः ॥ १॥| उत्तम कीतिं वाले थे ॥ १॥ उनके शासन मे कभी
८ न दरिं न च व्याधिर्नाकालमरणं दरणाम्। | श्रकाल, रोग चीरः महामारी रादि नही हप । ए
र धमात्मा थी ॥ २॥ उनके नाधरम्रुचयः पौरास्तस्मिन् शसति पार्थिवे ॥ २॥ 1 नौर न किसी को धन, म
बभूवु तथोन्पत्ता धननवीर्य-तपोमदे; । | श्रौर तप का श्रभिमान था । उनके राज्य मे सियां
प्रयौवना । ~ ¦ ॥ कभी द्ध प्रतीत नदीं दोतीं थीं ॥ ३॥ पक दफा नाजायन्त सलियश्चय काश्चिदमा ९ चह राजा मृग का पीछा करता हुश्चा वनम निकल
स॒ कदाचिन्महाबाहुररण्येश्युसरन मृगम् । | गया । षहोँ सिय के विलाप का शब्द सुना कि । ‡ श्राव शब्दमस़त् त्रायस्वेति च योषिताम्", ४ ॥| “वचान्नो, वचाश्रो" ॥9॥ सग को चड़ कर राजा |
॥ भेषीरित्वभापत ने का, “डसे मत, मेरे शासनम अन्यायमें परचत्त स षिहाय मृगं राजा मा भपीरिः | [ला ददि कौन दै १ ॥५॥ उस शने की
मयि शासति दु्मेधाः कोऽयमन्यायदत्तिमान्॥४ ॥ ्रावाज्ञ का पीदा करता हृश्रा राजा चला । दसी ""
न्दिताघुसारी च सर्व्वारम्भाविषातद्त् । श्रदखर पर सव श्रच्छे काम के रम्भे कुटारा- ,. ा श्रात करने बाला, विध्नोका राजा रद्र यद सोचने
एतस्मिनन्तरे रौद्रो विघ्नराट् समचिन्तयत् ॥ ६ ॥| लगा ॥ ६॥ यह वलवान् वती विश्वामिव्रजी तुल विश्वामित्रोऽयमतुलं तप आस्थाय बरी्यैवान्। | तपस्या करके उख विद्या को सिदध , करना चादते
भवादीनां वियाः ७॥ द जो पदे शं आदि से भी न हो सकी ॥७॥ ¡+ भागसिद्धा भवादीनां विधाः साधयति त्ती ॥ ७॥| च न
साध्यमानाः क्षमामौनचित्तसंयमिनाऽ्युना । | चित्त 1 शा रे दै । विचाये इनके मय से $ ९ श्रातं होकर है । अव मुभे क्याकरना, तावै भयार्ताः नदन्त कयं कमि मया ॥ ८॥ दिये ॥५॥ मिभ्वामिनयी भरति तेजस्वी ई
तेजखी कौशिको वयमस्य सुदुब्बला; । | शरीर दम वड़ी निवल है, इस तरद डरकर विये ` ^ क्रोशन्त्येतास्तथा भीता दुष्पारं परतिभाति मे॥ ६ ।॥ रोती है । सभे कायं वड़ा कठिन मालुमहोता ३।६॥
क्का ५५४
4
२४ | . माकंरडेयपुराण ग्रु० ७ (~ --~--------------------------------------------- त माभेरिति वदन् शह अथवा इस राजा मे जो यह कट्ता इत्या श्राया दै अथवाय छक पक्ष बर वदन् $ कि भत योः प्रवेश कर अपने कायं का इच्छा हृममेव प्पिश्याश साधयिष्ये यथेप्सितम् ॥१०।॥ सार शीघ्र साधन कर का ॥ ९० ॥ विष्नराल रौद्र
यह विचार करते हृष राजां दरिश्चन्छे दे शरीर मं इति संचिन्त्य सौरेण विध्नशजेस वै ततः । | पेश कर ये अर राजाभी उनसे भभांवित होकर
तेनाविषठो वृषः कोशदिदं वचनमव्रवीत् ¦ ११|| कोध्क्त यह वचन बोले ॥ ११॥ यह पापी मतुप्य कौन दै जो वख की दोर से श्ण्नि को मारता |
कोऽयं वाति वचचान्ते पाष पापडजरः । वलवाय् ओर तेजगक्त मेरे खाने पर भी यह पाप वलोष्णतेजसा दीपे मयि पत्पावपस्थिते ॥१२ | क्म करता है ॥९य। अतः श्च मेरे धनुष के निकले कोऽ सक्कास्मुकाक्षेप-विदीपितदिगन्तरः । इय काण सखे तेय शरीर भिन्न भिन्न दिशाच्या कों
वभित्रसव्गो दीनि © प्रप्त सो दीघेनिद्वामंसो जावेगा ॥१२॥ उस राजा शरविभित दीनि भेष्यति । १२ के यह वचन शुनकर विश्यामिज्न बडे करोधमें श्चाये
= त्वच | पथितं होतें ~ विश्वामित्रस्वतः कद्धः श्रा तन्दर्तर्वघः । श्रौर छपि के कोधित होने पर ते विद्या क्षणभर रद्ध चर्षिवरे तस्मिन् नेशर्धियाः क्षणेन ताः।॥१४॥| मे उनके शरीर से निकल गई ॥ १ ॥ वदं राजा स चापि राजा तंद्रा विश्वामित्रं तपोनिधिम् | | दरिनद्र भी तपस्वी विश्वामित्र को देखकर रसे
हं ल खदसा पीपल फे पत्ते के समान कंपने लया॥ ९५ 1 { ॥ 4 भ ~ ९ [कप ४४ भीतः भवेषतात्यथ सदसाशवत्यपणत् ॥१५॥ ऋषि ्रिश्वामित् ने राजा से कडा, ५त् दुष्टात्मा है
स॒ दुरात्मक्निति यदा इुनिस्तिष्ठेति चाजीत्। | खड़ा रह फिर सजा इस्श्चनद्र ने श्रत्यन्त चिनथ ततः स॒ राजा भिनयाद् पणिप्त्यास्यभापत ॥॥१६।॥| पूवक प्रणाम कर उनसे कडा | १६॥ हे . भगव मगवन्तेप धर्मो मे नापराधो मम॒ भ्रमो | | यह् मे धं दै, इसमे मेरा अपराध नहीं दे । दै
सुने ! अपने धमं में लगे दुष मुम पर श्राप क्रोधेन पररि ख न ब्रोमहपि शुने निनयमभरतस्य भे ॥१७॥ करः 1 १७ ॥ धमात्मा राजा का यह धम है कि दानं |
दातव्यं रक्षितव्यं धम्मन महीक्षिता । | दे शौर रला करे । धर्मशाल क श्मलुसार धटुपको चापश्वोचस्य यदव्य पस्पशास्चाुसारः ॥१८॥ धारण कर यु करना चादिये ॥ १८॥ विश्वामित्र उवाचं दिश्वासिजजी वोल्ले--
त दे राजन् ! किसको दान देना चादिये.करिखकी दतिम्प ठ कस्य स्य क ) [६ 1 द्व्य् पु प । र रयाः कयष्दन्यञ्चत् छप । रक्ता करनी चाहिये चौर किंसके साथ युद्ध करना
च यथ त्य चाहिये १ यदि तुको अधमे का डर है सो इसका ्िममेततत् समाचक्ष्व चचथम्ममयं तव ॥१६॥| नु
हरिशचन्द्र उवत्व राजा हरिश्चन्द्र वोले- | दातव्यं पिभदुख्येभ्यो ये चान्ये ुशददयः । श्रेष्ट रिथ छो श्रौर भृशो को दान दियाजातां
है, उरे इष लोगों की रता ` की जाती है, तथा
र्ट [4 ताः [| कर्तव्यं [4 रऽ पमि # ्या भीताः सदा युद्धं कततयं परियन्थिभिः २० व्ैरियो के साथ अद्ध किय जाता है ॥२०॥ * पवश्वामित्र उवाच ` विभ्कमिच्रजी वोल्े- यदि ् ~ भयान् ग्रानधर्मसवेक्षते ४ ¦ राजो मचान् स॒स्थग्रान । यदि राप् राजा है श्नौर सम्यक् राजन्धमै का |
0 । श पालन करते दै तो में बाह्मण ह शौर दच्छाकरताहं ` नि्वष्टुकामो विभोऽं दक्षिण ॥२१॥॥ सुमत श्रमी दान दीज्यि॥९॥। ` ` |
पत्ति स क्ली बोले- एतद्राजा वचः; श्रुत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । रजा यह चेचन सुनकर मन मे वहत प्रसन्न
पुनजातभिवात्मानं मेने राह च कौशिकम् ।२२।| च! ओर अपना दूसरा जन्म हुआ देखा समसः इरिधन्द उनाच कर पिश्वाश्ये्र से वोज्ला॥ २२॥ ।
हरिश्चन्द् वाले-- उच्यतां भगवन् यत् ते दातव्यमविशङ्खितम् ! दे भगवन् ! आपो जो कु चाये. `
नन्व
9 म
॥ भीष
०७ ४ माकरएडेयमुराण २४
स तर. स्री, दे. प्राण, गराल्य, नगर, ल्तध्मी जिस पाणा राज्यं पुरं ल्मीयदमिेतमात्मनः ह ची की हो ॥ २४॥
विश्वामित्र उत्राच चिष्त्ामिच बोक्ते-- राजन् प्रतिग्रहीतोऽगं यस्ते दत्तः प्रतिग्रह हे राजन. ! यट जो श्चापने दियासो मैने जिया परयच्छ प्रथमं तावदक्षिणां रनघुयिकीम् ॥२५॥ परन्तु पटिते मजसूयययवी दक्तिणा सुमे दो ॥२५॥ राजोवाच राजा ने कदा-- ्रह्मस्तामपि दास्यामि दक्षिणां भवतो घम् । वा
वी ति । ध्रापनेकटी दै । हे विधवर । श्रव जो श्रापको तविथरतां तू यस्तवेष्ठः प्रतिग्रहः 1 २६ # परिय हो वह् दान मांगियि 1 २६॥ | विभ्वामिच उवाच विश्वामिच वोले-- ससागरां धरामेतां सभूभृ्ग्रामपत्तनाम् । सुद्र, पृथ्वी, पर्वन, श्राम श्रीर नगर तथा राज्यंच सकलं वीर रथाश्व-गजसंङृलम् ॥२७॥| सेना, स्थ, रश्व, टाशरले युक स्पूं रज्य ॥२अ॥
गास्व कोपंच यदान्यद्ियते प्रौग दे निष्पाप ! कोषटागार, खज्ञाना तथा श्रपनी कोषठागारच कोपंच यचान्यदविधते तव॒ । | दौ, पन र शपे शरीर कौ दोदर ओ पथं
विना भायाज्च ध्रै शरीरं तवानघ ॥२८॥ तमार पास है वह सथ ॥२८॥ शरगर तुय धमातर धम्पच् वधम यो यान्तमनुगच्छेति । | हयो श्रीर धर्मं को जानते हो तो श्रथिक कमै से बहुना वा कक्तं न सव्यमेतत् भदीयताम् ॥२६॥| क्या जो कद मैने कटा दै वह सव मु दो ॥२६॥ । पक्तिण उचुः पती वोल्ते- भहृष्टेनैव मनसा सोऽधिकारयुखो परप । राजा ने श्रति प्रसन्न चित्त शोकर उस ऋषि = यह वचन सुने श्रोर हाथ जोड कर कटा कि पेखा तस्यपवेचनं श्रुत्वा तथेत्याह ृताज्जलिः ॥२०। दही दोगा ॥ २०॥ निश्वामिन्न उवाच विश्वामित्र चोज्े-- स्वंसं यदि मे दत्तं राज्ययु्वीं वलं धनम् । यदि राज्य, रथी, सेना, धन श्रादि सर्वं ४ = द वि सुभेदेद्वियाहैतोश्रापक्राइखपर कोर प्रभु मथतवं कस्य राजप राज्यस्थे तापसे मयि ॥२१॥ नदीदि श्रीःवप्रय श्राप इस याज्यते कयो उदर्तेरो॥ हरिश्चन्द्र उच दसरिथिन्द्र चले- यस्मिन्नपि मयाकाले वब्रहमन्दता वसुन्यरा । दे ्ञ्न् ! जिस समय सते इस परुची छरा रान्य £ श्रापको दिया उख समय से श्रापदी इसे स्वामी तस्मिसि भपान् स्वामी किषएताय मदीपतिः२२॥| है । मै श्रव राजा नदीं ह ॥३२॥
विश्वाभि उवाच विश्वामित्र वोले-- यदि रजस्या दत्ता मम सर्ववां बरन्धरा। ् श सुभेदेदिया नो शरी प्र यत्र धू | तर न्तम ¡| मेस स्वामिन्व दगया । श्रतः छव च्रषि यद् ४६। न र व ४ मानिष ह तुमसि। ।९२ निकरे ॥३२॥ श्रोणी सूज, कपष श्रौर ज्र सथं भाएपसुतरा्कल युक्त्वा भूषणतग्रहम् । | याँ उतार कर बहल वस्र धारण कारे श्रपनी.- तसूषरछलमवध्य सह पर्या सुतेन च ॥२३४॥ शरी श्रौर पुत्र फेः साथ चले जाद्ये ॥ ३४॥ पक्तिण उचुः पदी बोले-
पक्ता छः ध चिध्वासिच मुनिका चह करना भी फक याजा मन्त् 2 तथेति चक्त्या ङृत्वा च राजा गन्तं मचक्रमे। सस्व रती सी धया सग पुन फो काय
स्वपल्या शन्यया घाद वालकेनात्ममेन २।२५॥| लेकर चले ॥ ३५॥ अनि दर गजा फी गाद् येक तरनतः स ततो रदृध्वा वन्थानं भह तं ग्रपम्। कर विण्यानिशरने सजा स कदया-"यजस्य यङ
२६ भकेर्ठेयपुराण ` अ०७.
ह यास्यसीत्यदचचा से दक्षिणां रानसूयिकीम्।३६॥ मसी दक्षिखा धियि विना कदां जते दो {” ॥२६॥ .
इस्धिन्द्र उवाच हरि्चन्द्र वो | परगवन् राज्यमेतत् ते दत्तं निहतकण्टकम् । | दे भगवन् ! मैने निष्कंटक राज्य तो -आपको प्रवशिषटमिदं ब्रह्मन्च दैह्यं मम ॥३७।॥ ३ दिया । अव मेरे पास ये तीन देददी वचे है।२७॥
विश्वामिच उचाच विश्वामिच बोक्ते- = पथापि खलु दातव्या त्वया मे यत्दक्षिणा । | तौ भी तुमको मेरी यक्ञ-दक्षिणा श्रवध्य देनी -"
चाये । विशेष कर ब्राह्मणः को वायदा करके न विशेषतो बाह्मणानां हन्त्यदत्तं भतिश्चतम् ॥२३८॥ देने से पुरय का क्षय होता है ॥द८॥ जव तक राज-
यावत् तोषो रानघ्ये बराह्मणानां भवेनहप । | खय य मे बाहा की संतु नही होती दै तव
तक राजसूय यज्ञ की दक्षिणा देनी चाहिये ॥ २६॥ हावदेव तु दातव्या दक्षिणा राजष्ूयिकी ॥२६॥| थम तो तुमने ही कडा था कि भ बाह्मणौ को
रतिश्रुत्य च दातव्यं योद्न्यश्वाततापिमिः । | दान देता ह, आततायियो से युद्ध करता दह तथा रक्ितव्यास्तथा चात्तास्त्वयेव प्रार् परतिभ्रतम् ४०।| आतंजनों की रक्ता करता टं ॥९०॥
हरिश्चन्द्र उचाच हरिश्चन्द्र बोले-- | भगवन् साम्पतं नास्ति दास्ये कालक्रमेण ते। हे भगवन् !दससमय मेरेपास ऊ नर्द
काल वीतने पर दुगा । हे व्रह्मपिं ! मेस सद्धादं प्रसादं इर् बिर्ष सद्वावमसुचिन्त्य च ॥४१।॥ विचार कर मेरे ऊपर छपा क्षीजिये ॥५१॥ विश्वामित्र उवाच विश्वामित्र वोल्े-- ध ।
; भतीध्यस्त हे राजन् ¡ वह अवधि दै उसे प्रव्यक्त िम्ममाणो मया कालः पतीरयस्ते जना । कर शीध् वताच्मो, अन्यथा मेस शापाग्नि तुमको . शीघ्रमाचक्ष्व शापाभरिरन्यथा त्वां परध्यति ॥४२ भस्म कर देगी ॥ ४२॥ 1 । इरिशन्द्र उवाच हरिन वो्ते-- )
मासेन तव विपरष प्रदास्ये दक्षिणाधनम् । हे ब्रह्मपिं ¡ आपकी दक्षिणा प्क महीने
दुगा इस समय मेरे पात धन नदीं है, च्व श्राप साम्पतं नास्ति मे चित्तमनुन्ञां दातुमर्हसि ॥४३॥ सुमे त्राचा दीजिये ॥ ४३॥ ~
विश्वामित्र उवाचं , | विश्वामित्र वो गच्छं गच्छं टूपश्रष्ठ स्वधम्ममनुपालय । हे गरष श्रे ! जाश्रो, जाश्यो. अपने धमे का 1 व, पालन करो 1 पका भागं म कल्याण हो तथा ध्वा भवतु मा सन्तु पौरपान्यनः ॥४४॥| आपके.मिन्न न दों ॥ ४४॥ पक्लिण उखः पक्षी वोले-- अलुङ्ञातच गच्छेति जगाम बसुधाधिप! । ` | ` , इस भकार विभ्वामिगर छौ आन्ञा पाकर जा
दरिश्न्द्र पेदक्ञ रवाना हृष श्रौर उनके पीपी पद्वयामनुचिता मन्तुमन्वगच्छत तं परिया ॥४१॥ उनकी रानी जाती थी ॥७५॥ उस राजा को रानी
ष ओर पुत्र के साथ नगर से वार निकल कर जाते
ते खभब्य तरप 5 पश्र नियानं ससुतं एरात् । दुष देखकर राजा के श्रजुयायीं श्रौ? पुरवासी दष्टा परचुक्रुशः पारा राह्थवाञ्ुयायिनः ॥४६॥| लोग डौडे ॥ ४६ ॥ चौर डे दुःखित होकर करने
-हे नाथ '! हम लोगों को आप क्यो छोड़-करः हा नाय क नहास्यस्मान् सित्या्िपरि 1 0 म ४ पीडितान् जाते दो ? हे राजन् ! राप चडे धर्मात्मा हं तथा त्वे धम्मतत्परा राजन् पोराटुग्ररकृत् तथा ४७] पुरवासियों पर सदा .्नु्रह रखते हो” ॥ ४७॥
-नयास्मानपि रान यदि .धम्म॑मयेक्षे । | र राजभ! यदि धमं का विचार करके आप न
हरं तो है राजन् ! एक क्ण तो उहरिये जिससे. श्त तिष्ठ॒ रजेन भवतो युखपड्कनम् ॥४८ । धम शपे कमलरूपी सुख का.॥ ४८ ॥ रसाखादन
अण्-५ ९, ध माकरदेयपुराण २७
= शश नवर
पिामो ने्भरमरैः कदा द्रष्यामहै पुनः । | अपने मर रूपी न्को कराम । आपको फिर यस्थ प्रयातस्य पुरो यान्ति पृष्ठे च पार्थिवाः ४६। 1 जिसके पीपी राजा लोग तस्यादुयाति भार्येयं शदीत्वा बालकं शतम् । ह
। केवल भायां ही चल र्दी दै । जिसके आगे पदिते यस्य भृत्या; यातस्य यात्यग्रे इजञरस्थिताः ५०॥ ५८ पर यढकर् सेक्गण चलते थै, वे राजा स एष पट्भ्यो रणेन हरिन्रऽ्य गच्छति । | नौर ल 1 दा जन् आ हा राजस् चमार दभ श्रौर आपकी सी चनौर बालक कोमल द ॥ ५०॥ न भु एत्वचछनसम् ॥५१।| ॥ ५९॥ मागं की गै जव सुख पर पडेगी तव प्रथि पाथ खं कीरम्भविष्यति । प्रापकी कैसी दशा दोगी १ हे महाराज ! श्राप यदीं तिष्ठ तिष्ठ शरपश्ेष्ठ स्धम्मैमलुपालय ॥५२॥ उद्रि ओर श्रपने ( राजोचित ) धमे का पालन द्दृशंस्यं परो धर्मः क्षत्रियाणां विरेपतः । सनि 1 9 =, ति ््ैरथापि + तत्रिया का । हे नाथ । सी, पुर, रथ, रि क किं सुतेन धनै चा ॥१३॥| धन, धान्य से क्या १।५३॥ हम दन ५८ त्याग सव्वभेतत् परित्यज्य चायाभृतां वयं तव । + र भे १ ५ {साथ रदेगे । ५, नाथ । हे महाराज । हे स्वामिन् {' हमको श्राप हा नाय हा महारान हा स्वामिन् किजहासि न; ५४ क्यों छते ॥ ५४॥ जद राप दोगे वदी दम यत्रतत्र हि बयं तत् सुखं यत्र वै भवान्। होगे, मकरो छख व ही है जद आपटे) अदां नगरं क यत्र स सर्गो यत्र नो दषः ॥५५॥| ~क बद नगर शर बही ॥ ९५॥ यजा हति पौरवचः । † का यदह बचन सुनकर राजा शोक से पीडित अरि ला रना शोकपरिप्लुतः } | हण तथा उनके ऊपर दया करके भागं मे उस त् स तदा माग तेषामेवासुकस्पया ॥५६॥ समय ठहर गये ॥ ५६॥ विश्वामित्र भी उनको मिश्वामित्रोऽपि तं टटा पौरवाक्याहलीकृतम् मजाजनो के भरेम भे मेडल देखकर बोध से अं रोपाम्षविहताशषः समागम्य वचो्नयीत् ॥१७।॥ वयल त् भ न व 01 पिङ् त्वां दृष्टसमाचारमदृतं जिहमापणम् । अ त क त्व & ४ कर अव उखे वापिस , मरम राज्यञ्च द्वा यः पुनः माक्रष्टुमिच्छसि ४८॥| लेना चाहवे हो ॥४८॥ विश्वामित्रे रोप मरे वचन इत्युक्तः परुषं तेन गच्छामीति सपेपथः | भु ने कंपते हष का किं जाता ज्वभेवं ययौ ९ ४.२ है । ओर शीर श्रपन खली का हाथ सीचकर वभवं यौ शी्रमाकपन् दयितां करे ।॥५६॥| चलने लगे ॥ ५६॥ खम से करित, इमास, कपंतस्तां ततो भाय स्मारी श्रमातुराम् । | यायै को भिखका हाथ कि राजा ने सचा था, सहसरा दण्डकाष्ठं न तादयामास कौशिकः ॥६०॥ ५ ख्या काड के डंडे से मारा ॥ ६० ` तां तथा वादितां शा हिनो महीपतिः उसको इस भकार डंडेसे पिर इ देखकर «ग " र हरिथन्रो महीपतिः । , | दरिथिन्द्र दुःख से श्रातं होते प भी ङं न घोले गच्चामीत्याह दुःखात्तो नान्यत् किचिदुदाहरत्६१॥ केवल यदी कदा कि जाता हँ ॥ ६९ ॥ इसे ५५ , ञ्रथ धिश्च तदा देवा; पंच प्राहुः एपालवः । | रपाल पचि विश्वदेवं साजा दरिशचन्द्रकी वद २ विश्वामित्रः सुपापोऽयं लोकान् कान् समषाप्स्यति९२ र २ व क | | येनायं यल्यनां ष्ठ सराज्यादवरोपितः | रजी { यदह पाष दहै, श्रपणे क्या कः ह ६1... कस्य वरा शरद्धया पूतं शुतं सोमं महाध्वरे ।
॥ ६२ ॥ ये राजा यज्ञ करने बालो मे धरे दै तथा} ^ इसने श्चपना राय्य श्ापको दिया दै 1 चराप्रने क्या “ पीत्वा वयं पयास्यामो शरदं मन््रपुरःसरम् ' ६२॥ पक्षिण उचुः
यक्षे श्रद्ध पूर्वक सोमरस नदीं पिय!१ हम लोग ६ श्रानन्द पूर्वक सोमरस पीकर आरे ६" ॥६३॥ इति तेषां वचः भुता कौशिकोऽतिरपान्वितः
पत्ती वोल्ि-- त उनके यह वचनं सुनकर विश्वामित्र -५
# २ । माषौरडेयपुराण भ्र ८
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[शाप तोन भुय स यूयमवाप्सवथ ॥६४॥ मु हो जत्र ॥ ९४ ॥ उने विनय करते प्र सादित तै ह एन भंएनिः । सन्न होकर मदाभुनि विश्वामित्रजी ने कडा किं ्रातुषत्वेऽपि भवतां भवित्री नैवं सन्ततिः ॥६५। । न होमी ॥६५॥ तुम खी के संसगे से वच रोगे न दारैव ममता न च मत्सरः । | वया मत्सरो श्र का को से च होते इ कौ निम्कत भिष्य ¦ पनः । पुनः देवता दो. जाश्रोगे॥ ६६॥ वी पाचों बिश्व विनिम्ु्ता िष्यय चुर मनि ० १ दैव कौरव छल मेँ द्रौपदी के गभ से उत्पन्न पचा ततो्वतररशः सदेवा इवेश्मनि । | पारडव-पुत्र हण ॥ ६७॥ इसी कारण से वे पाचों ्रीपदीगभसम्भूताः पंच वै पाण्डुनन्दनाः ॥६७॥ मदारथी पाएडवपुत् श्रविवाहित दशा मंदी महाः एतस्मात् कारणाद् पंच पाएढेया महारथाः | नि १ कार ० राप स ¦ ॥६८॥| इदम हे जेमिनिजी ! इसप्रकार श्रापसे पारडव न दारसगरह आ शापात् सस महामुने ५ पुनो की कथा कदी श्रौर श्रापकरे चासो प्रश्नों का एतत् ते सव्वमार्यातं पाएडयेयकयांयम् । | उत्तर दे दिथा, श्रव श्रौर क्या सुनने की रश्च चतुष्टयं गीतं फिमन्यच्छोतुमिच्छसि । च्चा है १ ॥ ६६॥ .
इति श्रीमाक॑रडेयपुराण भे द्रौपदेयोते्॑ति नाम सातवँ श्रध्याय समापन
आखा अध्याय जैमिनिरुवाच जेमिनि वोक्ते- 1 ष भवद्भिरिदमाख्यातं यथामद्नमयुक्रमात् । जिस प्रकार मने प्च किया था उसी भकार
मह कौलं मेऽस्ति हर्थिनद्र कथां भति ॥ १\॥ बरसे प्रापने उत्तर दिया । परन्तु 'धीदंसिशन्् `
की कथा भे मुभे वडा कौतूहल . हा ॥ १॥ हा ! अहो महात्मना तेन भाप वृच्छमरुत्तमम् । | उन महात्मा ने चड़ -दुःख पाया । हे श्रेष्ठ पक्छियो ! कित्र युखमतुपाप ताहगेव द्विजोत्तमाः ॥ २\॥ उन्दने फिर कख खख पाया या नदीं ॥२॥ . .
, परि उचुः | पती वोले--
ह #
: विश्वामित्रवचः शरुत्वा स राजा प्रययौ शनेः। हे जैमिनिजी ! विश्वामित्र येह वचन सुन
शेन्ययानुगतो दुःखी भाय्यैया बालपुत्रया ॥ ३॥ त पत्नी शैव्या तथा पुज सदित स॒ गला षुधापालो दिव्यां वाराणसीं परीम्। -ीर रागे चा ॥ २॥ वह् राजा दिष्य काशी नैषा मनुप्यमोग्येति शूपाणेः परिग्रहः ॥ ४
साति ५ कैलाश परह ॥४॥ दुःखसे श्रातं पनी अनुकूल खी जगाम पटुभ्या दुखात्तः सह् पल्यानुद््लया |
के साथ पैदल जाकर उसने नगर मेँ. प्रवेश कर पुरीपरवेशे ददृशे ` विश्वामित्रमुपस्थतम् ॥ ५॥ देला कि विश्वामित्र भी बह मौजूद ॥५॥ उनको त॑र समनुपराप् विनयाबनतोऽमवत् । ` | वहो मौजूद ह्या देखकरः हरिः बिनयपूर्वक प्राह चैवा्चलिं छता हरिथन्द्रो महायुनिम्। ६।॥| दाथ जोड़कर महामुनि विश्वामित्र से वले ॥६॥ हमे भरणा; सुतथांयमियं पत्नी एने मम । , | ये भर माण पुत्र छर खी ह । दे नि ! इनमे से येन ते कत्यमस्त्याशु तदग्रदाणाय्यैमुत्तमम् ॥ ७ ॥ जिसको श्राप चा ले लीजिये ॥७॥ अरथा हमारे । ९ दनातमहपिः | ८ लिये जो कुच आप आज्ञा करे बह हंम करने को यद्रान्यत् क ॥ ८ ॥| तैयार है ॥-८॥ -. : ध वामत्र उच्च विश्वामिनजी [3 पूर्णः स मासो राजर्षे दीयतां मम.दक्षिणा । , 1
दे राजर्षिं ! षक मदीना व्यतीत दोगया, - सुमे,
पुरी को गया जोकि मटेष्य लोक मे न होकर
# १
राजानं व्यालं दीनं चिन्तयानमधोगुखम् ।
श्र माकंर्डेयपुराण २६
निमितं ह स्त स्वव | दीजिये । राजख्य की दिशा के विपय राज हि सम्यत खवचो यदि ॥ ६ ॥ मे जो श्रापने वचन दिया था वह स्मरणदैया
नहीं ?॥ ६॥ हरिन बोले-
ड बरह्मन ! अभी सम्पण मास नदीं व्यतीत हा है । हे तपोधन ! अभी श्राधा दिन वाङ्गी है, इसलिये परतीत्ता कीजिये ॥१०॥ चिश्त्रामित्न बोले -
हे राजन् ! ेखा दी दोगा । मै फिर श्राङ+गा ] श्रगरः ्चाज नहीं दोगे तो तुमको शाप दुगा ॥११॥ पक्त बोल्ञे -
यह कहकर विश्वामित्र चले गये तथा गजा तओोचने लगे । कटी इद दक्षिणा मे किंस तरह से दुगा ॥१२॥ मेरे मित्र काँ है १ मेर घन कट है ? यदि श्रा ने दिन दी तो सुमे रौरव न्व मे जाना पड़गा ॥ १३॥ कया मे श्रपने प्राणों को त्याग दु, थवा की-चला जाऊ ! श्रगर विना दक्षिणा द्यि मर जाऊ नो ॥ १४॥ ब्राह्मण के
८ दरिथन्द्र उवण्च व्रह्मन्धेघ सम्मूर्णो मासोऽम्लानतपोधन ।
तिष्ठतयेतधविनाद्ध यत् तत् परतीक्षर मा चिरम्॥॥१०॥ विश्वामिन्न उवाच एवमस्तु महाराज श्रागमिष्याम्यहं पुनः) शापं तव प्रदास्यामि न चेद भदास्यसि ॥११॥ पक्िण उचुः इत्युक्त्वा परययौ विप्रो राजा चाचिन्तयत् तद कथमसौ प्रदास्यामि दक्षिणा या भरतिश्रुता ॥१२॥ कृतः पुष्टानि मित्राणि इतोऽयैः साम्पतं मम। प्रतिग्रहः भदु्टो मे नाहं यायामधः कथम् ॥१२॥ कि भरणान् नियंचामि कां दिशं याम्यर्िचनः । यदि नाशं गमिष्यामि मदाय प्रतिश्रुतम् ॥१४॥ स्वत्व को दरण करके पाप वश श्रधम कीट हो ब्रह्मस्व कृमिः पापो भविष्याम्यधमाधमः | जागा । श्रथवा श्रपने को वेचकर रक्षिण दे अथवा भेध्यतां यास्पे वरमेवात्मयिक्रयः ॥१५॥॥| देना उत्तम दै ॥१५॥ पद्िण उचुः पत्ती वोले-
भल्युवाच तदा पत्नी वाषगद्वदया गिरा ॥१६॥ € देखकर गनी ने रोते हप स्थे इणः करट से
चिन्ता त कहा ॥१। हे महागज ! चिन्ता को छोडकर - < त्यज चिन्तां महाराज स्वसत्यमनुपालय । | का पालन करो । सत्यसे वदिष्छृत मवुष्य श्मशान
शमशानवद््जनीयो नरः सत्यवदिष्ृतः ॥१७।॥ की तरद् बरजैनीय दै ॥६७॥ श्रवण्न ह पुरुषि । - नातः परतरं म्प वदन्ति पुरूपस्य तु | पुव्य को ज्रपने 1 करने के ४ - परम धम दुखा कोई नदीं है ॥१८॥ अग्निहोत्र, । यादृशं पुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम् ॥ १८॥ सव्याय, तथा दानादिक सम्पू यायं, , अधिहोत्रमधीतं वा दानाया्राखिलाः करिया | व्यक्ति कौ निष्फल हो जाती दै जिखका कि ५ भजन्ते तस्य वैफसयं यस्य वाक्यमकारणम् ॥ १६।॥ मिथ्या होता है ॥ १६ ॥.ध्मेशाखो मे बुद्धिमानों
तन्तएदिं ^ ~ व्य को मश्चष्य के तारने के लिये अत्यन्त <" । | | सत्य को मद्य के तारने, र सत्यम धरम्मशसेपु धीमताम् वताया है, उसी प्रकार हठ को मञुप्य का
तारणायाव्रतं तदत् पातनायाङरतात्मनाम् ॥२० | करानमे श्रति निष्ट बताया है ॥२०॥ सात अश्व , सुक्ाश्वमेधानाहूत्य रानसूर्यंच पार्थिवः । मेध त व व ध कृतिर्न च्युतः ५ वार श्च | ए. सरोद रानी उदन करने लगी 1 श्रपनी आखा मे आरः वाष्यास्युप्लुतेत्रान्ता्वाचेदं महीपतिः ॥२२॥ भरकर मह्याराज दस्र अपनी सीसे चोले॥प- हरिश्चन्द्र उवाच हरिश्चन्द्र वोले-- विषंच भद्रे सन्तापमयं तिष्टति वालकः । हे भदे ! षस सन्ताप को छोडो, यँ ८५
॥।
। ५५
राजा फो व्याल, दीन श्रौर नीचं सुख कयि `
~ छ न ~
[न ० म्र
३० भा॑रुडेयपुराण 2
=
। पुत्र वैढा है । हे गजगामिनि ! जो ऊं तटं उच्यतां ववतुकामासि यद्रा त्वं गनगमिनि॥२३॥ कहना हो चह को ॥ २६.॥
पलन्युवाच पत्नी बोली-- रानन् जातमपलयं मे सतां युज्रफलाः क्षियः हे राजन् ! मेरे सन्तान हो चुकी, चखियां पुत्र
मू फलके क्लिये ही दोती ह । इसलिये सुमको वेच स मां मदाय विततेन देहि विमाय दक्षिणाम्॥२७॥| कर आहय को द्विश दे दीजिये ॥ २४॥ पण् पक्षीगर बोले एतद्राक्यधुपशरुत्य ययो मोहं महीपतिः । रानी का इसे करार वचन सुनकर जाको
च ;खितः मूलो श्रागई । फिर होश में श्राकर रति भतिलभ्य च दं स विललापातिटुसितः हय विललाप करने लगे ॥२५॥ हे भद्रे !. यद यड़े घोर
` महहृदुःखमिदं भद्रं यत् त्वमेवं त्रवीपि माम्} | इःखलकी वात दै कि तुम रेलाकटती दो । कया |
(य विसता प्रपते पा मम पापस्य ५।२६॥ तुम्दारे देसी से क्त बातालापको भी मे श्प : किं तव स्मितसंलापा मम पापस्य विस्फताः पाप के कारण भल गया !? ॥२६॥ डे शुभानने ¦
हा कथं लया शृकयंवक्तमेतच्छचिस्मिते। हा! तुम इस थश्रार कैसी किन गत कह रदी । दु्व्वाच्यमेतद्वचनं कतु शक्रोम्यदं कथम् ॥२५७।॥ हो ? मै किख भकार तुम्हारे दस दुव चन का पालन इत्युक्तवा स नरश्रेष्ठो धिग्धिगित्यसटृटुत्रवन्] | करः ख्थुगा १॥ २७। वे महात्मा राजा यह ककर
+ श्रपने को ्रनेक वार धिक्ञारने लगे ! तथा मुच्छ निपपात सहीृष्ठं॒मूच्छंयाभिपरिप्लुतः ॥२८॥ द
शयानं चवि तं दट्ा हरिन महीपतिम् । | को भूषि पर गिर हा देखकर श्रत्यन्त दुःखित उवाचेदं सकरुणं राजपत्नी सुदुःखिता ॥२६।॥ हो रानी करूणा पूर्वक वोली ॥ २६॥
पल्सुवातच रानी वोली-- । हा महाराज कस्येदमपध्यानुपस्थितम् । महाराज ! किस लिय श्राप इस पकार
सूर्धित होकर पृथ्वी पर गिरे हो ? यदि आपदी यत् तवं निपतितो भमौ राङ्कवास्तरणोचितः।।३०। इस तरह करेगे तो साधारण मलुष्यों की क्या
गिनती है ? ॥३०॥ जो मेरा खामी प्रथ्वीपति येन कोच्यग्रगो वित्तं बिमाणामपवन्मितम् | स॒ एष पृथिवीनाथो भूमो स्वपिति मे पति;॥३१।॥| चह चाज भमि पर श्यन करता है ॥३१९॥ हा
१ भ क न यन 1
यदिन्रगरतसो्यं नीतः भापनी दशाम् ॥३२॥ को भात हया ।द२॥ यह. वकर बह रानी इत्युक्या सापि सुश्रोणी मूच्छिता निपपात ह ] | खामी के दुःख रूपी मदा सहा भार से पीडित
भ्त दुःखमहाभारेणासघ्न निषीडिता ॥२३॥ स दोग द प्ली परर पड़ी ॥ मति खर प्ति दनाका अनध क्म तरह भाय तौ तथा पतितौ भूमावनाथौ पितरौ शिः पर पडे ह देखकर शरत्यन्त भूख से पीडित ोकर दृष्टात्यन्तं सुधाषिष्टः भाह वाक्यं सुदुःखितः ।॥२४॥ ध ॥ २७ ॥ स ¡ सुशको अन्न दीजिये, हे माता ! सुभको खाने क लिये दो, मुभे पात् तात ददस्वन्नमस्वास्ब भोजनं दद् | वड़ी भूख लगी है तथा मेरी जिहा का अघ्रंभाग न्मे बलवती जाता जिहर ष्यते तथा ॥२५॥ सखा जा रदा है ॥ २५॥ । पन्िश-उख | पत्ती वोले- .एतस्मित्रन्तरे भराघ्रो विश्वामित्रो महातपाः । इसी समय तपस्वी विश्वामि्र भी वहाँ भा त तं हरिन पतितं शि मूचितम् ॥३६॥| पच ओर टी पर शन्त पडे हर् रजा
दरेश्वन्द्र को देखा ॥ ३६.॥ वे जल के स॒ वारिणा समभ्युक्ष्य रानानमिदमव्रवीत् । | कर राजा दसिन्द्र से बते ५) व
०८ माकंण्डेयपुराण ३१ .
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उतिष्ठोतिष्ठ राजेन तां ददस्वेष्टदक्षिणाम् ॥२७॥| उघे श्रौर मेरो दकिणा सुमे दो ॥ ३७॥ ऋर को शरणं धारयतो दुःखमंहन्यहनि वदधते । | कयम रखने से दिन-दिन ल बदृता है, जिख
भकार वरं से जल शनैः शनैः उणएडा होतादी ज्ञाता आप्याय्यमानः स तदा हिमशीतेन बारिणा॥२८॥ ड ॥२॥ दोश मै श्राकर राजा बिश्वामिन को ठेख
श्रवाप्य चेतनां राजा विश्वाभित्रमवे्ष्य च । | कर फिर मूषित होगा । इससे शुनि विश्वामित्र पुनमोहं समापेदे स च क्रोधं ययो शनिः ॥३६॥ बहत ष १ ॥१६॥ फिर ५ स + द्रनोचभः राजा को होश मे लाकर यह वचन ध्यदि स समाश्वास्य राजानं वाक्यमाह द्विजोत्तम छो वत शा निवार ॥ तो पि दीयतां दष्षिणा सा मे यदि पभमवे्षसे ॥४०॥| रो ॥४०॥ सत्य से सूं कामान् दै, सत्य से सत्येनाकः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी । | दी पथवी ठ्ठरी इ दै, सत्य को ही प्रम धम सत्यश्वोक्त' परो धभ्मैः स्वगे सव्ये प्रतिष्ठितः ४१। का है ओर स्वगं 9 । धसुहस्र ४ एक हजार अश्वमध का पक शरोर श्रर सत्य अश्वमेषसहस्तश्च सत्यंच तुलया धतम् । दृखरी श्योर तुला परः रखिये, जार शश्वमेध यज्ञ अश्वमेषसहसार्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥४२।॥| ऊ पुश्य से सत्य अधिक वैदेया ॥४२॥ श्नथवा सुस अयमा किं ममैतेन साम्ना भक्तेन कारणम् । | यद सव एक दु, पी, रूर शीर मड रे सामने नाय्य पापसङ्कसपे रर चायृतबादिमि ॥४३॥ क्यों कहना चाद्ये १॥४२॥ हे राजन् ¡ तुम मे त्वयि राज्ञि भवति सद्भाव; श्रुयतामयम् । | सद्ाव मौजूद है इसलिये मेरी खनो । यदि तुम शरद्य मे दक्षिणां राजन् न दास्यति मवान् यदि रान भेरी दक्षिणा न दोगे तो ॥४४॥ सुरया होने ,
= ल पर तमको निश्चय ही शाप दंगा । देतना कहकर ` शरस्ताचलं 1 शप्स्यामि व ष् । वह विभ विशवामि्नजी चलते गये श्रौर राजा भी इत्युक्तया स ययो विमो राजा चासीद्रयातुर)४५।॥| भय से विल दोगयेः ॥ ४५॥ ।राजा ने कडा कि
{५ कान्द्गमूतोऽ्यमो निःस्वो गृशंसधनिनार्दितः। | मेरे समान द, श्रभागा, निर्दयी तथा ऋरब्रस्त भाय्यस्य भूयः भिदं क्रियतां वचं मम ॥४६॥ 1 दै १ ने कटा स श मरा शापानलनिरदः पंचत्वषुपयास्यसि । | करद = सुत क च ॥ ४९ शपि क
ह 0 मै दग्ध होकर रत्यु को प्राच नदो जघ्न । दस स तथा चोचमानस्तु राना पल्या पुनःपुनः।॥४५७। प्रकार पत्नी के वार वार भरणा करने पर ॥ ४७॥ , ४
प्राह भद्र करोभ्येषप विक्रयं तव निधरणः | साजाने कटाहे अद्रे । मे तमको वेचनेका घृणित । शतैरपि यत् करतु न शयं तत् करोम्यहम्४८।| काम करुणा ¦ ओ काम कि इति निवी लोग भी | , यदि मे शक्यते वाणी ववतुभीटक् सुदुर्वचः) नहीं करते है चह ओं करेगा “ ॥४८॥ यह कोर! ;
भाव्य $ बचन कटने दी मेरी वारी मे शक्ति है क्या १ य ' एवशुवत्वा ततो भाययौ गल्ला नगरमातुरः । काटकर स्री के साथ. शीघ नगर को गये श्रौर
वाष्पापिहितकर्टकषस्ततो वचनमब्रवीत् ॥४६॥| अशुशरोख कारश सं धे कठ यह बचनवोले ॥
१८
राजोवाच राजा बोले - ‡ ५ भो भो नागरिकाः सर्वै शृणुध्वं वचनं मम । हे नागरिको ! श्राप सव मेरे बष्वन को खनो ! ,:
. | यह क्या पृकतेदोकिमैकौनर्हं१ मे पक न्. ", कि मां पृच्छथ कस्त्वं भो दशंसोऽहममातुषः ५०॥।॥| शौर मदप्यता से हीन व्यक्ति दँ ॥ ५०॥ 4 + :
; षा ` | किन राप्तस तथा उससे भी अधिक पापी ह ५ राक्षसो घातिकठिनस्ततः पापतरोऽपि वा । शनी जी को वचने तो ववार ह जर वो क
विक्रेतुं दयितां भाक्तो यो न भराणांस््यनाम्यहम्५१ नहीं त्यागता दह ॥९१॥ यदि किसी को मेरी भाण" यदि बः कस्यचित् कायं दास्या भाष्या म॒म] | भिया को दासी के रूप मे लेना हो तो पीघ्ता से स व्रवीतु त्वरायुक्तो यत् सन्थारयाम्दम्।५२।॥ बोलो जिससे यद कायं समासो ॥ ५२॥
, ३२ माकेएश्यपुराण अ०८
पक्लिण उचुः पकती वोले- ू ञ्रथ दद्धो द्विनः कथिदागत्याह नराधिपम् । इसके वाद् पएक वृद्ध आह्यण कीं से श्राकरः
।५३॥ राजा से बोला, इस दासीक) सुभे दो, मे खरीदार समयस मे दासीमहं क्रेता धनमदः ॥५३ तथा इसकी क्रीमतत दंगा ॥ ५२ ॥ मेरे पास धन
दस्ति मे वित्तमस्तोकं सुषमारी च मे परिया | बहत है शौर मेरी शी गोभल है रौर धरका का ग्रहकम्प न शक्रोति कततेमस्मात् भयच्छ मे ॥५४। | नहीं कर ५५ इसलिये तै .श्से मागता ॥५५॥
॥ तेरी खी सप श्रौर शील खे युक्त दै यद सखव काम \ कमएयता चयो रप शीलाना तव योषित करलेगी । इसलिये इसके अचुकृल क्रीमत लेकर । अनुरूपमिदं धितं शृदाणाप्य मेऽ्वलाम् ॥५१॥| इस स्री को मेरे सुपु कर ॥ ५५ बद ब्राह्मण के एवुक्तस्य विमेण हरिधनद्रस्य भूपते | इस प्रकार कहने पर राजा हरिशचन्द्र का हृदय फट
गया श्नौर अत्यन्त क्गेशित होने के कारण बह छु व्यदीय्येत् मनो दुःखाच चनं किंचिदतरषीत्॥१९॥| न योला ॥ ५६॥ इसपर उस बुध राय ने राजा के ततः स विप्रो वरपतवैसलान्ते ददः धनम् 1 | वल्कल कख ॐ छोर से रानी का मूल्य वध दिया वहुष्वा देरोष्थादाय दृपपत्नीमकर्षयत् ॥५७।॥ शरीर रानीके कय 4 लावी त राजा के पुत्र रोहिताश्व के ररोद रताश्वाऽ द इषव मतिस् । | शोभायमान ये, माता को इस भकार सी जाते हस्तेन वस्माकपषेन् काकपक्षधरः शिशुः ॥५८॥| हु देखकर अपने दाथसे उसका वख पकड़लिया॥ राजपल्युवाच रानी वोली- ंचाय्य सुच तावन्मां यावरपश्याम्यहं शिथम्। | न स लोढो, खमे चोड़ो पी देर व .1+५.९।\। म अपने चच्ये को टेखलं ! इसक्रादशैन फिर दुलभ ठु भिष्यति ।५९॥] हयो जायगा ॥ ५६॥ ह वतत ! सुमतो देखो.ठगदारी पश्येहि वत्स मामेवं मातरं दास्यतां गताम् । माता चव दासी होगङई है ।, है राजपुत्र ! .मुभको फ) मां म! स्पाक्षी राजपुत्र असपृश्याहं तबाधुना॥६०।॥| दोडो, चव मै तुम्हारे येग्य॒ नदी (५ द ५ तरह कहकर माता के फिर खीचे जाने पर श्रौर ततः स वलः सहसा ददा कृष्टान्तु मातस्य् । | शाने वदृने पर वह वाल उदधिग्न होकर श, मा समभ्यधावदम्बेति स्दन सास्राविलेक्षणः ॥६१॥| इस प्रकार रुदन करता ह्या पदे भाया ॥६१॥
~ यथपि उख खरीदार ब्राह्मण ने उस अति हुए चचचे दिन १ पटा ध तमागतं हिनः क्रोधादवालमभ्याहनत् पदा । कोलातसेमायापर्तुफिर भो उसने भामां :
वदंस्तथापि सोऽमवेति नेवाघ्ंचत मातरम् ॥६२।॥ कहते हय पीके भागना न चोडा ॥६२॥
राजपत्न्युवाच रानी वाली-- भ्रषादं छर मे नाथ क्रीणीषेषुव बालकम् । दे महाराज ¦ मेरे ऊपर छपा करके इस वालक : `
| : भवतो धिननं ग-चीर खयर लीभिये । यथपि श्रापने सुभको क्रीतापि नाहं मवत विनैनं काथ्यसाधिका ॥६३॥ | खरीद लिया दै परन्तु इस चालक फे विना मै नाप
इतयं ममासपमाग्यायाः भरसादसुशखो मव । | के कायं को भली घकार न कर सकगी ॥ ६३॥ ,
: म्रा संयोजय धारन वतेनेव पयस्िनीम् नीम । इस धकार मुभ अ्रभागेनी पर चया करके गाय से । मां संयोजय वा १ ष स्वनीम् ॥६४॥ दय पीते इय चदे को लग न कीजिये + द४॥
{ ब्राह्मण वोक्ला- १ शृद्यतां वित्तमेतत् ते दीयतां वालको मम वित्त लेकर इस वालक को भी सुभे दीजिभे ! दीपुसोधम्मेशाचहेः कृतमेव हि वेतनम् । .. व के क्ञाताश्यों ४ 9 लक्षं कोरिमृर्थतथा परैः ॥६१।| को ुत्रसहित लेना चाष्टिये।सौःदज्ञारःलाख, करोड शत॒ स क रः ॥8 या र अधिक जो चाष्टिये सो ले लीजिये ॥ ४ पक्ती । . ~ . तस्य तद्वित्तं बहुध्वोत्तरपटे ततः । उसी भकार उस वालकति कीमत भी.राजाके
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( स्यवंशमसूतोऽ्यं सुङ्मारकरागुलिः ।
भ०८ ५ माकेण्देयपुराण ३९
भगृह्य वाल्लकं मात्रा सरैकस्थमबन्धयत् ॥ चरमे वांघदी रौर मादाके साथ वालकको लेकर नीयमानौ ठु तौ टा मायात स पाथिवुः। | चाल 1 छो स भर ली ॥ ष्णं पल पुचको लेजाते हप देखा । दुःखसे ्रातै होकर सुदु # १ = भ (4 विरालाप ४ खरता पुन; पुनः९७।| बड विलाप करने लगा तथा वार-चार गम श्वास यान वायु चादित्यो न्दुनं च पएथ्जनः । लेने लगा ॥६७॥ जिस रानी को पवन, सू, चंद्रमा दृष्टवन्तः पुरा पत्नीं सेयं दासीत्वमागता ॥६८।॥| या किसी भी इतर भदुप्यो ने न देखाथा च चाज दासीपन को प्राप्त दुरे ॥६८॥ श्रौर सूयव शमे उत्पन्न क्रयं पि एटि यह सुकुमार वालक भी विक गया । मुभ दुमति ११ विक्रयं बालो धिङ्मामस्तु सदुममतिम्६६। को धिर ॥६६॥ हा भिये हा वत्स सुमजैखे हा भ्रिये हा शिशो पत्य ममानाय्येस्य टुनयः । | द्र चीर न्यायी की पेसीं दुरवस्था में भप्त होने
दैवाधीनां दशां प्राप्रोन मृतोऽसि तथापि धिक्७ ०\।| पर मी मत्पर नहीं होती है। सुभे धिक्तारहैं ॥७०॥ पक्षिण उचुः प श तं वलो रहः घ॒ मजी । ध दिभिसतं „० ॥ < ५
गेदादिभिसतगेसतावादाय त्वरान्वितः ॥७१॥ गया ॥७१ ॥ इतने भै ही विश्वामित्र ने बां विश्वामिनरस्ततः पराप गृपं वित्तमयाचत् । श्राकर राजा घे दक्तिणा मांगी । दसिथन्द्रते भी तस्मै समर्पयामास हरिधनद्रोऽपि तद्धनम् ॥७२॥ वद व । दे दिया ॥५७२॥ क के
तद्वित विकने से शोक मे इवे हप यजा खे उस थोड़े धन तद्वित स्तोकमालोक्य दारषिक्रयसम्भवम् । | दो देखकर विश्वामिन नै पित होकर कहा॥७३॥ शोकाभिभूतं राजानं पितः कौशिकोऽत्रवीत् ॥७२।। हे राजन्! यदि तु. मेरी इतनी द यक दरण
षत्रनन्धो ममेमां तं सदृशीं यज्ञदक्षिणाम् । । समता दै तो मेरे घभाव को देख ॥ ७४॥ तपसे ओ शुम भ उप्एता है उसको, मेरे शद्ध ब्राह्मणत्व
मन्यसे यदि तत् क्षिमं पश्य वं मे वलं श दि तत् किरं पश्य लवं मे वलं परम् ७४॥ को, मरे शुद्ध रौर उग्र पभाव को तथा मेरे खा-
४
` तपसोऽत्र सुतस्य ब्राह्मण्यस्यामलस्य च । | ध्याय को देख ॥ ७५॥ मलमभावस्य चोग्रस्य शद्धस्याध्ययनस्य च ॥७१५॥| हरिन्द्र वोले-- . ,. हरिश्चन्द्र उवाच हे भगवन् ¦ शीर भी दगा, थोड़ा समय श्रौर
न्यां दास्यामि मगवन् कालः कथिसमतीक्ष्यताम् । | ठहरिथे । पत्नी श्नौर पुज को वैच का, रव मेरे सास्मतं नास्ति विक्रीता पत्नी पुत्रश्च वालकः॥७६। पास कचं नदीं दै ॥७६॥
[* [> [ १ पोल विश्वामित्र उवाच विश्वाभि बोले-- 1 हे राजन् ¡ इस समय दिन का चौथा भाग दै
| चतुभागः स्थितो योऽयं दिवसस्य नराधिप । | धक समास होने क वद मदर किसी समय एष एष प्रतीक्ष्यो मे वक्तव्यं नोत्तर तया ॥७७]॥ की प्रतीका न करूंगा ॥ ७७॥
। पत्तिण उचुः पक्षी त ह (र निष्टं निघ्रं चः राजा हस्िन्द्रं से इस प्रकार निर शरोर तमेचछकता राजे निष्टं नष णं कचः । निर्दयतापूरौ बचन कहकर तथा उस धनको लेकर
तदादाप धनं तूणं पितः कौशिको ययो ॥७८॥ विश्बामिन्न जी क्रोधित होकर चले गये ॥ ७८॥ ७ 8 शसो ^ निश्वामिन करे जाने पर राजा भय शरीर चिता के
विश्वामित्रे सते राजा भयशोकान्धिमध्यगः | | सागर मँ निमग्न दोकर नीचे को घुस करको वेड शवे तथा सव वात भली भांति सोचकर ऊचे
“सर्वाकारं तरिनिशचित्य भवाचोचेरथोयुखः ॥७६॥| स्वर खे बोले ॥ ७६॥ यदि 1 को
मेष्येण मानवः श्रावश्यकतादो तो वद् वोले शौर सुभे अज संध्या -विक्रतेन यो ही मया शात से पदिलेदी शीधतापूर्वक लेले, मे विकले की इच्दा स त्रधीतु त्वरायुक्तो यावत् तपति भास्कर; ॥८०॥।।.क्ररता ह ॥ ८०॥ उसी खमय शीधदी धर्मं चांडाल
1 ५ ४
३४
प्रथाजगाम त्रितो धम॑श्ण्डालरूपधरक् ।
दुर्गन्धो धिकृतो रक्षः मधुलो दन्तुरो धृणी॥८१
कृष्णो लम्बोदरः पिङ्ग-रुकषक्षः परुषाक्षरः ।
गृहीतपक्षषुज् शवमास्येरलंृतः ॥८२॥
कपाहस्तो दीर्घास्यो भैरबोऽतिवदन् शुहुः
श्वगणाभिषठतो घीयो यष्टिस्तो निराकृति; ॥८२॥ प्वरदाल उवाच
श्रमी त्या शीघ्र कथयस्वात्मवेतनम् ।
स्तोकेन बहुना घापि येन वै लस्यते भवान् ॥८४॥
पक्लिण उचुः
तं तादेशमथालक्ष्य क्ररदष्टिं सनिष्टुरम् ।
वदन्तमतिदुःशीलं कस्त्वमित्याह पार्थिव; ॥८५। श्यरडालं उवाचं ।
चणडालोऽमिहास्यातः मधीरेति पुरोत्तमे ।
वि्यातो वध्यवधको गृतकम्बलहारकः ॥८६॥ हरिश्न्द्र उवाच
नाहं चरडालदासत्वमिच्छेयं सुषिगर्हितम् ।
घरं शापाभ्निना दग न चडालवशं गतः
पक्षिणः ` तस्येवं बदतः मापनो विश्वामितरस्तपोनिधिः कोपामषेविषताक्ष; पाह चेदं नराधिपम्
विश्वामित्र उवाच चण्डालोऽ्यभनस्पं ते दातुं पित्तमुपस्थितः
` कस्मान्न दीयते मदयमशेषा यतदक्षिणा
। ॥ि हरिश्चन्द्र उवाच भगवन् सूव्यवशोत्थमात्मानें वेचि कौशिक । कथं चण्डालदासत्वं गमिष्ये पित्तकायुकः
न ` विश्वामित्र उवाच , `: यदि चणएढालेषित्तं त्वमात्मविक्रयनं मम 1 ` न प्रदास्यसि कालेन शप्स्यामि त्वामसंशयम्॥६१।
दरिशनद्रस्ततो राजा चिन्तावस्थितजीव्रितः । ` . बदन् पादषेनगाह विहलः
॥८७॥
॥८८॥)
~~
। ८६॥
॥६०॥
माकरुडेयपुराणं
अण
“का रूप धर कर श्राय । चारडालके प्रत्येक अङ्गसे
दर्गन्ध श्मारदीथी तथा उस धृशित मटष्यके वड़े २. दाँत श्नौर भूं थी ॥ ८९ ॥ काला रङ्ग, लम्वा पेट, पीली शौर रूखी शाखं, बहुत से पक्चियो को साथ लिये हण तथा युरडों की माला पिने हुए ॥ ८२॥ हाथ मे खत भुण्डं लिये हुए, भयानक श॒च्द कता हुश्रा, बहुत से कत्ता से धिरा इं तथा दस्र ` हाथ मे लारी लिये हुए. बद श्राया [प्रा चचारडाल वोला-
मै तेरा प्राकर, श्रपना मूल्य शीघ कहो, थोडे या श्रधिक मूल्य जितनेमे भी तुम पराप्त दोसको ॥ क्ती लोग घोले~- ।
उसको इस तरह कूर, निष्ठुर चौर दुःशील देखकर राजा ने कटा कि तू कौन हे १।८५॥ व्वाएडाल बोला-- ।
मँ चारडाल है रीर पृथ्वी पर म रहता है । मैः वध्य जीन का वध करता द ओौर मुरः फो कम्बल भीेताह॥ ८६॥ हरि्नदर बोले- ।
` मे चारडाल के निन्दनीय दासंत्व मे जने की
इच्छा नदीं करता ह । चाराडाल के यश॒ मे जानेषे 9
शाप की अग्नि मे दग्ध होना रच्छ है ॥५८७॥ पत्ती वोक्े-
जिख समथ राजा दस्थिन्द्र यह कह रहे थे उसी समय क्रोध श्रौर ईयां से श्रं विगाड़े इषः तपस्वी विश्वामिज वदाँ आकर राजासे यदह बोले॥ विश्वामित्र बोले- ।
यह घारडाल तुश्दे पञुर धन देने के लिये उपस्थित ह, सिये मुभे चाङ्गी यक्घ-दक्तिणा क्यों नहीं देते दो १॥८& ॥ . दस्थिन्द्र बोजे
हे भगवन् ! दे विश्वामि्जी ¡ म जानता ` है कि गै स्ूरयवंशोत्यन्न ह । धन कीं कार्मना फे लिये किंस भकार चण्डाल का दास वनुं १॥ ६०॥ चिश्वामिच वोल्ते- ।
. यदि तुम चारडाल से अपना मूल्य लेकर मुः न , दोगे तो तुमको निस्संदेह इस समयं मे शाप दूंगा ॥ ६१॥ पच्ती चोले-
` उससमय राजादरि्वनदर घोर चितामे निमग्न दोग । “कृषा कीजे" इस मकार कहते हप
॥६ २ व्याङ्ुल होकर उसने बिश्वामिव्रक् चरण पकङ्क्तिये
भ्र
माकंरुढेयपुराख ३५
हरिशन्द उवाच
दासोऽसमयार्तोऽस्मि भीतोस्मि लद्क्त विरपतः |
हरिशन्द्र वो्ते- । दे वहमपि ! मे दुखी है श्रापका दासर्ह श्रापसे डरता ह .तथा श्रापका विशे रूप से
कर भसादं विरे कषटश्वण्डालसङ्करः ॥६३॥| भक । छपा कीजिये श्र चागडाल के संस्ैरुषी
भवेयं वित्तरेपेण स््वकरम्मकरो बशः ।
. तवैव एनिशादं ल ॒भेष्यरिचि्ाजुवततेकः ॥६४।
विश्वामिनज उवाच । यदि प्रेष्यो भम भवान् चणए्डाज्ञाय ततो मेया ।
दासमाव मचुपराप्नो दत्तो विचचाव्वदेन यै ॥६५॥| चाडाल को अ्ुंद
पक्तिण उचुः एवघ्क्तं तदा तेन श्वपाको हएमानसः।
विश्वासित्राथ तद्रव्यं दत्वा वहुध्वा मरेधरम्॥६६॥
दण्डमहारसम्धरान्तमतीव व्याकुलेन्द्िय् । इष्वन्धुवियोगात्तंमनयभ्निजपत्तनम्
हरिथन्दरस्ततो राना वसंधणएडालपत्तने । भातमध्याहसमये सायज्चैतदगायत
+ वाला दीनथुखी श्य वालं दीनग्ुखं पुरः ।
मां स्मरत्यसुखापिष्टा मोचयिष्यति नौ तृपः॥६६॥
उपा्तवि्तो विभाय दक्वा वित्तमतोऽधिकम् ।
नसा भां गृगशावा्षी वेत्ति णपतरं कृतम् ॥१००॥
रज्यनाशः सुदृत्यागो भाय्याततिनयविक्रयः |
प्राप्न चरडाल्लता चेयमहो दुःखपरम्परा ॥१०१॥
एवं स तिसन् नित्यं सस्मार दयितं सुतम् ।
भार्य्यान्वात्मसमाविषं हृतसव्वंस् ्रातु२॥१०२॥
क्स्यचिरथ कालस्य मृतचेलाप्दारकः ।
न गक
, चरएडलिनादुरिष्श्च मृतचे्ापहारिणा ।
शवागमनमन्विच्छनिह तिष्ठ दिवानिशम् ॥१०४॥
हृदं राङ्ञेऽपि देयज्व पद्भागन्तु शबं मति ।
त्रयस्तु मम मागाः स्यु भागौ तव वेतनम् ॥१०५॥
इति प्रतिसमादिष्टो जगाम शवमन्दिरम् ।
दिशन्मुदक्षिणां यत्राराणस्यां स्थितं तदा ॥१०६॥
गमशान् धोरसंनादं भिबाशतसमाुलम् ।
। ६७॥
॥६८॥
हरिथन्द्रोऽमवद्राजा श्मशाने तद्वशानुगः ` १०३॥
कषर से वचाय ॥६२॥ हे सुनिवर ! आपका जो घन मेरी ओर शेप है उसके कारण मँ .श्चपके वश मे होकर श्रापका सव कायं आपकी आज्ञाुसार दिल लगाकर करू गा ॥ ६४॥ "
विश्वामिनजी वोले-. यदि तुम मेरी आज्ञा मानते हो तो मैने तुमको
४५
द् द्रव्य फे वदले मेँ दिया ॥६९५॥ पकती वोले- । | विश्वामित्र के पेखा फदने पर चाएडाल बहुतः प्रसन्न हुता श्नौर उसने विश्वामित्र को वह् धन देकर राजा को वाँध लिया ॥ ६६॥ चार्डाल के डरडे की चोट से गम्भीर, ्रत्यन्तं विदल तथा भाई-वन्धुश्रों के वियोग से दुः्ली पेखे राजा को बह चाएडा्न पने घर ले गया ॥ ६७ ॥ तव राजा हरिश्चन्द्र चारडाल के गृह मे रहने लगे । प्रातः, मध्याह्न तथा संध्या समय राजा इख प्रकारः गायन करते थे ॥ ६८॥ बह दीन पुल चाली मेस पत्नी दीन मुल बाले पुव को देखकर मुभे स्मरण करती होगी ्रौर सोचती दोगीकि राजा हमको ह्ुडावेगे ॥&६ ॥ जो धन मने शच्रपने को वेचक्रर भौर अधिक ब्राह्मण को दिया है उसको बह भगशावकनयनीं नदीं जानती है, इसक्िये वह सुमे पाष सममरदी होगी ॥\००॥ श्रा ! यह महान् दुःख ह कि सज्य का नाश, भि छा त्याग, पल्वी छोर पुत्र का विक्रय ज्र श्रन्त भै चारडालता ॥ १०१॥ सीं तरद वह पत्नी श्नौरः भुत का नित्य स्मरण करते रहते धे तथा सर्वैस हरण दो जाने के कारण ्गेशित ये ॥ १०२॥ छं काल व्यतीत होने पर सतक के ऊपर का वख लाने के लिये त ने राजा को कटा ॥ १०६ ॥ तक्र पर से वख ने बाल्ञे उख चाण्डाल ने राजा को चदेश किया किः भरत्येक आते इषः सुद को देखो ओर श्मशान मेँ रात दिन रदो ॥१०४॥ उस से चां दिस्सा यहाँ के रजा का दै, तीन दिसते मेरे मागके दै तथा दो दिसते तुम्दारे वेतन के ६॥१०५॥ दस प्रकार श्रा देश पाक राजा काशी की दक्षिण दंशा की श्योर. जद स्मशान था गये ॥१०६॥ उस स्मशान मे , शब्द होता था तथा सैकड़ों सियार वर्ध रते थे,
३६ माकेएडेयएुराण ०८
शबमौलिरमाकीं श ५ शवमोलिसमाकौणं दुग्धं वहुधुमकम् ।१०७।| धी तथा वहु धुरा उट रा था ॥ ९०७॥ पिगराच
प्शिच-भत-येताल-डाकिनी-यक्षसडक्ुलम् । | भूत. वेतालः डाकिनी, यकत, गिद्ध, सियार ञ्जौर 2 छ न्तो से वह जगह व्याप्त थी ॥ १०८ ॥ दृङयों के ृभरगोमाधुसङ्कीएं श्वन्द परिवारितम् ॥१०८॥| ठेर से कथा दु्मन्ध॒से वह स्थान पूर था ।
चारो श्नोर मुद पड़े हुए ये, वहत इ्गन्धि श्या रही
श्रस्थिसंधातसङ्धीएं सदादुर्गन्धसंङलम् । | अनेकों सुदो के वन्धु वान्धचों के कररकन्दन से -
नानागृतसुहाद्-रोद्रकोलादलादुतम् 1 १०६।॥| चह स्थान भयंकर ओर कोलाटलबुक्तथा [६०६ ह 1
पुत्र, दा मित. दा बन्धू, ठ! राता, न्स, मेरीपिया
हा पुत्र मित्र हा न्धो भ्रातवत् भिया मे! | हा व त ति हा प्ते भगिनि सातहां मातल पितामह ॥११०॥| रादि ॥ ६१० ॥ हा माताम, हा पितामह, डा पौव मातामह पितिः पौत्र क गतोऽस्येहि वान्धद । | कँ यये १ इस अ) वाले की क इत्येवं वदतां यत्र ध्वनिः संभ ते वहम सदेव नाई देती थीं ॥ १११ ॥ मस चौ ४ स ५ मज के जलने से उत्पन्न द्र छन, दनी आवाज्ञ स्वलन्मंस.चसा-मेदच् सच्छमितरलम् ११२ | से चह स्थान व्याप्त था 1११२ अधजल्ते श्रतदेद अद्ध दग्धाः शवा, श्यामा विकसडन्तपंक्तयः | | शयामवसं होकर तथा दतं कीप॑क्तियां दिखतिदुर हशन्तीवाण्निमध्यस्थाः कायस्येयं दशा खिति११३' | अग्नि सं पड़ इ पेसे मलम दोते थे मानों स रहे है ॥११२॥ ब्छ पर ग्नि मे चर-वर शब्द
अग्तेधट्चयशब्यो ` वयसामस्थपंक्तिपु ह्येता था. कौर की पक्तियां हडिडयों पर वैरी | इड थी, चर्ध-चान्धचों के ठन. क्रा शब्द तथा
वान्धषाक्रन्दशन्दथं पुकसेषु प्रहपंलः ॥ ११४१ पक्स डोमों ऋ पसश्षता ऋ रस्य दिखाई ठेचाथा.
गायतां भूत-वेताल-पिशाचव-रसाम् ॥ ॥ ११७ 1 छर अत. {पराचि चता सर राच
॥ कि
के फुरडं ॐ गत्ने वजाने के घोर शब्दस व जगह ‡
श्रयते सुमहान् योर करपन्त व निःखनः ।॥११४।॥ यलयकाल के समान् मयान माल्म होती थी ,
1 ११५ ॥ रत्खो के ठेर स्थानों पर पड़ हुए काले
महामहिषकारीष-गोशश्द्राशिसडङ्कलम् । मेसो के समान समालम होते थे, उन्म से उडी ह्रै.
। भस्मं इड्यं के ठेर पर चेटती थी जिखसे वे देर `
दुतथमस्तहट सास्थिमिर्बतः ।\ ११६! भ? ते अ चतं मतेः १९६ | प्ैताकार मालुम होते थे 1 १९६॥ नेक प्रकार
नानोपटारसग्दीप-काकषिक्षकालिकम् । ने की चीज, मालाओं च दीपकां को कौर शरनेकशब्दवहुलं श्सशानं नरायते ।\११७॥ चीर फाड़ कर उलट थे तथा वहु - समद्विररििः सियासत ¡ घकार के = स्मशान यर्हित हो रहाथा॥११७ नादितं # | अग्नयो से पूरः अद्ुम सिया मीपर सेने की भीपणरावगहरम् नादि गम् | । आवाज से यु तथा मनो के रोने पीने कौ भूय भयस्यप्युप्सज्ञच्म श [ आवाज्ञो खे उछ स्थान मै भय को भय लगता था
रसशानसाक्रन्दविरादरार्णम् ।११८]। | 1 १६८ ॥ वद राजञा बदँ सकर दुःख ज्ौर शोक
राना तत्र सम्भा टुःसितः शोचनोधतः ! | से कूढता धः“ जह्यजी ¦ मेरे सेजक, मन्त्री, ‹
त गतम्११६. सस लोस तथा राज्य कहां रये ९॥ ११६॥ हा हा सृत्यामन्विणो पिपाः क तद्राज्यं विषे गतम्११६| सैन्य चा पुज ! ठम धी सुः मागे को विभ्वामिन्ं
दा शन्येपुत्र दावा मां स्यक्ला मन्दभग्यकम् । | ऋ दोय से दोड़ कर कटां गये १॥ १२० ॥ इस विखामित्रस्य दोषेण गता; त्रापि ते मम 1१२०}. पकार चिन्तायुक्त चौर केष्टे तथा सव अलं अ इत्येव चिन्तयंस्तनर खणडालाक्त पचः पुचः मालयरतः अर स्खलछापच ह {जचक्ते पसे चह यजा
मलिनो सषस्वोङगः केशवान् गन्धवान् ध्वजी १२१। पप स्य से इगेन्वु उस चारडाल की आज्ञा जँ तत्पर रदते थे 1 १२९1 लङटी धारण किये
४१
~. कालकं धावेशापि ततस्ततः ) वद .कालक्े समान इधर उधर भागते थे श्स
|
` श्ात्मानं स ददशथ पुकसीग्भसम्भवम् , १३० -तुत्रस्थथाप्यसौ गजा सोऽचिन्तयदिदं तदा ।
अन्द .. ` ाक॑रुडेयपुराण 2७
अस्मिन् एव इद मूल्यं माप भरा्स्यामि चाप्युत १२२॥ कका यद मूल्य हदा इतनामिला इतना श्र हो
५ व आदि ॥१२२॥ इसमं इतना मेरा, इतना राजा काः
षदं मम ददं रक्षे पख्ययण्डालके चिद् । १ चारडाल का, यद सोचते हण भ्रौर
॥ भागते हए राजा को एेसा माहनुम होता था मानें
हति धावन् दिशो गजा जीचन् योन्यन्तरं गतः १२३॥ 1 = जीरंकर्सु्रन्थि-कृतकन्थापरिगरहः ।
जीते जी प्रेत वन गचा ह ॥ १२२॥ श्रनेकों शरेगरियों क
से धक्त यना कपड़ा शिर तथा शरीर म धारण किये दष्ये तश्राचिताकी भरम मुख, भुजा श्रौ
५ -चिताभस्मरनोलिप्-एखवाहृदयाटिद्कः ॥ १२४॥| उदर एर लगी हु थी ॥ १२८ ॥ दाथ पाँच की
नानामेदो-वसा-मज्न-लिपतपाणयङ्गुलि; श्वसन् । | धंशलियों मं मेद, वसा मचा दरादि लिपी रहती द् ॥ यु शरी ्नौर नाना ्रकारके पिंडारिक्र ही उनके भोजन
तानाशवोदनकृता-दारतृतिषरायणः ॥१२५॥ की सामध्र शरी ॥१२९॥ बहाँ की पड़ी मिस ,ज र , तदीयमालयसंश्ष-कृतमस्तकमणए्डनः 1 ही श्रपने मस्तक को सजा लेते थे तशा. गत दिन ,
५ किसी समय भी नीद न द्याती थीश्चौर चारवार न रात्रौ न दिवा रेते हा हेति भवदन् गुहु १२६॥ ्ा' हा" णेसी श्वास लिया करते ये ॥९२६॥ इसी : वं हादशमासास्त॒ नीताः शतसमोर्माः ।
रकार वारह महीने सौः परं के वरावर वीते । च
बन्धय दिन वन्धु वान्धवों के वियोग से इभी वह ~=
सं कदाचिन्तरपश्रषठः श्रान्तो वन्धुषियोगवान्॥।१२७॥| राजा व स्थान पर वैड गया ॥ १२७!
रकषङ्गो निष्ट सुप एव निश्च श्रौर रूखे शरीर वाला वद राजा निद्रा ५.
निद्राभिभूते साहो निश ष १ सताया इुश्ा सो गया । सोते टी उसने चड़ तत्रापि शयनीये स॒ दएटवानदशतं मदत् ॥१२८॥
-शमशानाभ्यासयोगेन दषस्य बलवत्तया ।
ग्न्यदेहेन दत्वा त॒ गुरे गुरुदक्षिणाम् ॥१२६॥
द्द्धत खम्न देखा ॥ १८ ॥ मने दृखरे देह मे' ग शुरू की युखूदक्षिणा नदी दी इसी कारण-से ~व तदा द्वादश वर्पाणि दुःखदानानु निष्कृतिः ।
ने ममे वल पूवक स्मशान घास कराया है ॥ १२ फिर इसी प्रकार दुःख पूर्वक वार वप न्त दने पर श्रपने को डोमिनी के ग्म से उत्पत घ: . देखा ॥१२०॥ उस जगह स्थित दुष राजा ने ¢ सोचा करि यदि इस गभं से निकल तो, स्रूव॒दान €... (स ध ^ वरी धम फर गा ॥{३१॥ इसके वाद खप्न मे देवा कि च्कान्तमात्री भ्मकरोभ्यह् 4 हता निप दि दानधम्म नि {२५॥ ब पैदा होकर डोम का वालक होगया दहै श्चौर भरनन्तर स॒ नातस्तु तदा पुकसवालकः । | स्मशान म मूनक सम्बन्धी काम करता है ॥१२/ एमशानमृतसंस्कार-करणेु सदोच्रतः ॥१३२॥ फिर सातवें वधं स्मशान मेँ किसी निधन भे तु समे य्य श्मशानेःथ मृतो एरिजः। | कै सृत ध अ व र शा देखा ॥१३६॥ उनसे कर माँगने पर वे क्तेषा १ ्रानीतो बन्धुभिर स्तेन तत्राधनो गुणी ॥१३३॥ त 4० वितति मूर्यार्थिना त तेनापि परिभूता ५ । श्राति बालसी था वोंले ॥१३५॥ हे पापकम ५९ ` उचते ब्राह्मणास्तत्र विश्वामित्रस्य चेष्टितम् १३४॥| वाले पापी मञप्य त .दस पापिष् 1 त याण््टमद्यमं $ ; कयो करता है, चिश्वामित्रकेशपदसेितो.. कर्मं पपिकरारफ | | क्या करत € ५ पापिष्ुमश्मं कम्मं इरः व , दर्शिनं से डोम हुच्या ॥ १३५ ॥ बाह्मण के % ' हर्थिनद्ः पुर राना विश्वामित्रण पुक्सः ॥१२५॥ ही कारण से तेरे पुर का नाशा होकर तू ६. व्राह्मणसवापनाशनात्। | दशा को पचा ¦ च्योंकि तृ व भी नदी मानत् (४ 1 स॒ शृतो रूपा तदा ।।९२६॥ है इसलिये ठमे.टम भी शाप देते है ॥ १३६॥ ५ १ ध नराधम ! तू अभी घोर नरक को जा।* इस गच्छ॒ त्वं नरकं घोरमधनेय नरधम । | क कटे जते दी खप्नावस्था मै पड़े हृष .4 दसयुक्तमात्रे वचने स्वसस्थः स दृपस्तदा ॥६ ३७।॥ने उस समय ॥ १३७॥ भयानक यमदूत को ६
२ ३४ | ३८ ाकरुढेयाण अ८
> भयावहान्। | मे पाश लिये इए, तथा च्रपने.को उनके द्वारा चल पाशहस्तान् मयावहान् । | +, (ल व निष्यो श्रपश्यटूयमदृतान् व पाश | पूर्वक वाधिकर लेजाते हु देखा 1६३८ उन निद
तै ंदीतमातसानं नीयमानं तदा वलात् ॥५६८॥ यमदूत को देखकर डर से शा माता हा पिताः पश्यति स्प यृशं खिन्नो हा मातः पितर्य मे । | चिल्ला हुता बह राजा तेल के एड म डाल एवंबादी स नरके कैलद्रोए्यां निपातितः ॥१३६॥| दिया गया ॥१३६॥ मच्यो से पया इत्र, तीद्ण
वसः पाव्यमानस्त शुरधाराभिर्यथः | | धार बलि शख श्रादि से युक्त अन्धकार पूरं"उस ।। ९.१ २१ कुरड &
ने तमसि दुःखाः पूयशोणितभोननः ॥१४०॥| इष्ड १ बद इल से पीडित हा पड़ है शौर | प पीव श्रौर रुधिर उसके भोजन हैँ ॥१४०॥ सात वषं
4 ¢ सपतयपं परतात्मानं पुकसत्रे दंशं ह । | तक वह यूत डोम देह दिनःदिन नरक मे .जलाया दिनं दिन्तु नरके दहते प्रच्यतेऽन्यतः ॥१४१।॥| च पचाया जाता था 1 ९४१॥ कमी उराया जाता खित कषोभ्यतेऽ्यतर मायते पा्यतेःन्यतः। | था, कभी छेदा जाता था, कभी मारा श्रौरः कभी
सीयते । काटा जाता था। कभी जाया जातां श्रीर कमी स्यते ्येऽनत् शीतबाताहतोऽ्त॥ ठरडी हवाश्रो से ठि्राया जाता था ॥१४२॥ नरकं
एकं दिनं वर्षशत-भमाणं नरके भवत् । |मेण्कदिन सौ वपं के समान इचा । सौ वर्ष॑तक तथा वर्षशतं तत्र श्रावितं नरके भटः ॥१४६॥| उस नरक मे यमदूत की यातनायं सदी ॥ १४३ ॥
ततो निपातितो भूमौ विष्ठा एवा व्यजायत | | फिर भूमि प्र गिर कर भरपने को विषा खाने बाले च ॥ -शक्कर श्रौर वात्त श्रादि खाने वाले तते की योनि ब्न्ताशौ शीतदग्थमासमात शृतो पि सः ॥१४४॥| इ 10
प्रथापश्यत् खरं देहं हस्तिनं षानरं पथम् । | फिर श्रपते को गधा, हाथी, बन्दर, वकरा, विडाल छागं विदलं कङ्क गामि पक्षिणं कृमिम्॥१४१।॥| कोच र कड कौ योनियां मे देखा ॥ १४५॥ मत्यं कूम्मं बरादश्च श्वाषिधं इटं शुकम् । | म्ली, कुदा, शकरः श्वानः सुखौ, तोता, मैना, शारिका स्ावराश्चेव सरयमन्यांध देहिनः ॥१४६॥ दृकादिक शौर सप फी योनियो मे ॥१७६। श्पने दिवस दिवसे जन्म भािनः पराणिनस्तदा । को दिन-दिन पराशियों की दे में पड़ा हा देखा, वकत दिदं प्श दुभ्व के सन्ताप से एक एक दिन वषं के समान भपश्यहदुभलसन्त्। ।दन वषशतं तथा ॥ १४५७॥| व्यतीत होता था ॥ १४७॥ इस धकार दुष्ट योनियों एवं वपशतं पू गतं॒तत्र योनिषु । | मे जन्म तेते लेते सौ व॑ व्यतीत होति शौर रपत अपश्यच कदाचिद् स राना ततखढुलोद्वम् १४८॥| को फिर सूरयवंश मे उत्प होते देखा ॥९४८॥ वद्यं तत्र स्थितस्य तस्यापिरान्यं चूतेन हारितम् | | इख प्रकार स्थित होने के वाद देखा किं चुम माया हूत चुत स चैकादौ वनं गत॥१४६।|| रव्य, खी रर पुन को हार कए अकत वनः को त्रापश्यत् स पिं व्यादितास्यं भयावहम् | | गया है। १४६ ॥ फिर देखा क एक भयानक सिह विमकषयिषुमायातं शरमेण समन्वितम् ॥१५०॥ परभ सदित 1 दे ॥ ६५०॥ मक्ितः सोऽ ९ शोचितु; जव चह भायां के शोक मे कह रहा थाके
उनम भक्षितः सोऽपि भाग्य धवः । | शे! मुम भती को छो षर श्ान कांग! ¶ रृन्ये क गतास्यच मामिहापास्य टुःसितम्१५१॥ उस समय सि मे उसे खा लिया ॥ १५१॥ र - सपर्यत पुनरेवापि भाग्या सा सहपत्रकाम्] | पुत्र सहित श्रपनी खी को देखा जो डु उसी यस तवं हरिन ठं च तेन तव पभो ॥११२॥| यह दरद थी किदे नाथ ! दमने चखा क्यों हरते शोच्यत भा्ो मायया शैव्या सह् | | वेला ?॥ १५२॥ आपके खी शौर ज इधर उधर म नापदयत् एुनरपि धावमानः पुनः पुनः ॥१५३॥ ग पित कया शराय नदी दैवते ॥९५३। यापयत नरि खरगस्यः स॒ नराभिषः| | पिर उस रज नेमं से देखा कि को व्यति
तौ वल पूवक उस दीन श्रौर वस्रविदीना खी कौ , यते पुक्तकेशी सा दीना िषसना वलात् १५४॥ शे पकड़ कर लिये जाता है ॥ १५४ ॥ वह ह्ययं
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अ०८ ' माक॑रडेयपुराण | ३९
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क | | दय करती हुदै तथा रुमे वचाश्रोः यह शब्द् हादावाक्यंभयुशवन्ती र । करती हृ जारी ह श्नौर फिर देखा कि बां धर्म ञ्रथापश्यत् पुनस्तत्र धम्मराजस्य शासनात् १५५।॥ राज की आज्ञा से ॥ १५५॥ श्रन्तरित्त से आवाज्ञ श्ाक्रन्दन्त्यन्तरी्स्था आगच्छेह नराधिप। तराई चिः दे राजा ! इधर श्राश्रो, विश्वामित्र कहते विसवामितरेण विङ्गप्तो यमो राज॑स्तवार्थतः ॥१५६॥ दकि यमराज मको बलाते द ॥१५६॥ इस प्रकार ति कटे जाने पर नागपाश से वाँधकर राजा को वल इत्युक्त्वा सपपाशस्त तीयते बलवद्विथः । पूवैक लेजाया गया । बिश्वदेचां ने कदा किं इसकी ्राद्धदेवेन कथितं विश्वामित्रस्य चेष्टितम् ।१५७॥| यद दशा विश्वामित्रके कारण दै ॥ १५७॥ वटीं
नथम्ोत्या व्यबद्ं ९ पर उनकी दशा धिष्वामित्रने शाप देकर सराव तत्रापि तस्य विङृतिनाधरम्मत्था व्यवदध त । करद श्रौरः फिर उसकी बह सव हालत जो शुज्ञर
एताः सव्या दशास्तस्य याः सम्ने सम्पदिताः१५८ सदी थी खष्न मे दिलाई दौ ॥ ६५८ ॥ उसको बे सर्वास्तास्तेन सम्भक्ता यावदपि द्वादश । | सव भोगते हषः वार बप॑ व्तीत् हयः तिस पी :
९ > बह फिर यमदूतों द्वारा यमराज के पास ले जाया ध ६ (= [ [१३ ध तरतीति द्वादशे वप, नीयमानो भटगलात् ॥१५६॥ गया ॥ १५६ ॥ वहाँ उसने यमराजको देखा जिसने
यमं सोऽपश्यदाकारादुवाच च नराधिपम् । | का दे राजन् ! मदात्मा मिश्वामिच् के कोप कौ विश्वामित्रस्य कोपोऽयं दर्मिबाय्यो महात्मनः १६०॥| कोई निवारण नदीं करसकता।९६०॥ वह् बिश्व पुत्रस्य ते भृतयुमपि भदास्यति स कौशिकः । मिज तेरे पुत्रकी स्यु काभी कारण दोगा । अरव
¦ मालपं लोकं द; श्च तू मचप्यलोक को जा शौर शेष दुःख को भोग । ` गच्छं त्व मादुप लोकं दुःखोप ~ वै। । समय बीतने पर हे यजन् ! तेय कस्या होगा ॥
गतस्य तत्र राले शरयस्तव भविष्यति ॥१६१॥| ख्न मं इसी तर वार् वष तक दुः भोगे वयत दवादश वपे दुःखस्यान्ते नराधिपः । | के वाद् बद राजा यमदूत दारा स्वगं से नीचे, `
यमदूत ¦ ||१६२॥| भिस दिया गया ॥ १६२ ॥ फिर यमलोक से गिरते अन्तरकषाच पतितो विषो व | ध के भय से शख खुल गै श्र दोश मे श्नि पर पतितो यमलोकाच्च विशुद्धो भयसम्ध्रमात् सोचने लगा कि मेने स्वण्नमे वडा कष्ट पाया॥९६३॥.
रहो कष्टमिति ध्यात्वा क्ते ्षारावसेवनम् ।।१६३।॥ स्वप्न मेने जो महान् दुभ देखा उसका अन्त ४ स्यप्ने दुखं मटर यस्यान्तो नोपलभ्यते | नहीं है । जो कुच मेने स्वप्नमे देखा ह बह मुभे. :
वार € €. पडेगा उसने धि - द्वादशा समाः॥१६४॥| वार्ड वप पन्त भोगना पड़ेगा ॥१६॥ फिर उसने! ; स्प्न इष्टमया यतत विं चमेद्ा उख स्थान के डोमों से स्वप्नका सव हाल ककर; `
गतेतयपच्चत् तत्रस्थान् पुकसांस्त॒ स सम्भ्रमात्। | पूया तो उनमे से कच ने कदा कि ये सव निसी| . नेत्यचः केचित् तत्रस्था एवमेवापरे, वरन् ॥१६५॥| दूसरे के साथ दोगा ॥१६॥ यह खुनकर उस राजा
‡ ने दुःखित होकर देवताश की शरणली श्रौर कहा .: 1 दह त रना प कि देवता लोग मेरी खरी रव्या व वालक
[न स्वस्ति इन्त मे देवाः शेव्याया बालस्य च कल्याण करं ॥ १६६॥ हे महान् धम्म † ्रापको- , नमो र्य महते नमः कृष्णाय वेधसे । | नमस्कार है ओर श्रीकष्एच्् को भी जो परम परावराय शुद्धाय पुराणायाच्ययाय च ॥१६७॥ रे, शुध, पुराण श्नौर शरव्यय द नमस्कार दै ॥ ,
+ ह बृदस्पति ! दे इन्द्र ! आपको नमस्कार है । - ८ नमो स्पते तुभ्यं नमस्ते वासाय च । | कहकर वद राजा ोम-कमे प संलग्न दोग ;
ुकसकम्ेणि॥|१६९८। | १६ र फिर स्थति न्ट कर मलिन, जिल जटिल ^ 1 0 = ह तथा करौ दाथ मे लिये हप व्या्लसा| ` शवानां भूष्यकरणे पुननषटस्ूतियथा । | म्णन त + पर ६६॥
+ बद राजा मुदौं पर कर वसूल करता धा ॥ ५६६ 1. मिनो जटः ष्णो लट विहतो चपः॥५९९॥ फिर पु श्रीर भायोको विस्मरण कर शरीर... ~
नेव पुत्रो न भायां तु तस्य वै स्पृतिगोचरे। हीनता के कारण राज्यपाट को भी भूलकर बह ` नपरेताहो राज्यनागाद् रमशाने निवसंसतदा १७०॥ स्मान म रने लगा ॥१०॥ उल =" `:
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५ ~ -* चब न
।
+ | च ४ भ ५ ]
४० माक॑ण्ठेयपुराण श्र ८ ----------------------------- स्वसुतं तमादाय लापिनी । ४ = स नरेन्रस्य सर्पदष् हि बालकम् ॥१७१॥| "= ठ म् कीसी दाह दाहक करने को स ¢ श्रई ॥ १७१ ॥ वह कृशाङ्गी, विवर, वेचैन श्रर कशा विषणा विमनाः पांश्वस्तशिरोरुहा ॥१७२।॥| चह कदती हई राई ॥ १७२॥ बह कट् रही थी, दे
राज वालं लं पश्य सोमं महीतले । ` | यजन्! शरान एवो षर पड़ ह श्रपने पुजको तुभ व ह नदीं देखते हो तओ दैववश सर्पं के कारने से च्ल
हुए पुत्र को जिसको कर्प ने काटाःथा.लेकर .
१ (१ द्ष् ७ | | . रममाणं पुरा दष्टं पष्ाहिना मृतम् ॥१५२॥| को प्रात दश्यह ॥९७२॥ वह यज्ञा उस खी के रुदन
ट £ $ तस्या विलावशब्दं तमाकण्य स॒ नराधिपः । | के शब्द को सुनकर शी मृतक का कर च वख जगाम लरितोऽ्चेति भविता मृतकम्बलः ॥१७४॥ लेने को बहौ गयां ॥ १७४ ॥ उस्र राजा. ने रोती सतां सेरदरीं मायौ नाभ्यनानानत पार्थिवः। | इट उस अपनी खी को जिसकी शङ्ग चिर वियोग
चरवाससन्त् ९ श्मौर दुःख से वदल गई थी न पदिचाना ॥ १७५॥ पसः मेषाबलाम् ।.१७५॥ ५ जिसके पिते चिरबार पुनाता लान् शरीर वह रानी भी उस राजा को जिसके परिस
सापि तं चस्केशन्तं पुरा दषटरा जटालकम् । _ | केश थे न्नर अव जटाये थीं श्नौर जो अव खुले .
नाभ्यजानान्दरपुता शुष्कषटक्षोपमं दपम् ॥१७६॥ छृक्त के समाने क्षीर टोगया था न `पटिचान सकी' ती त + ॥ १७६ ॥ फिर उस राजां ने खर्प के विपसे पीडित. सोऽपि कृष्णे बालं शृष्ाशीविषपीडितम् । काले कपड़े मेँ लिपटे हप उस वालकको राजोचित नरेन्लक्षणोपेतं चिन्तामाप नरेश्वरः ॥१७७॥ लक्णो से उक्त देखक्रर सोचना शरू क्रिया ॥१७७॥
ध ध “खहा ! बड़े कष की वात है, यह किस कुल का अरहो कष्टः नरेन्द्रस्य कस्याप्येष इले शिष्यः । वालक है जिसको निर्दयी काल ने अपना त्रासं .
{जातो नीतः कृतान्तेन कामध्याशां दुरात्मना १७८।|| बनाया" ॥ १७८ ॥ यह देखकर सोचने लगा-कि.
एवं दष्टा हि मे बालं मातुरुतसङ्गशायिनम् | | मेरा कमलनेन रोदिताश्व भी इसी भकार भाताकीौ'
मभ्याम ोहिताशोऽन्नलोचनः १७६॥ गोद मे रदता था ओर जो इस समय दूसरे कं सतिमभ्यागतो बालो रोहिताधोजनलौ त्रभ्यागत है ॥ १७६ ॥ फिर सोचा कि मेरे पुज की
सोऽभ्येताभेव मे त्स वयोऽ्वस्थायुपागतः । | गक्ल शौर श्रवस्था भी फेस ही है, सम्भव दै पीतो यदि न घोरेण कृतान्तेनात्मनो वशम्॥१८०॥| निर्दयी काल ने मेरे लङ्क को दी उडा जिया दो ॥ राजपलन्युवाच रानी वोली-- |
( ं मदत् दे पु! ये महान भौन क्रिस पाप से ब्रत कस्य पापस्य अपध्यानादिदं मह् । पु ! ये मद् 1 { त्र ५ करः रहे हो १ हमारे ऊपर तो फेखा घोर कष्ट या.
‡लमापतितं घोरं यस्यान्तो नोपलभ्यते ।।१८१॥| है कि भिसका अन्त ही नहीं मिलता है ॥ १८१ ॥
(= द थ [5 1 साथ राजन् भवता मामनाश्वास्य दुःखिताम् । | € राजय! हा नप्थ । सुः इख्या को चोड कर
गपि सन्तिषठता स्थाने विश्रब्धं स्थीयते फथम्१८२॥॥| च्ाश्वासन बयो नदीं देते हो १॥ १८२।-हे विधाता
किस स्थान मे वैठेदो ? सुको आकर श्राप.
= षि)
[ष मी
व्यनाशः सुदत्यागो भाररपातनययिक्रयः । | यजय नाश, वन्ु-बान्यवों का नियोग, खी च्रौर
पु का विक्रय ! राजर्षिं हरिशन्र को किस पकार
रि « श्वर र! वि धो कृतं त्या 14 ॥ म. “ च रिथनरस्य राजैः किं विषौ न कृतं स्वया॥।१८३ वमने पेखा कर दिया ॥ १८३॥ उसका यह. वचन
ति तस्या वचः श्रुत्वा राजा खस्थानतश्च्छुतः । | चुनकर श्रौर च्रपनी खी को पहिचान कर राजञा-ने'
्यमिह्ञाय दयितां पुत्रश्च निषनं गतम् ।॥१८४॥| सममा कि पु भी तयु दोग शलौर उसी, जगह ष्ट शैन्येथमेषा हि स॒बाललोऽयमितीरयन्ः। | "गर पड़ा ॥९८४॥ @ गव्ये ! यद मदान् दुः्व है रोद दुःखसन्तसो मूच्छोममिजगाम च . १८५।॥| क ९ भी मर गया ।* यद कहकर रोता इ रा च तं रत्यभिह्ञाय तामवस्थारुपागतम् । | ब रानी भी उसको पदिचान करः तथा उसकी
~~, निषयातातां निश्चेष्टा प्रणीवले ,१८९। बद, दा देलक डः से सूचित दोकरषथवी पर ~+ ५. +. 1 1 4 ६.५
दुभ्ं स संक होकर वद मूर्धत दो गया 1८५ |
अद्गमत्यज्गसम्भूतो मनोहृदयनन्दनः ।
> 1 ==.
अन्८ माकर्डेयपुराण ४१
चेतः सम्भाष्य रानेन््ो राजपत्नी च तौ समम् | | भिर पढ़ी ॥ ध८६॥ दोश मे शराने पर त्रे रना -. रानी संताप श्रौर शोक के भार से पीडति ८ ०५
बिलेपतु; सुसन्तक्तौ शोकभारावपीदितौ ॥ | विलाप करने लगे ॥ १८७॥
राजोचाच राजा वोल्ते- हा वत्स सुकुमारं ते स्क्षिमरूनापिकालकम् हा वत्स | तेरे सुकुमार शरीर, नेज, भोँद १.१ र मे | श्नौर केशों को तथा दीन अख को देखकर ५“
पश्यतो मे शुखं दीनं हदयं कं न दीय्यंते ॥१८८॥ छाती क्योँ नीं फटती ? ॥ १८८ ॥ “तात” “तातः
` तात ततिति मधुरं श्वाणं स्वयमागतम् | पेली मीठी बाणी से बोलता दुरा अव कीन मेरी
उपगु वदिष्ये कं त वत्वेति सौहृदात् ॥१८६॥ व व ध
कस्य जानुमणीतेन -षिङ्गिन क्षितिरेणुना। | किसके शरीर की रेणु मेर वस ब श्ज्ञौको मलिन -ममोत्तरीययुत्सङ्ग तथाङ्ग मलमेष्यति ॥१६०।|| करेगी ? ॥ १६० ॥ श्रपने अङ्ग त्य् से उत्पन्न तथा मेरे मन श्रौर हृदयको आनन्द देनेवाला मुभ कषा दुष्ट पिता द्वासा मेस पुत्र साधारण बस्तु की तर ० मक्गीतो येन धस्तुबत्" १६१॥| वेच दिया गया ॥१६९॥ श्नौर श्रशेष राज्य, साधन, हत्वा राज्यमोपं मे ससाधनधनं महत् । | धन हरण करके भी निर्दयी दैव ने मेरे पुजरको सं दवाहिना दृशंसेन दष्टो मे तनयस्ततः ॥१६२॥| वनकर काट खाया ॥ १६२ ॥ ५५ मै व सपं अहं॑दैषादिदष्स्य॒पूव्स्याननपदनम् । | से काट ह कमलरूपी सुख वाते यन क प रद र जोकि विष से रृष्णवणं हो रा है ॥ ६१३॥ निरीक्षच्पि घोरेण विपेणन्धृतोऽ्ुना ॥१६२॥| यद ककर उसने आं भे शस् मरकर एवुक्तवा तमादाय बालकं वाष्पगदरद्;। | उस वालक को छाती से लगाया श्र भूं से. परिष्वज्य च निश्चेष्टो मूर्च्छया निपात इ।१६४॥ अचेत दोकर भूमि पर गिर द्र ॥ १९५॥ = 9 १; पी भर पति मल देत भ श्रयं स॒ परुषव्याघ्रः र खरस पति मालूम होते दै, मेर ' ॥ २ ५ सरशोपलकषयते। राजा दस्थिन्द्र जो बिद्धानों के भनके चन्द्रमा ठै
विदरज्जनमनशन्दरो हरिनद्रो न संशयः ॥१६५॥ दी दै, इसमे संशय दी १६५॥ क ही म तङ्गा ्रग्रतोऽ्योगुसं तोते के खमान नाके श्नौर दः फूल , की ' १ ९: गता । | ऊली के समान दै । मेरे पति पखिद्ध श्ओोर महान् | दन्ता युङृलरस्याः ख्यातकीत्तमहात्मनः॥१६६।॥ श्रत्मा वालि द ॥ १६६॥ वद 1 समय | श्मणानमागतः कस्मादचप येप सं \ स्मशान मे कैसे श्राय ? वह पुत्र शोक का भूलकर श्रपहाय पच्रशोकं सा $ पतितं 1 | । & गिरे हप उन अपने पति को देखने लगी ॥ १६७॥ 8 ९६७ स्वामी शौर पु्के शोक से पीडित भय से युक्त भृश तरिरिमिता दीना भन पुत्राधिपीडिता । | दो उसने अपने पति की भीषण यातना को देखा
, वीक्षन्तौ सा ततोऽपश्यद्रभच्ु दण्ठं जुगुप्सितम् १६८॥| ॥१६८॥ वह विशाल नेत्र वाली यद सोचकर कि
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पवपाकादमतो मोहं जगामायतलोचना । त २ धू | भाष्य चेतय शनकैः सगद्दमभापत ॥१६६।| बोली ॥ १६६ ॥ दे दैव | तेरी ल दया (रता ) | धिक् सां दैषात्िकरणं निम्म॑य्यादं गुप्तम् | | को ८ ५ इस देवता व | मो नीती राना श्वपाक \|| अमर्यादित दौकर चारुडालपन 1 ष 1 स ग ॥ राज्य नाश, वन्धु-चान्धवों का विषो, | राञ्यनाशं सुहृत्त्यागं भा््या-तनयविक्रयम् । | खी श्र पुत्र कां विक्रय, इन सव वातो के होते, भापयिलापि नो ुक्तथर्डालोऽयं कृतो दषः २०१॥| हण इसको न छोड़ा शरीर चाणएडाल ्ना दिया ॥ हा राजन् मतसन्तापाभिल्यं मां परणीतलात् । | 2 सजन पृथ्वी पर'पड़ी हई सङ्कट को प्रात सु
, ४२ ण माकंर्डेयपुराण ॥ अ०
युच्यते ॥२०२। को श्राप ठाकर पलक पर कयो नदीं लते श्रीर (त्व ता कि | से वोलते है २०२ ये विधिकी कैसी वामता नाद्य पश्यामि ते च्छं भृङ्गारमथवा पू श्राज मै तुम्दारे पाख चलुज, -चम॒र, पंख
चामरं व्यननश्चापि कोऽयं बिधिषिपय्ययः।।२०२॥ श्रादि कुल भी नदीं देखती ह ॥२०२॥ जिसके श्रागे यस्याग्रे नतः पूर्वं राजानो शरृत्यतां गताः। | श्रे पदे रजा लोग सेवकत्व को. भप्त हो खोचसीयैरक्वन्त नीरजस्कं महीतलम् ॥२०४ | श्रपने उत्तरीय बसँ से मागं की धूलि साफ़ करते
४ ५ थे ॥ २०४ ॥ वह राजा इस घोर स्मशान मे जहां सोऽयं कपालसंलमन-घटीषटनिरन्तरे । कपाल, सतकों के वदन, निर्माल्य सूत्र, केश, शरादिः |
गृतनिभ्मासयसूत्ान्तगृढकेरे सदारुणे ॥२०५। | ह ॥ २०५॥ श्र जहाँ रुधिर श्रौर वसा से सूते वसानिस्यन्दसंशष्क-महीपुटकमर्डिते । | इए दोनों, सुर्यो की राख श्रौर श्रधजली इडां
श्रौर मजा के ठेर से भीषरखता छास्टी दै ॥२न्६ भस्माङ्गारा्दग्धास्थि-मल्नसष््टभीषणे ॥२०६॥ त
रभ-गमायुनादातत-नषुदरिदज्गम । | ॐ भीषण नाद से श्रातं दोरा श्रौर जहाँ चिता- चिताधूमाततिरूवा नीलीढृतदिगन्तरे ॥२०५७॥| ओं के धँ से दिशं काली दोरदी है ॥ २०७॥ कुणपास्वादनयुदा सम्महृष्टनिशाचरे । | ज्यौ रक्तस लोग सदौ को खाकर उनन्मत्त होरदै
चरत्यमेध्ये राजेन्द्रः र्मशाने दुःखपीदितः ॥२०८॥| ई रेते स्मशान मे दुःख से पीडितं यहं राजा रहता भरतव रनः लाने सीरत ॥२०८ है ॥ २०८ ॥ यदह कहकर रानी राजा के करट से
एववा समारछषय करटं रो दरपात्मनां । | लिपट गह श्रीर श्रातं बाणी ते शोक समुदधमे इवी फष्टशोकशताधारा विललापात्तया गिरा ॥२०६॥ हई विलाप करने लगी ॥ २०६॥
सजपल्युचच नी बोली- रजन् स्वरोऽथ तथ्यं घा यदेतन्मन्यते भवान्। हे.राजन् ! यं स्वप्न है थवा तथ्य, श्रापका
क्या मत है ? क्या सुभको मोद दोगयद ? दे महा तत् कथ्यतां महाभाग मने वै शृदते मम ॥२१०॥ चाहु ! मुभासे सव हाल किये ॥ २१० ॥ श्रगर यह
तदेवं पमं = ठीक पेखा ही है तो हे धमक ! धर्म अथवा बाह्मण धम्परत्न धम्त् यच तदेवं धम्मक्ग नास्ति धम्मं सहायता । ग्नि की पूजा व पालन मे ऊ तत्व नदीं
तथैव ॒भिमदेवादिपूजने पालने शवः ॥२११॥ है ।॥२९९॥ यदि धर्म दी नही है. तो सत्य, शील
नास्ति धर्म्म कृतः सत्यमाज्जवं चान्रृशंसता। | श्रौर दथा भी कटां है जो श्राप . सयीसे. धर्मात्मा ॥ गि जिसने राज्य तक दान कर दिया उनकी पेसीं यत्र त्वं म्म॑परमः खराब्यादवरोपितः ॥२१२॥| दथा है॥ २९२॥ |
पक्षिण ऊचुः ~ | | । ॥ चोले-- । इति तस्या वचः शरुत्वा निश्वस्योष्णं सगद्गदम् । इस प्रकार उसके वचन सुनकर गद्गद दोकर कथयामास तन्व्या तथा प्ता श्वपाकता ! २१३| यजाने गमं सांस ली शरीर जिस प्रकार चांडालता
को प्राप्त किया बद कह सुनाया ॥ २१३ ॥ श्रौर रदित्वा सापि सुचिरं निश्वस्याष्णश्च दुःखिता: | अपने पुत्र के मरने से इुःखित रानी ने भी खव )
स्वपुत्रमरणं भीरूयथाृत्तं न्यवेदयत् ॥२१४॥| रोते इण तथा दुःखित दोकर गम श्वास लेते इए | शरुत्वा राजा तथा वाक्यं निपपात महीतले! | अपना इत्तातं खनाया ॥ २१४] राजा उसके वचन
शृतस्य पुत्रस्य तदा जिया लिलिदैन्पुखम्।।२१५॥ 9 1 ० जोवाच
धी । राजा चोला-- भरिये न रोचये दीघं शालं केशयुपासितुम् । हे भिये ! मरे दुभाग्य को देखो मै दीं कालसे
केशो मे पड़ा नात्मायत्तथ तन्वङ्गि पश्य मे मन्दमाग्यताम्॥ २१६॥ नहीं होवा ॥ व । श्रव. ये सच इक सहन
चारडाल की द्ाज्ञा विना लिये ह श्रग्नि मेँ जलता ह तो फिर दृसरे जन्म म भी चारडल की दासता करनी होगी ॥ २१७ ॥ तथा नरक मे जाकर की का भोजन करना दोगा श्रौर वैतरणी नदी वैतरण्यां महापूय-चसाखक-सनायुपिच्विते ॥२१८॥ म रदकर मास, मजा 1 ८ दोगा ॥ २९८॥ तथा श्रसिपत्र नामक चन मे जदं # असिपत्रवने प्राप्य च्छेदं प्राप्स्यामि दारुणम् । ० ष है जाना पड़ेगा श्रौर रौरव परं + बहारौखसेरवौ महा सौरव नरको मे पर्हुचकर धोर दुःख उशना
तापं भाष्स्यामि वा माप्य महारौरसरौ ॥२१६॥| पड़ेगा ॥ २१६॥ षस दुभ्ल क व मे इवकंर
मग्नस्य दुःलमलञथौ पारः माणवियोननम् | | मरने तो भ्ाणु छना उत्त दै, फेला भी विचार करता ह कारण कि वंश चलाने
एकोऽपि वालको याऽयमासीदशकरः सुतः॥२२०॥ एक पुत्र था वह भी ॥ २२०॥ वल ०१५ < नः # जल के चेग म इव गया अथाः ५ द वाम्बुेगेन 1 सोऽपि बलीयसा । | सर्पं के काटने से मर गया । अव यै दुस्म॑ति स्वं कवं प्राणान् बिषशवामि परायततौऽस्मि र्गतः २२१| नरक का विचारः करके भायोंको करय नी चछोडता श्रवा नासिना | ह ?॥ २२१॥ तथा यह भी विचार करता हं किं र तिना लिटि नर पापमवेक्षते । | दुभ्व से पीड़ित मजुप्य पाप को नदीं देखता दै । तिथ्यक्तवे नास्ति तदृदुःखं नासिपत्रवने तथा २२२॥ ध योनि ध्रीर 6 चनमेभी इतना दुख वैतरण्यां इतस्तादख्याददशं पुत्र नहीं हे ॥ २२२ ॥ श्रथना वैतरणी मे भी इतना दुख साज दशं पत्रनिप्लये । | कं है जितना कि धु के वियोग भ दै इ्सिये ऽहं सुतशरीरेए दीप्यमाने हुताशने ॥२२२॥ इग शरीर मेँ श्रम्नि लगाते समय ॥ २१३ ॥ उस १ तन्ङ्धि वः ग्नि मे गिरपड़ंगा । दे छन्द्र शरीर बाली ! मेरी निपतिष्यामि नञि पन्त्य इषं मम । | श्रियो को चमा करना । मेद तुमको आका दै ्लङाता च गच्छ तवं विमवेश्म शुचिस्मिते |२२४॥| कि त॒म विप ॐ घर जश्नो ॥ ९९५॥ हे कोमलाङ्गी । मम बाकयश्च त्वद्धि निवोधादतमानसा । | मन ल मर वचनो को शुनो, यदि तुमने दान यदि दत्तं यदि हुतं गुरो यदि तोपिताः ॥२२५॥ परत्र सङ्गमो भूयात् पुत्रेण सह च स्वया ।
हवन किया श्नौर शु व्राह्मण को संतुष्ट किया तो ॥२२९॥ परलोके मेरा, वम्दाया यर पुचका सङ्गम इह लोके $तस्त्येतदभपिष्यति ममेङ्गितम् ॥२२६॥ त्वया सह मम श्रेयो गमनं पुतरमा्से ।
हयो जावेगा इस लोक मे तो मेरो इच्छा के श्रचु- यन्मया हसता किश्िद्रहस्ये वा शुचिस्मिते ॥२२७॥
सार कुद भी न दोगा ॥ २२६॥ पुज के माग पर्दी तम्द र सुमे जाना रेष है श्रौर हे पवि मुख
-रश्वीलक्तं तत् सत्वं क्षन्तव्यं मम याचतः । .} रानप्लीतिं गर्वेण नाव्य; स ते दविजः॥२२९८॥
वाली ! यद्या एकान्तम जोक मैने॥२२अ॥श्रसुचित वात तुमसे कटी टो बह खव मेरी याचना करनेसे सर््वगरत्नेन श [9 त्नेन ते तोष्यः स््ामिदेवतवच्छुमे ॥२२६॥ राजपत्न्युवाच
तमा करना, तथा कभी राजपत्नी होने के गवं में ब्रह्मण की अवक्षा न करना ॥रेर८ ॥ सव मकारः से श्रपने स्वामी उस बाह्मण को सेवा से सन्तुष्ट करना ्ादिये ॥२२६॥ । ग्रहमप्यत्र राजे दीप्यमाने हुताशने । दुःलमारासहाचे सह यास्यामि बै लया॥२२०॥ 0 ५ ६८ > रोगे प चचन सगं स्ह यु्व या नेरक को भोगे । रजा ने उसके ` यह चन ष सर्गश्च नरक सैवायाहि येद्छव ह । यि शदे पत्ते! ची उम्दा भुरा राजा वतोवाच एवमस्तु पतिव्रते ॥२२१॥। इच्छ टो" ॥ २२९ ॥ ।
चणएडालेनानसुङ्गातः भरवेकषये जवलनं यदि | चण्डालदासतां यास्ये पुनरप्यन्यजन्मनि ॥२१७॥ नरके च पतिष्यामि कीटकः कृमिभोजनः ।
रानी बोली- । हे राजर्षिं | तरै भी म्नि पज्वलित ह्येते दुख
भारको न सद सकने ङे कार्ण श्रापके साथ [1 4 श जलंमी ॥ २३०॥ वहा पर साय ही हम जोग सगं
४४ माकैरुडेयपुराण ञ्म०८ ` -------------------------------------~ पक्र उचुः | पी वोल्ते- - | ठतः कृता चितां राजा आरोप्य तनयं खक् । फिर सजा ने चित्ता वनाकर श्रपने पुज्को उस
पया स्वितथासौ बदवाञ्जलिपुरस्तदा पर रक्खा श्रौर रानी खदित दाथ जोड्कर = दं २। । भाग्या इष्ट ुरस्तद! ॥२२ 1२२२ जड चेतन के हृदय मे वासकरने परमात्ा,
चिन्तयन् परमात्सानमीशं नारायणं हरिम्! | का जे ह्वर, नाराय, हरि, बासुदेव श्र देवेश्वर , हृ्कोररुहासीनं शसदेवं॒दयुरेश्वरम् ॥२३३।॥ है स्मरण किया ॥ २२३ ॥ जन्म मरण से रदित, अनादिनिधनं ब्रह्मं कृष्णं पीताम्बरं शुभम् । | पीताम्बर्धारी, परब्रह्म, परमेश्वर का त्यान् .करतं तस्य चिन्तयमानस्य सव्य देवाः सवासवाः २२४॥ इण न्दर खष्दित॒ सव दवता ॥ २२४ ॥ धम
धस्पं भरसुखतः कला समाजग्धुस्खरान्विता को रासे कर्के जल्द कहा माये श्मौरः सव वरटा आगत्य स्वैभोडसे मो भो राजन् शरु ममो२२५॥ आकर यो्ञे, हे राजद ¡ तुम निर्दोष दो" ॥२२५॥ गत्व ्षन्वमादुस्त भा भ रजिन दुवा ९५८५ तुम्दारे ध्यान करने से सव देता आये दै 1 यद
तष चिन्तयमानस्य सपे देवाः समागताः । | सान्ताव् व्रह्मा है, तथा स्वयं भगवान् घम भी रवं पितामहः घा्षाद्ुम्मे् भगवान् स्वयस्॥।२३६।} उपस्थित हे ¶रद६॥ विश्वदेवो सखद्दित साध्य, पनन पाध्याघ विश्वे सस्तो लोकयालाः सवाहनाः | | चारणो सहित लोकपाल, नाग, चहस्पति सहित
खिद्धं नाय, हद्वगख ज्ौर अण्विनी कुमार ॥ २२७ ॥ नागाः षिद्धाः सगन्धन्वां सद्ाश्चेव तथाश्िनो २२७ यह वथा अन्य व्व से न्नर विश्वामित्र भी यदं
एते चाल्ये च उहवो विश्वामितरस्तयेव च ।॥२३८॥ मौजूद दै ॥ रू ॥
धस्मृउवाच घर्भरज बोले- । क मा राजन् साहसं कार्षीधम्मऽं तरादुपागतः । ! ड राजन् ! ठेखा खादस मतकरो, म ध्म तुम्दारे तितिकष-दम-सतवाचेः सगुः परोषित ` पास आयः ह । तुमने सुमे तितिक्तादम आदि शुरो 5 ¦पर्तिषितः।२३६॥ से सुण किया द ॥ २२६॥ र इन्द्र बाला-- हरिथनदर महाभाग पापः शक्तोऽस्मि तेऽन्तिकम् ; डे मदाभाग हरिन ! ज इन्द्र॒ चुम्डारे पास
छया, तमन छपे पुत्र खया समायपत्रेए भिता लोकाः सनातना॥ २४०। | लोन न ड 8 व न
आरोह मिदिवं राजन भार््यापत्रसमन्वितः | | अपनी खी व पु के सदत स्वम को चलो, तुमने,
अपने शभ कमा से जिसको प्राप्त क्रिया है बह सट्यप्तं नरैर्येनितमात्मीयकम्पभिः ॥२४१॥ दृ ऋ दरम ड 1२४१ ॥
प्ति ऊ पती वोले-- । तताऽयतसय वषमण्मृत्युविनाशनम् ॥ | पतिर इन्द्र ने खुख पूर्वक श्रत जो सत्यु का इन्रः भाख्नदकाशाचितास्थानगतः भदः ॥२४२॥॥ नाक है करा से चिता के मध्य भै चिडका
पुष्पवषेश्च सुमदेवदुन्दुभिनिसखनम् दभिनि्वनमू | [1२७२ ॥ तव पुष्प वपा हई तथा महान् दुन्दुभी ततस्ततो वतमाने समाजे देवसंङृले ॥२७३।। नाद हुता ! उख समय देवतान के इस खमारोद `
समुत्तस्थौ ततः पुत्रो रहस्वस्य महात्मन; ! | मे ॥ २४३ ॥ उ महात्मा रज्ञा का पुत्र खस्थ, पुङमारतचुः सुस्थः भसतचरेन्धरिवमानघः २४४1 भसन्न चित शौर उङमारदोकरजीवित् हो उडा॥ ततो राना हरिजनः परिष्वज्य सूतं क्षणात् । फिर राजा हरिशचन्द्र ने अपने पुज को छाती से
(- 8 क दिव्यसास्यास्बरान्ितः त्रयस्य 4 स]
व्समाय्यैःस भ्रिया युक्तो दिन्वसाल्यवास्वरान्वितः स ते ज र चर , सम्पद्य सगल सद्ाच्ला म् जान सम्परुखं .
# | | च
रुस्थः सम्पूणद्दयो खदा प्रमया युतः । खसयतः शरोर हदय स आनन्द आ किया} लल
भूव तवृप्षणादिनद्रो भूयश्चनमभायत ।२४६॥| समय इन्द ह ।
्एमास्यैस्तं सपुत्र पराप्स्यसे सद्रतिं पराम्) इन्दर न उससे का ॥ २७६ ॥ हे मदाभागः ! ड प्रम् । । चम अपने श्म कमो के कारण पने पुन श्र दी
> 4 ~
०
देवराज नमस्तुभ्यं बाक्यशवैतननिवोध मे ।
4 वुस्यमेभि्महापापं भक्तत्यागऽपयुदाहतम् |
~~
भ्र ८ माकंरुडेयपुराण ` प
न
सहित स्वर्ग लोक को चलकर खद्गति को प्राप्त दोच्यो ॥ २७७ ॥ , हरिश्चन्द्र चोल्ते-- .
हे देदराज ! स्वामी श्वपच की आज्ञा विना
उसका निशादर करकेे स्वर्गको न जाड गा॥२४०॥ धर्मगाज चोक्े-- । क तमने मेरी मायासे इस प्रकार कष्ट पाया है ।
मैने दीडाम होकर तुमकोचांडाल यनायाथा ॥२४६॥ इन्द्र ने कहा- _ दे दरिचन्दजी ! थ्वी प्र समस्त मदुष्य जिस खगं के लिये प्राथना करते उस पुरयग्छोक स्थान को तुम चलो ॥ २५० ॥ दरिधन्द्र वोले-- ।
हे देवराज } आपको नमस्कार है, इस मेरे वचन को श्राप सुनिये । चकि आपकी मेरे ऊपर छपा है इखल्िये विनय पूरवंक कहता द ॥ २५१ ॥ अयोध्या नगरः निवासी मेरे विरह की श्म्नि में जल रदे है, उन लोगों को फेसी दशा मे चोड़करः नै किस तरह स्वर्ग को जाऊ ॥ २५२॥ जो पाप ह हत्या, श दत्य, ग वध, जी वध, आदिका है वैखा ही पाप भक्त को त्यागने मे है ॥२५२॥ सेवा करने बाले भक्तों को चनौर देखे हपट खख को छोड़ कर नदेखे सुख की शरोर जाना उचित नदीं है इसलिये दे इन्द्र ! राप स्वर्गं को जाये ॥ २५४॥ हे खरेन्ध ! यदि वे खच स्वर्गं को साथ २ चलं तो मै भी जाञंगः नन्यथा उनके साथनरक को भी जाने को उद्यत हं ॥ २५५ ॥ इन्द्र बोले--
उन लोगे वहत से पाप श्रौर पुथ अलग श्रलग ह । तुम उनके साथ भोगों को भोगते इण किख प्रकार खरग प्राप्त कर खकोगे ! ॥ २५६ ॥ इरिथन्द्र बोले--
हे इन्द्र ! भजाच्नों के द्रव्ये राज्य भोगा तथा मदा यज्ञ श्रादि खक कयि ॥ २५७ ॥ चकि उनके प्रभाव से अ्रथांत् उनके कारण से यज्ञादिक का अनुष्ठान हु्रा अतः वे भी उपकार के भागी है, खगं की इच्छा से उनका साथ न दछोडंगा ॥ २४८॥ इसलिये हे दनेश ¦ मेरा जो छट श्रयष्ठान, दानः प 6 ५ > पि - यज्ञ, जप का पुरय है बह खव मेरा.भजा के साथ द्तमषटमथो नपत सामान्यं तसतदस्त् नः ॥९५९॥| है। मो त वरह या पुव भल जो बहुकालोपमोग्यं हि फलं यन्मम कम्पैः । | क भी हो वह आपकी रासे मजएजनों के सा तदस्त दिनमप्येकं तै! समं लस्मसादतः ॥२६०]॥ दी दोना चाये ॥ २६० ॥
समारोह महाभाग निजानां कम्मण फले; ॥२४५७॥ इरिश्चन्द्रं उदाच देवराजानलुङ्गातः स्वामिना श्वपचेन वै ।
ग्रगत्वा सिष्छृतिं तस्य नारोक््येऽं सुरालयम्॥२४८॥ धरम उदाच
त्सैनं भाविनं हेशमवगम्यात्ममायया । श्रातमा श्वपाकतां नीतो दर्शितं तत्सपुकसं॥२४६॥ इन्द्रं उत्र्च भर्ते यत् परं स्थानं ` समस्तमेुनेभुव । तदारोह हरिशन्द्र स्थानं पुस्यद़ृतां रणाम् *२५०॥ हरिश्चन्द्र उवाच
भसादसुष्ुखं यत् त्वां बवीमिभश्रयान्वितः।।२५१॥ मच्छोकमग्नमनसः कोशलानगरे जनाः ।
तिष्ठन्ति तानपोदयाय कथं यास्ाम्यहंदिवम्॥२५२॥ हत्या युरोधाती गोवध; स्त्रीषधस्तथा ।
अनन्तं भक्तमत्याञ्यमदुष्टं स्यजतः; सखम् । नेह नात्र पश्यामि तस्माच्छक्र दिवं वरन ॥२५४१ यदि ते सदिताः स्वगे मया यान्ति सुरेश्वर । ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह ॥२५५॥ ^ इन्द्र उवाच बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक् कथं सह्ातभोग्यं तं भूयः स्वगग मवाप्स्यसि॥२५६॥ , दरेश्चन्द्र उव्राच शक्र युद्वे दषो राज्य प्रभावेण कुटुम्बिनाम् । यजते च महायतैः कम्मं पौत्तं करोति च ॥२५७॥ तंच. तेषां भरमावेण मथा सव्व॑मतुष्ित् ।
उपकातृन् न सनये तानहं सगंलिप्सया५२५८॥ तस्यादूयन्ममः देवेश किञ्चिदस्ति सुषेष्ठितस्।
४६ माकंर्डेयपुराण श्र०्८
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पक्षिण उचुः पकती चोले-- इ एवं भग्रिष्यतीलयुक्तवा शक्रस्िशवनेश्वरः । “इसी भकार होगा" यद् कहकर तरिसुवनयति मस्नचेता धर्म्म विश्वामित्रश्च गाधिजः ॥२६१ बद, घनं र गाधि पुन विन्धभिन असन चिच वानो ससो | हए ॥ २६१ ॥ देवताश्नों शरीर उनके श्रधिपति इन्द्र - पेमान खगलोकान्दीतलम् । | ने लोकों पर दया करके करो बिमान स्वं घे वकार देव देवेश लोकासुग्रह कारिणा ॥२६२॥॥| पृरथ्वीतल तक जोड़ दिये ॥ २६२ ॥ श्रीर नगर "मँ लला तु नगरं स्वै चातुवएया्रमेषतं । | जाकर सव चारों ्राश्रमो म रढने वाली परजा फो . रिथनरस्य निकटे मोबाच विबुधाधिपः २६३॥| राजा दर्दर के निकर इहच करके इन्द्र बोले गच्छत जनाः शीघ्र स्वर्गलोकं सुदुसभं । | ॥२६२॥ “दे भजाजनो } जो स्वलोक ऋर्यन्त दी भादातमा्ं सवे युष्ाभिरेव च ॥२६४॥ दुलभ है उखको श्राप सव लोग धर्म के वल से प ५ ४ भ चलि २६९॥ करोड विमानो को स्वरसे. पृथ्वी वेमानकोिसंवाध मन्तरिप्षं महीतलं । | तक लगा करः अयोध्या निवासियों से स्वर्गं चलने एृत्वायोध्याजनं पराह दिवमारुदयतामिति ॥२६५॥ को इन्द्रदेव ने कहा ॥२६५॥
पक्तिण ऊचुः पक्त वोल्े- , [दिनद्रस्य चः भत्वा भीत्या तस्य च भूपतेः । इन्द्र के वचन सुनकर राजा दिन्द्र ने प्रेम
महातपा; पूर्वक अपने पुत्र रोहिताश् को ` बुलाया ॥ २६६ ॥ पानीय रोदिताश्वञ्च षिश्वामित्रो महातपाः २६६।॥| रय अना त त अवं प्रयोध्याख्ये पुरे र्य सोऽभ्यसिञ्चन्ृपात्मनम्। | श्नौर इन्र सदित राजा ने श्रपने भिय पुत्र रोषि. वश्च एनिभिः सिद्धं रमिषिच्य तराधिप् ।॥२९७ | ताश्व को दिया ॥ २६७ ॥ उस समय व भजाजन एङ्ञा सह तदा सर्व्वे हष्टपुष्टुहज्जनाः । स र ५ क ५२ ह, वको के सहित राजा के साथ स्वर्गं को च त्रमतयदारास्ते दिवमारुरहूनेनाः ॥२९८॥| ॥ २८८ ॥ कतरा क व्रिमान से इ वि परदे षदे बिमानात् ते विभानमगसन् नराः| | पर प्रजाजन जा रहे थे श्रौर उनके साथ असन्न तदा सम्भूतहर्पोऽसौ हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः, २६६॥ दोकरः राजा हरिश्चन्द्र भी ॥ रद ॥ बह राजा | विमानैः स महीपतिः हरिश्ंद्र अतुल विमानोके साथ स्वगं द्ारपर प्च पम्पराण्य भृतिमतुलां मानः स महपत्ः | जहाँ पर सखव मकान जवादिरात. के वने हए ये आसरा्वक्रे पुराकारे वभभाकारसंटते ।२७०॥ व (8 व खगे मे श्राया इमा लोकं खकर दैत्यां के आचाय, सव शाख्रों के तत्व को ततस्तस्यदविमालोक्य लो रोना शा ( ' | नल क उल. पास स्वम दत्याचार्थ्यो महाभागः सन्वेशास्राथतत्ववित्२७१। मे गये ॥ २७१॥ शुक्र उवाच शक्र वोक्ते- 0, श्रो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् । |, अरहा ! तितिक्ता शोर दान का महान् । क है जिससे राजा हरिश्चन्द्र नगर सहित यदागतो हरिश्चन्द्रः पुरीजबेनद्रत्वमाकषवान्॥२७२ ||| स्वर्ग को चले गये ॥ २७२ ॥ । „ , पञ षह | तत् ते सच्वंमाख्यातं हरिश्चन्द्रपियेष्टितम् । डे जेमिनिजी ¡ इस प्रकार हमने राजा दग्धं ह ॥ की कथा ्ापसे कदी । इसको जो सुनता है बट 6 शृणोति 9 मते महत्॥२७२॥| ली भी मदान् सुख को भा करता है ॥ २७२ त्राथी लभते पुत्रं सुखार्थी सुखमाप्ठु यात् । पुज की कामना स चाला. पुत्र ल हः वर्य्या्थी भा प्ुयातु भारय ल. खख कं वादा करने बाला सुख पातादहे, खीकी ल ४ इच्छा करने वाला खी ओर राज्य की श्च्छा करने: सज्यमाष्ठुयात् ॥२७४।॥ बाला रज्य को पाता ह ॥ २७६ ॥ उसकी संभराम.
, अ०.६ माकैणडेयुराए ` ४७
-------- संग्रामे पिजयस्तस्य न च स्यान्नारकी गतिः। ५ ५ द श्र उसकी नारकी गति नही अतः परं कथाशेष; भ्ूयतां युनिस्म ॥२७५॥| मौ हे जेनिनिरी 1 ५६ र
विपाको राजसूयस्य प्रथिमीनयकारकः । यज्ञ का फल नी ६ का देने बाला सनि हे उसी प्रकार सारस श्रौर बगुले की लङ का तद्विषाकनिमित्तञ्च शवक महत् ॥२७६॥| भी महान् फल दै ॥ २७६॥ जो विश्वामित्र शौर
| विश्वामित्र वशिष्ठाभ्यां शापदोषादभूत्ततः॥२७७॥ वशिष्टमे शापक्े दोष से श्रापस मे हर ॥२७७॥ | इति श्रीमाकेण्डेयपुराण में हरिश्चन्द्र उपाख्यान नाम -का आवां अध्याय समाप्त ।
. -- ®9-०५€4-- नवां अध्याय | पक्षिण उचुः पत्ती बो्ते - । राल्यच्युते हरिश्चन्द्र गते च त्रिदशालयम् । राज्यवच्युत दोकषर राजा हरिश्चन्द्र के स्वर
॥ प्चनेपर उनके.परम तेजस्वी पुरोदित श्रीवशिष्टजी निश्चक्राम \महातेजा जल्षवासात् पुरोहितः ॥ १॥ जलवास से निकले ॥ १॥ मुनि वशिष्ठजी ` खङ्करप
वशिष्ठो दादशाब्दान्ते गङ्गापस्यषितो युनि; । | के कारण ग्ाजक्त मे वारह चं रढने के वाद्
चाहर निकले श्नीर उन्दने विश्वामित्र की सव शुश्राव च समस्तन्तु पिश्वाभित्रविचेष्टितम् ॥ २॥ लोचषादीः हवी ॥ २१. की दि
हरिश्चनरस्य नाशल्च रात्श्चोदारकम्मंणः । | राज्य का नाश, उनका चाडाल होना तथा उनकी „८ चणडालसम्पयोगल्च भाया -तनयगिक्रयम् ॥ ३ खी शोर पुज का विक्रय श्रादि वातं खनीं ॥२॥ स श्रुला उमहाभांगः ्रीतिमानवनीपतौ 1 | श साज सा कोम मे विलं
कोपं विश्व [मिन
चकार कोपं तेजस्वी विश्वामितरपूपिं भति ॥ ४॥| करके ध विश्वा | केभ्रति ष चशिष्ठ उवाच वशिष्ठ वोले-- ति
मम पुत्रशतं तेन विश्वामित्रेण धारितम् । दे विभ्वामित्र ! तुमने मेरे सौ पुज का वध
| । किया था उस खमय भी सुभे इतना क्रोध न हरा तत्रापि नाभवत् ऋोधस्ताटशो याटशोऽमे ॥ ५॥ था जितना श्राज है ॥५॥ भने खना किं राजा
श्रता नराधिपमिमं स्वराज्यादवगोपितम् । | इरिग्चनदर न घमं के शये श्चपना राज्य भी छोड़ ॐ ॥ ¡॑देवत्ाह्मणपून दिया, पेसे महात्मा, महाभाग, देव-बाह्मणु-पूजकः महात्सान महाम एपूलकम् ॥ ९ ॥ ॥ ६॥ ओरौर सत्यवान्, कमा करने वले, शत्रु यस्मात् स सत्यवाक् शान्तः शत्रावपि तरिमत्सरः। | से भी वैर भाव नदी जिनको रेखे, निष्पाप, धमा अनागार्यैव धर्म्मात्मा श्रभरमत्तो मदाश्रयः ॥ ७॥|| त्मा, निरभिमानी, मेरे भक्त राजा को ॥७॥ पल्ली,
नीभृत्यपुत्रसत॒ † दशां चप्; | . | पत्र श्रौर सेवक सष्ित दस दशा फो पर्चा दिया ६ भापितोज्यां दर्णा चपः । तथा उसका राज्य हरण करके वहुत व्याकुल किया
स राज्याच्च्यावितोऽनेन बहुश्च सिसी ८ ।| ॥ ८॥ सिये इात्म, ब्रेषी, यजो को तस्माहदुरातमा ब्रहमद्धट् भङ्गानामवरोपितः। | न्ट करते वाला मूढ़ विश्वामिन मेरे शापदं वयुले
` भच्छापोपहतो मृद्; घ॒ वकत्वमवाप्स्यति ॥ & ॥ के शरीर को पास दो ॥ ६॥ | ; 7७ + जव विश्वामिच्न ने वशिष्टजी का शाप ना ला शापं महातेन मिरवामित्ऽप सौति तव रोध करके वशिष्जी से कहा कि.मेरे शापसे"
त्वमप्यादिरभवरसवेति , रतिशापमयच्छत् ॥१०॥ तुभ भी ससस हो जाश्नो ॥ १०॥ अपस के शाप
छ
माक॑रदैयपुराण
० ञ्च च् † &
श अन्योऽन्यशापात् तौ भरा्षौ तिर्यक परमच् ती। | से महा तेजस्वी निष्ट तथा कौशिक विश्वामि्र
वशिष्टः स महातेजा पिश्वामित्रश्च फोशिकः ।॥११॥
ञरन्यजातिसमायोगं गतावध्यमितौनसो । युयुधातेऽतिसंरव्धौ महावलपरक्रमां ॥१२॥
अरहरन्तौ भयं तीव्र भजानां च्क्रतुस्तदा । विधूय पक्षाणि वको रक्तोदटताकिराहनत् ॥१३। ग्रां सोऽष्युनतग्रीयो वकं पटभ्यामत।इयत् । तयोः पक्षानिलापास्ताः भरपेतुर्गिरयो यवि ॥१४॥ गिरिपपाताभिदता चकम्पे च वसुन्धरा | मा कम्पमाना जलधीलुहरत्ावंश्वकार च ॥१५॥ लनाम॒सैकया््वेन पातालगमनोन्पुखी । केधिद्धिरिनिपातेन केविदम्भोधिवारिण ॥१६।॥} केचिन्मदीषञ्चलनात् परययुः पाणिनः क्षयम् ।
इति सव्यं परित्रस्तं हाहाभूतमचेतनम् ॥१५७॥ जगदासीत् सुसम्प्रानतं प्यस्तक्षितिमण्डलम् ।
हा वत्स हा कान्त शिशो प्रयाघ्रषोऽस्मि संस्थितः१ हा भिये कन्त शैलोऽयं पतत्याशु पलायताम् | इत्याङ्लीशचते लेके | सन्व्रासथिघ्ुखे तदा ॥१६॥ सुरैः परितः र्ैरानगाम पितामहः । पल्युधाच च विश्वेशस्तावुभावतिकोपितौ ॥२०॥ युद्ध वां पिरमस्वेतल्लोकाः स्वास्थ्य बरनन्तु च । भृएवन्तावपि तौ वाक्यं ह्मणोऽव्यक्तनन्मनः।२१॥ केषासर्षसमाविष्टौ युयुधाते न तस्थतुः | ततः पितामहो देषस्तं द्म लोक्यम् ॥२२' तयोश्च हितमन्विच्छन् तिय्यैगावमपाजुदत् ॥२३॥ ततस्तौ पूववदेहस्थौ पराह देवः प्रनापएतिः । वयुदस्ते तामसे भवे वशिष्ठ-कौशिकषेभो ॥२४॥ जरि वत्सं वशिष्ठ लं त्वञ्च कोशिक सत्तम ¦ ` तामसं भावमाभित्य दैहगयुद्ध चिकीर्षितम् ॥२५॥ राजछूयधिपाकोाऽ्यं हरिश्चन्द्रस्य भूपते; । युवयेर्विग्रहश्चायं पृथिवी क्षयकारक; ।२६॥ न चापि कौशिकश्र्टस्तस्य रात्नोऽपराध्यते । स्वग॑माषिकरो ब्रहमनुपकारणदे स्थितः ॥२७
~ कत्तारो. कामक्रोधवशं गतौ ।..
ने परती का स्वरूप धारण किया -1 ११॥ दखसी ` योनि में जाने परः भी परम तेजस्वी वे दोनों महा. - वली श्मौर पराक्रमी परस्परः युद्ध करने लगे ॥ १२॥ आपस मे एक दुसरे पर भरहर करते इष सफेद पंख वाले वगुला ने लाल आँख करके वार किया 1 १३॥ सारस ने भी लम्बी गर्दन करके वगु को पेये से मारा, उनके पंखों की हवा सते पटाड् उड् कर प्थ्वीपर गिरतेथे ॥९४॥ पटाडके गिरनेसे भूमि कम्पित होग्ई । पृथ्वीके कम्पित होने से समुद्धफी तरङ्गं मे उथल-पाथल होगई ॥ १५॥ पृथ्नी शक अङ्गं से पाताल जाने को उत्छुक दोग । कुष्ठ लोग पाङ के गिरने से, छद समुद्र के जलल से ॥ १६ ॥ इ लोग भूकस्पसे नाशको प्ा्षहुए । इसी पकार सव लोग भयभीतः हो पृथ्वीतल्ल पर हादाकार कर रहे थे ॥ १७॥ पृथ्वीमरडल पर जगत् भरमे मूर्त से होकर लोग दा वत्स, . हा कान्त, दा, शिषः आदि कहते थे } कुद कहते थे कि दम जाते हे ॥ दा भिय, हा कान्त यद पर्व॑त गिरता यहं कंकर जल्दी भागतेहुष लोग भयसे व्याकुल होकर एकं दूसरेसे भिमुख होगये॥९श।उखसमय सव देवतानं सहित बह्याजी वदाँ आये श्नौर उन वि्वेशजी ने ` उन दोनों क्रोधित हए ऋषियों से कटा ॥२०॥ अव ` आप लोग युद्ध बन्द कीजिये जिससे संसार भैः उख शाम्ति हो / अभ्यक्त जन्मा, पितामह ब्रह्माजी के वाक्य सुनने पर भी ॥२९॥ कोध श्नौर ई्यां से वे लोय आसि विगाडते इष युद्ध करते टी रटे 1 किर पितामह बह्माजी ने लोक का नाश देखकर ॥ तथा उन दोनों का हित विचार कर उनके पत्ती- माच को दरण कर लिया ॥ २३॥ फिर जापति - बह्माजी ने तामसी भाव को द्ोड़कर पूरवैवत् सप. पाये इष उन दोनों बि श्नौर विश्वाभि पियो. के प्रतिं कठा ॥ २४ ॥ हे पुज वरिष्ठ च विश्वामित्र! मने अपने मदत्व को छोड़कर श्नौर ताससी भाव ` का आभ्रयलेकर इस कार युद्ध क्रिया ॥२९॥ क्या सजा द््नद्र क राजसूय यज्ञ का यद फल होना चाद्ये कि आप ल्लोगों के -पारस्परिक युद्धः से पृथ्वी कां नाश होजाय १॥ २६॥. ह बशिष्टजीः! . विंश्वामिजने राजा हरिश्चन्द्र राध नहीं किया दै, व गोद र
जो उन सवनं ही किया. द जो उन स्वगं कौ भाति करा है ॥ २७॥ कामं चीर कोध तपे विध्न उपस्थित करते.दै, श्सलिये
६ १० ७ ` मार्करडयपुराण ४६
परित्यजत भद मो ब्रह्म हि भचुरं -वलम् ।(२८॥! इख भ्रमङ्गलकारी कोध.को, छोडो । तपसा ब्राह्म का वल ह ॥र८॥ ब्रह्माजी के पेता कंहने परर चे
। एवयक्तौ ततस्तेन लज्नितौ तावुभावपि | । दोनों वहतः ललित हप श्मौर पक दूसरे फी स्मा पषमयामासतुः भरत्या परिष्वज्य परस्परम् ॥२६। क् कि पूवकं मिल गये ॥ २६॥ इसके श्रनन्त्र
= + 6 ञं निनं = से पूि ब्रह्मो लोक तवः नयमान ब्रा लोकं निन यवो। | न पणो
वशिष्टोऽगयात्मनः स्थानं कौशिकोऽपि स्वमाश्रमम्] थम को गये ॥३०॥ इस भकार सारस शौर एतदाह्िवकं युद्ध हरिश्चनद्रकथां तथा । | बगुते की लड़ाई तथा दरिद्र को कथा को जो रथमि्य्तये र्यः सम्पद् रोपयन्ति चै ये३१॥| क कमे अथवा भली मनर उरे) ३१)
` तैषां पापापनोदन्ु श्रतं < उनके पापों का नाश होगा तथा इनके कंथा सुन र पापापनोदन्तु रुतं ह्यव करिष्यति। , | कर जो कोई व्यक्ति कायं करेगा उसको ` कोई न चेष विष्नकाय्यांशि मृषिष्यन्ति कदाचन ॥२२॥| विष्न उपस्थित न होगे ॥२२॥
इति श्रीमाक॑र्डेवपुराण मे आदौ कक युद्धम ताँ अध्याय समरप । ~ अवे क |
दसवां अष्याय । जैमिनिरुवाच ` जैमिनिजी बोले . ० संशयं द्विनशादृदूलाः भन्ूत॒ मम पृच्छतः । हे पकतिराज | जो सुभे संशय दै उसको भी मै आपिमौवःतिमावौ भूतानां त्र ससित ॥ ॥ पवा हंसे ष्वा जो जनभमो ५... ९ स्थितिदे॥शासो यह जीर किसभकार उत्यब दोतेषि
कथं ज्ञायते जनतः कथं भा स मिवदध॑ते। , | (छिस तष्ट बद बृ है, ल तरद बद. उद कथं वेदृरमध्यस्यसितषटस्ङ्गनिपीडित;ः ॥ २॥ पीड़ा स्ता हशर ठदरता है ! ॥२॥ द्रं से निष्करान्िशुदरात् पराप्य कथंवा दृद्धिगच्छति । किस भकार वार् होकर चृद्धिको मरातत दोता ध उततरान्तिकाले च कथंत्िदभावेन निबुवयते | ३ ॥ ट ते बादर ने ॐ समय ब्रह कस भानं;
स्थित होता है ॥ २ ॥ श्रपने सुरत बु दुष्ठत का छता पृतस्तथाश्नाति उभे सुङतदुष्छे । पल किंस अकार पाता है तथा मरने के वाद व॒द कथं ते च तथा तस्य फलं सम्पादयन्त्मुत ॥ ४ किंस प्रकार भोग करता दै १ ॥४॥ सखरीके गमंशय ` कथं न जीय्यैते तत्र पिर्दीकृत इवाशये । | मै पिरडी के समान रहने वाला यद छोयाप्तो स्फेष्ठ यत्र जीय्यन्ते मुक्तानि सुगुरूष्थि ॥ | जीव स्री के कोठ र कथो नदीं जल जाता जिसमे
भक्ष्याशि यत्र ने जन्तुनीरययते कथमसपकः ॥ ५ ॥| अति कठिन वस्ते" मी पच जाती है१॥५॥ इस लिप सुभकोः ककर संदेह रदित कृर दीजिये,
॥ एतः /-1 न सन्दहे | वर्म तम् = एतन्मे नूत सकलं सन्देहेक्तिषिवभ्नितम् । | कारण कविय बिपय गापत दै शौर श्लकःवावतः ` तदेतद् परमं युद्धं यत्र बु्न्ति जन्तवः ॥ ६ ॥ लोगा जम् म है ॥ ६॥ . , पतिणञ्बुः पत्ती बोले- परश्नभारोऽयमतुलस्खयास्मासु निवेशितः । हे जैमिनि ऋषि ! श्रापने इं भशन कषा श्रतुलं |
दुभाव्यः सर्वभूतानां भावाभावसमाभितः ।। ७॥|| मार दम् पर रख दिया है । य् भ्न भावं शरोर | । + शरमाव के संरक्त तथा दुभा दै ॥9॥ दे महाभाग |
तं शन मामा य्था माह पितु य = छा सुपति नप्र व हे पकात मै, ब्राह्मणि मागंषः करिचित् पुत्तमाह महामतिः): । विद्धान् यु वंशी त्राह का अद्रूषं प्र पुर
८ ५९५५
9६ । माकेर्डेयपुराश .. > अ० १०
सुमति नाम बाला था । पिता ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार करणया 1 ६1 पिता ने अपने पुत्र से कटा, "हे सुमति ! कम पूर्वक वेदों को पटो श्रौर गु क्म सेवा में रहकर भिक्त मांयकर भोजन किया कसो 1१० ॥ इसके वादे ग्रहस्थ धमं म परविष् होकर उत्तम यज्ञो को करते हषं पुने उत्पन्न करो प्रौर फिर उस्के.वाद वनदास यरद करो ॥ -११॥ पिर वार्षस्थ म जाकर सन्यास अहर कसे । इससे ब्रह्न मे पहुचोगे जां जाकर .शोक रहित दोजाश्रोगे ॥ १२॥ . `
पदी वोल्े- ।
` इख रकार वहुत ङ समरभाये जने पर भी वह अङ् पुत्र छऊुद्ध न बोला । पितानेभी धीति पूकेक वार वार कटा ॥ १३॥ पुव-स्तेह से मीठे २ श्रक्तरों मे पिता के वहत वार कहने पर स॒मतिर्देस कर यह वोला 1१७ हे तात ! श्रापने जो श्रभी उपदेश किया है इसका भने वहत श्भ्याख किया है । इसी मकार शिल्प विध्या श्रादि अन्य' शासं का भी श्रध्ययन किया है ॥ ९५॥ मेरे स्थति परल पर हजारो जन्मो का चृतन्त शङ्कित है ! निर्वेद ` शरीर परितोष आदि क्ञानभी सुभे भास है 1२६ सुमे, श्रनेकों शबः मि श्रौर सी यादिकोंकाबियोग तथा ; सयोग भाप हु श्रौर श्रनेकों पिता.तथा माताये भी हई ॥ ९७1 मेने इजाये दी वरह के दुख तथा सुखो का श्रनुभव किया हे । तथा अनेकं पक्रारके चन्धु तथा पिता मेरे हए ह ॥ ९८ ॥ ्रनेकः लिया
गभं मे जिनमे विष्ठा श्नौर सूत्र भयाद रहा हं तथा खसो रोग श्रौर पीड्य सुशको इई १६६] जितने भी डुः्ल सेने वाल्य, यौवन रः चदं अवस्थाश्नो मे उदाये है वे सव सुखे याद है ॥रगा
बाह्मण, सषतिय, वेश्यः शुद्र, पश, कीट, सुग तथा पक्ति की अनेक योदियो में उत्प हु) २९॥ तथा राजसेवको ओर वलशाली राजान्न के घरमे मेरा जन्म हु । अन्त मे अवमे अपके घरमे जन्मा ह ॥ २२ ॥ मै वहुत से सनुष्य¡ की दासतामे रहा हं खरौर इखी प्रकार वहुतों का स्वामी ! मै कभी धनी दुमा चरर कभी दरिद्री 1२२ कमी मैने मारां है श्नौर कितनी ही वार ॐ दूखसो से मारा गया ह कभी सुमे दुखसे ञे दान दिया है शौर कमी मेने इखरो को दान दिया है ॥ २७॥ पिता, माता, मित्र,
भाई, सी से कितनी, वार संतु शमा ह रौरं
कृतोपनयनं शान्तं सुमतिं भड्रूपरिणम् ॥ ६ ॥ वेदातधीष्व सुमते. यथालुक्रममादितः । गुर्भरषणे व्यग्रो मे्ान्नकृतमोजनः ॥१०॥ तत्ता गारहस्थ्यमास्थाय चेष्टा यज्ञानसुत्तमान् । इषुत्पादयापत्यमाश्येया अनं ततः ॥११॥ वनस्थश्च तता पत्य परिवाडनिष्परिग्रहः एवमप्स्यसि तदुच्ह्म यत्र गत्वा न शेचसि \१२॥ पए सु इत्येषुक्तो बहुशो भजदत्वान्ाह किंचन । ` पितापि तं सुबहशः पाह भरत्या पुनः पुनः ॥१३२॥ इति पित्रा सुतस्नेदात् पलेमि सधुराक्षरम् । स चायमानो बहुशः परहस्येदसथात्रवीत् ।१४॥ तातेतद्रहुशोऽभ्यस्तं यद् त्यायोपदिश्यते । तथैवान्यानि शस्ाणि शिल्पानि विविधानि च १५ जन्सनामयुतं साग्रं सम स्मृतिपथं गतम् । निर्वदाः परितोषश्च क्षयदृद्धथ दये रताः ॥१६॥ शपुमि्रक्लत्राणं पियोसाः सङ्गमास्तथा | सातरे षिविधा दृष्टाः पितरो षिषिधास्तथा ॥ १७1] असुमृतानि सौर्यनि दुःखानि च सहस्रशः बान्धवा वहवः प्रावा; पितरश्च पृथणिधाः ॥१८॥ विण्मूत्रपिच्छले श्नीणं तथा काष्ठे मयोपितेय् । पीदाश्च सुशं पाठा रोगाणाञ्च सहस्रशः ॥१६॥ गभदु;खान्यनेकानि बालत्वे वौबने तथा । हृदधतायां तथाप्तानि तानि सव्वाणि संस्मरे ॥२०॥ त्राह्मणशषत्रिय-विशां शूद्राणान्चापि योनिषु । पुनश्च पशुकोयनां सृगाणासथ पक्षिणाम् ॥२१ तथेव राजभृत्यानां रइाञ्याहवशालिनाम् । सथुत्प्ोऽस्मि गेहेषु तथेव तव वेश्मनि ॥२२॥ सत्यतां दासताञ्चेव गतोऽस्मि वहुशो णाम् ! ` स्वामित्वमीश्वरत्वंच दरिद्रत्वं तथा गतः ॥२३॥ हतं मया इतश्चान्येहेतं मे घातितं तथा । द्त्तं ममान्यैरन्येभ्यो मया दत्तमनेकशः ॥२४॥ “ -माद-सद्दमारकलत्रादिङतेन च -
श्र० १० ‡ माकंरदेयपुराण । ५१
तु्टोऽस्त् तथा दैन्यमश्रुषौताननो गतः ॥२५ कभी-कभी इनके वियोगं मे रेया ह ॥२५॥ हे तात. इस प्रकार इस संसार चक्र से कष्ट पैक भ्रमण
ऽ एवं संसारचकरऽस्मिन भ्रमता तात सङ्कटे । | करतेकरते सुमे यह कान जो भोति का
्ञानमेतन्मया पपं मोक्षसम्माधनिकारकम् ॥२६॥| साधन है मिला ॥२६॥ उस ज्ञान फे ` कारण मु
विहते यत्र सर्वबोऽयगृग्यशचः सामसंकितः वे न कलाप क सामवेद, युवद ह त्रि तास अच्छा चह लगता ह्. ॥ २७॥ मुश््को याकलापौ विगुणो न सम्यक् अतिभाति मे।।२७॥ वेद से क्या थो अत
तस्मदुत्यंनवोधस्य वेदैः किं मे प्रयोजनम् । | गया है श्रौर मै शुरु के ज्ञान से ठतत. हा निरमि गुरुविज्ञनतप्रस्यं निरीहस्य सदात्मनः ॥२८॥॥| लाषी तथा ्रत्मन्ञानी हँ ॥ २८॥ छः भकारे की
पटपकारक्रिया-दुःख-सुख-र्ष-रसैथ यत् । | किया डल, खख, हप, रसः ण इन सव से पर परब्रह्म पद् को प्राप्त करूंगा ॥ २६॥ रस, दष,
युश वरवनतत्रह्म तत् भाप्स्यामि परं पदम्॥२६॥| भय, इदे, रोध, राम ्ौर जरा से व्याल
रस-हप-भयोदधेग-करोधामषं-नरातुराम् । | मण्य शत पाश मे वंधे बा नौर शग के विङ्गातां श्वमृगग्राहिनसं । समान दे ॥२०॥ इसलिये मे इस रकार दुःख उत्पन्न चिङातां रवमूगग्राहि संयपाशरताृलाम् ॥२०॥ करने वाली सन्तति को पेदा न कर परम पद कोः
तर्माटूयास्यम्यहं तात त्यक्तयेमां टुःखसन्ततिम् । | जाऊंगा । तीनों वेदों दवारा कदे हद धरमरूपी धर्म का च्रवलम्बन करने के वरावर पाप चौर
यीषम्ममधम्माव्यं किम्पाकफलसननिमम् ॥२१॥| कौन खा ह १ ॥ २१॥
पत्तिण ऊचु पत्ती बोले- तस्य -तदहटचनं श्रुत्वा हपविस्मयगद्रदम् | उखका बट वचन सुनकर हषं जौर आश्चर्य से गदुगद होकर ग्निना ने प्रसन्न होकर अपने. (पिता माह .महाभागः स्वसुतं हटमानसः ॥३२ | पुत्र से पृचा ॥ ३९॥ पितोवाच पिता बोले किमेतहदसे वत्स कुतस्ते ज्ञानसम्भवः; । । . . दै बत्स ! य त॒म क्या कहते हो, तुमको ज्ञान:
कैसे दुश्रा ? कटां तम्दारी पुरानी जडता पेल ते जता पू्वमिदानीचच भवुद्धता । २३॥ कटां यदह विकसित ज्ञान १।३३॥ क्या किसी सुनि
विन्दु शापविकारोऽयं यनिदेवकृतस्तव । | या देवता के शापक कारण ये विकार्था ! तुम्हारा
य॑त् ते बानं तिरोभूतमाविरभावस्ुपागतम् ।३४॥| विपा ह्या कान अव किस भकार भ्रणर हा । ॥ हे वत्स ! मै वम्दास पूरं दृत्तान्त सव ॒सनना `
भोतुमिच्छोमि तव् सनव परं कोवलं हि मे। रं । भुभे ्रत्यन्त कौतूढल हे, . तुम सव -
सव्वं, तटूब्रूहि मेः वत्स यथा: त्तं पुरा तव ॥२५॥॥| दाल कटो ॥३५॥ ` । पुत्र उवाच पुत्र बोला-
तात यथा इतं - । . हे तात } सुनियि कि जिख प्रकार. मेय सुख
शृणु इतं ममेदं सुखदुःखदम् । | वा
५ यशवाहमासमन्यस्मिन् जन्मन्यस्मतपरन्तु यत् ॥२६॥ परथन्त सुभे स्मरणे सहा ॥ २६ ॥ ग धाचीन काल मे ` अहमासं. पुरा विभो न्यस्तात्मा परमात्मनि! | परमात्मा मे लीन एक बाह्मण था जो शरात्म-लान के.
ञ्रात्मवि्याविचारेषु परं निष्ठुपागतः ।॥(२७।॥ निरन्तर विचार से परम निष्ठा को पर्त हुशया॥३अ निरन्तर योगयुक्त तथा योग का ्रभ्यास
सततं योगयुक्तस्य सतताभ्याससङ्गमात् । खत्सङ्ग मे रहने से, श्रचछी परति व विचारविधि ` सत्संयोगात् स्वस्मभावाद्धिचारविधिशोधनात्।२८।॥| शोधन से ॥ ३८॥ सुमे परह्य मे परम प्रीति हरै
मेव श्नौर मै उसफे साथ संलग्न होगया । इसफे वाद् सि तिममासीहयुञतः सदा। न श्राचार्य॑त्न को प्राप्त कर शिष्यो के सन्देहा का
चान्राय्यताश्च सम्प्राप; शिष्यसन्देदहूतमः ॥२६॥ निष्रृत्ति कणे ला ॥२६॥ फि९ इक् क(ल व्यत
4.८8 ५१ न
५९ माकंण्डेपुराण भ्म» १३ ` =
; काज्े रेकान्तिकटुपागतः ! ` | होने पर अज्ञानता के कारण मेय सात्विकी भावे जरे त विपन्रथ॒भरमादत ॥४०।॥| निकल गया १ मो को भास दोषा सृत्य कै अ्ानृष्टसद् । वश इतरा ॥४० च्रनेक जन्मों की वाते सुभे योद, उत्कान्तिकालादारभ्य स्मृतिलोपो ने मेऽभवत् । | किसकिस जन्म मे कितते-कितने वपं जीयित यावदब्दं गतंयैव जन्मनां स्पृतिमागतम् ॥४१॥ रा चंड शुभो स्मरण है ॥ ४१॥ दे तात ¡ उसी पूव्वाभ्यासेन तेनैव सोऽ तात जितेन्द्रियः । पूर्वं के अभ्यास से मँ जितेन्द्रिय ह ओर इस तरद
यिष्यामि द „_ __ , „| "यत्ने केरना चादता्ं कि जिससे मुभे फिर श्रक्षान यतिष्यामि तया कतु न मनिष्ये वथा पुनः ॥४९॥| न हो ॥४॥ मरे कान के दान काफल यदीह कि
शानदानफलं यं तचज्नािस्मरणं , मम । | मुम सव जन्मो का चरतान्त स्मरण दै । पेसी न देतत् भ्यते तात बरथीयरममाभितैरेः ॥४३।| स्थिति जयी धरम भे शराभरित ममु को भास नदी सोऽं ए्ाममादेव निष्ठामधषपाभितः । | ३५५२ मे ॐ आम के कार् येना रकान्तिलयपागम्य यतिष्यम्यातमीसषरो ।१४४॥ धरम भाप है चौर धव मै पकान्ते वाख कर श्रपनी | त त सायकं 0 मोक् का यत्न करूंगा ॥४४॥ इसलिये हे मह्याभाग ! तदुनरहि लं महाभाग य॑ ते सांशयिकं हृदि । लो ठ लद संय हो उसे कटो, उसकी निदत्त एतावतापि ते भरीति्ुत्पायाद्रए्यमाप्तुयाम् ॥४५।॥| कर मे अरपिके ऋण से शुक्त हो जाऊ गा ॥ ४५॥ ` पर्िण उखः पदी बोहे-- , , | ध श त दे जेमिनिजी { जो पश्च अपने दमसे पूद्धे हं पिता प्राहं तवं; पत्रं शरद्धत् तस्य तदच; । | वेदी भन्न पितोने उस अपने पुसे शद्धापूैक पूय॥ भता यद्वयं पृष्टाः संसारप्ररणाश्रयम् ॥४९॥॥| पुज वोला- | पुत्र उवाच 1 तत्व को मैने प्मरचुभव द ॥ 0 उसको सुनिये । यह संसारचक्रं वड़ा जरै इस शर रात यथी तत्वमतुमूतं मया्यडत्। | मे किसी की स्थिति नदे चरथान् इस संसार संसारवक्रमनरं॑स्थितियर्य न वियते ॥४७॥| सव चक्रवत् मते ह ॥७९॥ हे पिता आपकी सोऽहं वदामि ते सव्वं तवैवासुज्ञया पितः। श्राहञासे उस सध इत्तान्त को .उत्पत्ति.के, समय उ्राम्तिकालादारभ्य यथा नान्धो बदिष्यति॥४८।॥| से मर्ण पर्यन्त करा कि जिस भकार कोई दसरा न कट सकेगा ॥ ४८'॥ शरीर मै स्थित उष्मा तीर उष्मा कुपितः काये तीत्रवायुसमीरितः। वायु से पर इ कुपित 'दोकर ममे स्थानो "को भिनत्ति मम्भस्यानानि दीप्यमानो निरिन्धनः।॥४६॥| कादती है शौर विना ईधन ॐ ही श्रन्ति ज्वलित उदानो नाम ॒पवनस्ततश्रोद्ध॒भ्रवत्तैते। । फरती द ॥ ४६॥ उर्दान नाम की वाणु जो क ्कतानामम्युक्ष्याणामथोगतिनिरोष्च् ॥५०॥ खाया या पिया जाता द ऽते नीचे की ओर ते
9 ^ 4 भोजने ध जाती है ॥ ५०॥ अन्न ्नौर जल जो करि भोजने तत येनाम्बुदानानि कतान्यन्नरपास्तथा । होतः पान त पवा जता ह शठे त्ये
दत्ताः स तस्य आहादमापदि प्रतिपद्यते ॥५१॥| श्रह्ाद हो जाता है ॥ ५१॥ जो मजुष्य अद्धा से ्रन्नानि येन दत्तानि श्रद्धापूतेन चेतसा । ५ चित्त दोक र न त टै वदं ` >< 5 ॐ मरने पर विना अन्न कभी दक्षि को माप्त होतादे।॥
सोऽपि ृतषिमवातोति मिनाप्यन्नेन च ६ ॥ ५२॥ जो मढ नदी.बोलते है; जो किंसीका अपकार नी , येनादतानि नेक्तानि मीतिभेदंः छतो न च। | करते, जो श्रास्तिक श्र श्रद्धावान् ह वे सुसाूर्वक
परास्तिकः ्रदधानश्च स सुखं भ्युशच्छति | सो दते है १ ४३॥ ज लोग बराह्मण न्रीर
देवत्रा्यएपूजा यां ये रता नालुसूयवः 1 -की पूजा कंते द, किसी कीं निन्दा नदीं , श्वा वदान्या दीमन्तस्ते नरा! युखंगृत्यवः ॥५४।॥ ह सात्विक तथा उचित भाव करने वले है, ` यो न कामाच संरम्भा दं पाद्मीधुलछमनेत्। | > .भ्ठमान सुण स चय का, मात करते हं ॥ व जो लोग प॑ने स्वां के तिथे धर्थको नदीं छोडुते “` ५: < साम्यशचः स सुखं मृत्युमृच्छति ॥५१।॥ है, निंस्कयरः दै. उचित कमी कने ल तने
. + ~
क» १० , माद॑र्डेयपुराण ‡ ५३
----~-------------------~------------------------- ---------------<--<=---------------- वारिदायिनो दाहं भुधाश्चानन्नदायिनः। वे सुख पूर्वक मरते द ॥ ५५॥ जो लोग प्यासे को
शे पानी च्रौर भूखे को श्रनन देते. है उनको सय के
भप्लुबन्ति नाकाले तस्मिन् ृत्यवुपस्थिते॥५६॥ वाद र रर पानी मिता हैः ॥४६॥ जो सोग शीतं जयन्तीन्धनदास्ताप॑चन्दनदायिनः | | जाडं म ईधन देते ह उनको मरते समय टरडनंहीं # वेदनां कणं ये चालुदेभकारिणः लगती है तथा जो लोग चन्दन देते है उनको उस भारा पेदनां कं ये चाजुद्र गकारिणः ।५७॥ । सम्रय गमी नदीं लगती है ॥ ५७॥ जो मोह श्रौर मोदाङ्ञानमदातारः प्राप्लुनिति महदधयम् । | श्कान क्षलति दै वे दुष्ट मलुप्य उग्र वेदनाश्रों से पेदनाभिरुदग्रामिः भषीच्यन्तेप्थमा नगः ॥१८॥ ४ हप महान् मय ध दत द।५८॥ ४ जो भंडी गवादी देता दै, भट बोलता है, श्रनुचित
कूटसाक्षी मृपावादौ यथासद्चशास्त ८ 1 | श्रादेश फरता है, तथा वेद की निन्दा करे बात् ते मोहगृत्यवः सरं तथा वेद्िमिन्दकाः ।॥५६॥ | लोग ये सव तय॒काल मे मूचछागरसत होते द।५६॥ परिभीपणाः पूतिगन्धा; कृटपुद्वरषाणयः । | णे मलयो के लिये यमराज के भयानक, दुगैन्ध- युक्त, हाथ मं मुंदगर लिये हुए तथा दु्त्मा दृत
सरागच्छन्ति दुरात्मानो यमस्य पुरुषास्तदा ।।६०॥ शाते है ॥६०॥ उन दतां को शाते हण देखकर च
प्रापे दकपयं तेषु जायते तस्य वेपथुः । | मद्य कंपने लगता दै तथा भै, माता, पिता,
्रन्दत्यविरते सोऽय श्राठ-मातृ-सुतानय ।६१॥ पत्र ्रादि फो सम्बोधन कर रोता है ॥ ६१ ॥ उस
४ समय दे तात ! वह मरप्य"विक्तिप्त फी ` तरह श्रस्त सास्य वागस्फुटा तात एकवणा विभाव्यते । | न्यस्त घोलने लगता दै, उसकी दृष्टि चक्षर खा दृष्टि भ्राम्यते घ्रासाच्छासाच्छुप्यतयथाननम् ६२॥| जाती दे तथा.उसद श्वास श्र शुंट खल जाता
ड्द ध॒ ष है ॥ ६२ ॥ ऊं वास केता ह्या, दष्ट भंग होकर प्वर्वासानित १ याऽ + ध देता दष्ववासान्वितः सोऽयदृिद्गसमन्वितः । प्रीर वेदना से युक्त बह मलष्य शरीर त्याग देता
.. ततः स वेदनाग्षटसतच्छरीरं विषुवति ॥६३॥| ॥६३॥ शीर घायु क साथ उसी हालत भे दूसरे
घाययग्रसारी तदरूपं ॑देहमन्यत् पपदते । | शरीर म जो विना मा चाप क उत्पन्न हा है ~ ^. ९ मावृ्पस्यमम् कर्मजन्य यातना भोगने फे लिये दै जाता दै । ^ ^ तत्कम्मने बातनाय न मृदपतूसम्भवभर् 1 | श्रवस्या श्रौर उधर उसकी पद्िले शरीर मेँ थ तलमाएवयोऽरस्या-संस्ानः प्रागमवें यया ॥६४।| उसे शस शरीर मे भी मालुम 0 है ॥६५ ६ ` 0 =, श्रनन्तर यमदूत उसे शीघ् कथिन पाशोसे च , ' ततरो दूतो यमस्याश्च पारावधाति दारणः । | इष्ड स मरा इरा ददिव शा की श्रो दण्ठमहारसम्धान्तं कप॑ते दक्षिणां दिशम् ॥६१॥| जाता जो मागे कुश, 1 पा ४ वापाये प्राण श्रादिसषृणं है तथा जिसमे कीं ॐ इश कण्टक षस्मीक 1 । | व्रसती है श्रौर जो कीं शरग्निलरडों से ५८५ तथा प्रदीप्रज्वल्तने फचिच्छुभरशतोकतरे ।॥६६॥| हो ग्दा दे ॥ ६९ ॥ कीं सूयं की ` , ` < मदीपषादित्यते दपा क्थमिः "तपन है तथा उसकी किरणों से शरीर जलता .. १५५५९ च॒ दधमने तदंशमिः | फेखे माम से यमदृत मदप्य को घसीयते.हुए ^ कृष्यते यमदूतेथाधिवस्नादमीपणैः ॥६७।॥| भयानक दुःख शब्द कटते हप ज्ञे जाते है ॥६७. पिकनममारसतषसिं $) इस भकार यमदूतौ का घसीरा इश्रा तथा ~` > , पेरिभक्ष्यमाणः रिवाशतः। गीढ्ं क्राजो मार्म.मे पड़ते टै लाया इद्रा,. ' - प्रयाति दारणे मर्गे एापकम्मां यमक्षयम् ॥६८॥ | पापी मद्य कठिन मागं व त पनु च्नोपानसदातास ‡ दनी, भूता, वख, श्र श्रादिकर दान क वार छ्रापानः य च पञ्चमद ७ । म्य सुख पूर्वक उत्तम मागे से जाते ह ॥ ६६। ते यानित मञुजा मागं तं सुन तथात्रदाः ॥९६। उसी प्रकार केश पाता श्रा, परवश श्ौर पाप < एवं केशानङ्कमवन्नवशः पापपीदितः । | डुःखित्त बह म्प्य घारदवे दिन -यमपुरी.*को `
नीयते द्वादशाहेन धमैरानपुरं , नरः ।॥७०॥। जाया जाता दै ॥ ७०॥
५४
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साक॑रुटेयपुराण
शभ १०५
कलेवरे दह्यमाने महान्तं . दाहगृच्छति । ताड्यमाने तथेवाक्तिं चि्माने च दारणम् ॥७१। छियमाने चिरतरं नन्ुदुःखमवाप्ुते । घेन कम्मैविपाकेण देहान्तरगतोऽपि सन् ॥७२॥ तत्र अ्रद्रान्थवास्तोयं प्रयच्छन्ति तिलः सह । यच्च पिं प्रयच्छन्ति नीयमानस्तदश्ुते ॥७२॥ लाभ्यङ्गो वान्थवानामङ्गसंबाहनश्च यत् । पेन चाप्याय्यते जन्तु्यचाश्नन्ति च बान्धवाः।।७४॥ श पहिमेर्नासयन्तं 4 ० शमासोति (> मौ स््रपदविमनात्यन्तं छ वान्धवः | शनं दददिमथ तथा जन्तुराप्याय्यते मृतः ॥७१५। तीयभानः सकं गेहं द्वादशाहं स पश्यति । उयभुङक्ते तथा दत्तं तोयपिर्डादिकं शुषि ॥७६॥ प्रदशादहात् परं घोरमायसं भीषणाकृतिम् । [म्यं परयत्यथो जन्तुः कृष्यमाणः पुरं ततः॥७७।
तमत्रोऽतिरक्ताक्षं भिन्नाञ्ञनचयपभम् । त्यु कालान्तकादीनां मध्ये पश्यतिवै यमम्॥७८॥ ्कणलवदनं भ्रकृटीदारुणाङ़ृतिम् । चेरूपेर्मपणोवक्रे् तं व्याधिशतेः मशम् ॥७६॥ दण्डासक्तं महाबाहुं पाशदस्तं सुभैरवम् ।
तन्निर्दिष्टां ततो याति गतिं जन्तु शभाश्भाम्॥८०॥ परे कटसी तु याति यथानरृतो नरः। तस्य सरूपं गदतो रौरवस्य निशामय ॥८१ पोजनानां सहस ढे रोरवौ हि ममाणतः | नदुमत्रममाणश्च ततः श्वभ्रः सुदुस्तरः ॥८२॥ [त्राङ्गास्चयोपेतं कृतञ्च धरणीसमम् । माञ्वरयमानस्तीव्र ख तापिताङ्भारभमिणा ॥८३॥ {न्सध्ये पापकम्माणं विञ्चन्ति थमासुगाः
प्र दद्यमानस्तीव्र ण ॒वहिना तत्र धावति ॥८४॥ ।द पदे च पादोऽस्य शीर्यते जीर्यते पुनः । प्होरत्रेणोद्धरणं॒पादन्यासंच गच्छति ।॥८५॥ {वविं सहस्रयुत्तीरणे ग्रोजनानां वियुच्यते । तोज्यं पापशुदधयथं तादृडनिरयमृच्छति ॥८६॥
‡
मं अत्यन्त दाह होता है तथा पीट रीर छेदे जाने के कारण उखका शरीर आतं हो जाता दै ॥ ७१॥ अपने कर्म के फल से जीव अनेक दुःख पाता है तथा दुखी योनि मेँ प्रवेश करता है ॥ ७२॥ उस समय उसके जो भाई वन्धु तिलो के साथ जल ठान करते हँ ओर पिंड देते है बह उसको प्राप्त होवा है ॥७३॥ श्रौर भी वीन्धव जो तेल लगाते दं द्रौर स्नान कराते श्रौर जो खाते है बह सव उसको श्रा दोता है मौर इससे उसको आनन्द मिलता है ॥ ७४ ॥ भाई वन्धु भूमि पर सोकर जो तकलीफ उटाते दँ तथा दानादिक करते ह उससे उस स्तक पाणी को श्रानन्द मिलता दै ॥ ७५॥ यमदूत के साथ जाता हु वह वार दिन तक श्रपने धर को देखता ह श्रौर उसके निमित्त दिये हए पिण्ड ओौर जल को भक्षण करता .है' ॥ ७६ ॥ चार दिन के वाद् बह घोर श्रीर भयानकः आर्ति बाला यमदूत उस नीचे सुख द्यि इए भासी को यमपुरी को ले जाता है ॥ ७७ ॥ क्तणमात्र म वह यमराज को देखता है जिखकी लाल-लाल श्रखिं है, जिसकी कान्ति काजल के.ठेर के समानहै नौर जो काल, सत्यु ज्रौर श्नन्तक आदिकं के वीच वेडा द्रा हे ॥ ७८ ॥ जिसका सुख दतोके कारण कराल हे श्रौर जिसकी भो भयानक हैँ भरौर जो विरूपः, भीयस्, वक्र तथा अनेक व्याधिर्यो से चारों श्रोर से धिया हा वैठा है ॥ ७६॥ श्नौर जिसके दाथ मं दरड दै, जिसकी युजायें वड़ी वडी है, जिसके हाथ मे पाश है श्रौर जो भयानक दै. पेसे यमराज के अ्रदेशानुखार वह जीव शुम चौरः अशुभ गति को भराप्त होता है ॥८०॥ जो मनुष्य ठी गवाही देता दहै या मिथ्या भापस करता दै उसको रौरव नरक प्रात होता है, अव उस रौरव नरक का हाल सुनिये ॥८१॥ रौर नरक का विस्तार दो सदस योजन दै शौर जाँघ तक उस की जमीन गहरी हे ॥ ८२॥ वह प्रथ्वी ङ्कारो से भरी इ हे रौर तीवरूप से तस हुई जलती रहती हे ॥८३॥ यमदूत लोग पापी फो उख रौरव के वीच मै उल देते है च्रीर बह पापी तीच श्रभ्नि से जलता इद्रा इधर उधर दौङ्ताहै ॥८४॥ पदपद् पर
| उसका पौँव गल गलकरः गिरवा दै तथा दिन रात
इसी प्रकार गल गल करः वह फिर टीकर दो जाता है ॥ इसीपक्छर सखो योजन बह फिर्ता रहताै, इसके चाद यसदूत उसे पापं शुद्धि के. निमित्त . नरक का भोग कराने के वास्ते ले -जाते ह ॥ ८६ ॥ .
'अ० ११ माकीरुडेयपुराण ५१
ततः सरववैषु निस्तीणैः पाषी तिव्य॑क्त्मशुते। | इ सव नरकं से निकल र ह दरमि-कीर- < पदे मशकादिषु ॥८७ ^ पक, छमि, कीट, पतङ्ग कत्ता श्रीर मच्छरो
कट-पतज्ग प्वापदे काद योनि मरे जातां है ८७ न्नर हाथी, वृत्त, गाय गत्वा गनहुमाचिपु गोष्वश्वेषु तथव च । | शौर घोडे. इत्यादि तथा श्न्य पापगुक्त ुःखद अन्यासु चैव पापासु दुःखदासु च योनिषु ८८.॥ योनियँ मै जाता है ॥=८॥ फिर मचुष्यं योनि मे ` मलुष॑भराप्यङ्ृव्नो चा इतस्सितो वामनोऽपिवा । | मात दोक ङरूप, कवश्, चाडाल, डोम आदि
॥ ति गर्हित योनियं मै जन्म पाता है ॥८६॥ पाप का { चण्डालपुकसादयछु नरा योनिषु नायते. | श ` अवशिष्टेन परपिन पुण्येन च समन्ितः। | कतनिय, वैश्य, शद्ध रादि योनिर्यो मे जन्म लेता दै
ततथारोहणीं ातिं शु्रवैश-दृपादिकाम् ॥६०॥| ॥ ६०॥ इसके वाद कमी बाहार श्रं देवता ॐ विप्रदेवेन्द्रतांचापि कदाचिदवरोहणीम् । घर मे जन्म क्तेता दै 1 यद ृत्तान्त उन पापियों का
पिं ॥ है जो नरको मे गिरते हें ॥६१ ॥ जिख पकार पुरय एवन्तु णो नरकेषु पतन्त्यधः ॥६६। श्रात्मा ज्लोग यमपुरी को जाकर धर्मराज की ्ा्ञा
यथां पुण्यकृतो यान्ति तन्मे निगदतः श्रृणु । | से पुरय गति को प्रा होते ह बद सुनो ॥ ६२॥
` ते यमेन विनिर्िष्ं यान्ति पुण्यां गतिं नरा५॥६२।| गन्धर्वौ के गायन सुल 8 छव चे भारा, भ्रटत्ताप्रसांगणाः , तथा हारः नृषुरकेमा भासे युक्त
1 मगीतगन्धव्वगणाः ६ । । व हारनूपरमाधु्य-शोभितान्युततमानि च ॥६२॥| माला से भूषित होकर स्वर्गं को जाते दै, फिर प्रयान्त्या षिमानानि नानादिग्यसरगुज्ज्वललाः। | बां से पृथवी पर ्राकर राजान्नं या श्नन्य महा- तस्माच प्रच्युता राज्ञामन्येषांच महात्मनाम् ।।६४॥ स्माशन के ॥ ९ ॥ ल मे उत्पन्न होकर सदुदृत्ति
जायन्ते च इते तत्र शदृहतपरिपरकषाः। | # पलक दो दी श्े अशये मोग बो [स्ततो यान्त्य ९ कर पुनः स्वगं को जाते हे ॥ ५॥ इस भकार ८ मोगान् म्भाप्लुबन्स्ततो यान््यु्वमन्यथा ॥| जीव थवी प्रात दै शरीर फिर स्वम को जते
ˆ अवरोहणीच शम्पाप्य पूर्व्ववहयान्ति मानवाः! | । हे पिता ! मैने बह सव इृचतान्त श्राप से कडा
त स , जन्यते । कि जिस तरद जीव को सुख श्रौर दुःख होता ह एतत् ते सव्वमाख्यातं यथा जन्तु श्व जिस थकार जीव गभ में पात होता है वह
प्रतः शृद्युष्व विप्रे यथा गभं प्रपद्यते ॥६६॥ वृत्तान्त सुनिये ॥ ६६॥ हति श्रीमकंर्ठेयषुराण मँ पिता-पुत्र सम्बाद (१) नामक दसवां अध्याय समाप
-- स~ €> -- ग्यारह्षां अष्यासे पु्र उवाच पुत्र (सुमति) ने कडा-- व (( , निषेकं मानवं ल्लीणां वीजं प्राप रजस्यथ । जिस समय पुरुष का वीयं खी के रज. ₹
` | मिलता है उसी समय स्वगं अथना नरक से वः बिषुक्तमात्रो नरकात् स्वगाद्रापि भपबयते ॥ १ ॥| जीव श्याकर उस भविष्ट दो जाता दै ॥ १॥
तेनाभिभृत तत् स्थैययं याति वीनद्वयं पितः}, | पिता ! कद् रन चौर वीयं इटा होकर स्थि कललं बुदुयुदत्वं ततः पेशिखमेष च ॥ २॥ होता ह श्रीर फिर डवल कर बुलवुले के सदः
+ वीजं > होकर पिंड वन जाता है ॥ २॥ जिस तर खेतर प । | श्रदुर उत्प होता है उसी तरह वीयं के पि : शानां तथोत्तिः पंचानामद्मागशः " २ अदर निकलता रीर इ विपे ते पाच भा
| होकर पाँच अङ्ग उत्प होते दै ॥३॥ फिर उपा
. ५६ भाक॑रुठेययुराण श्र° ११ 22222 र १ -प्रणानि च । | अंणुली, नेत्र, नासिका, कान, श्नौर नख श्रादि ५ यद्गुलौ त्र नासास्य | उत्पन्न होते है ॥ ४॥ इसके वाद त्रचा श्रौर उसमें
अरोहं पन्त चङ्ग भ्यस् तेभ्यो नलादिकम् ४ ^ सेमर श्रादि उत्पन्न होते ह नौर फिर शिर के याल खचि रोमाणि जायन्ते केशाश्ैव ततः परम् । । देते है । फि८ जिस प्रकार जीव वदता टै उसी समं सर्दधिमायाति पेनैबोद्धवकोषकम् ॥ ५ ॥ भकार खौ का उर भी वदता दै॥ ५॥ नारियल
के फल के समान वह जीव खी के.उदरः मं . नीचे नारिकेलफलं यदत् सपं ददिच्ति । मुख कयि हुए वद्धि को प्रात दोता है ॥ -६॥ उस
तद्वत्भयास्यपौ दि सकोषोऽथो खः स्थितः॥ ६ ॥| की दोनों जंघाये पश्वो ॐ साथ. रती द शरो ¢
९ 1 | | वोनों हाथ जघ श्रौर पावे के वीच मे रदकर
तले ठ नाश्व्यं करौ न्यस्य स दध त वृते है । शरंगूढी ऊपर की शरोर ' रहता दै शरीर
अगुठौ चोपरि न्यस्तो जान्वोरप्े तथांगुली ॥ ७ शरं लियां जंघा से श्रागेकी श्रोर निकली रदती
है ॥ ७॥ उसी प्रकार जातु की पीठ पर उसकी
नाुपृ्ठे तथा नेते जालुमध्ये च नासिका । | श्चि रहती है श्नौर जिं के मध्य मे उसकी
रिफिचौ पाष्णिद्वयस्थे च वाहन वहिःस्थिते। ८ ॥| नासिका होती है, दोनों भुजाय पार्श्वो से सटी
गदि ननः खग्मसंस्थितः रहती हं ॥ ८ ॥ खली के गभे मे स्थित जीव इस
एवं दद्धि करमाहयाति न्तुः तः। , | प्रकारः चरद्धि को भाल दोता है | श्रौर भी जन्तु
ञ्जः लन्तोर्यथा सूं $ जिस रूपके होते है उसी प्रकार उनकी स्थिति न्थसत््वोदरे रूपं तथा स्थितिः ॥ ६ ॥ होती दै ॥ ६॥ कटिन श्रग्नि के साथ रहतां श्ना
ठः याति शक्तपीतेन जीवति। | जो खी खाती"या पीती दै वही वट जीवे खाता काटिन्थमग्निना याति युक्त न
युणयापुरयाश्रयमयी स्थितिज॑न्तोस्तथोदरे ॥१०॥.का फल भोगना पडता दै ॥ १०॥ रीर आप्यायनी
नादी चाप्यायनी नाम नाभ्यां तस्य निबध्यते। व व र 1 “ [4 निबद्धोपनायते भ १ ति त सीणां तथान्त्शुपिरे सा निबद्धोपजायते ५११. | नौर विया नी २
क।मन्तिशुक्तपीतानि स्रीणां गर्भोद्रे यथा। | दै उसी भश्नार जीव यी धमता टता दै ौर खी तैराप्यायितदेहोऽ्सौ नन्हदिषय ।१२ | के खाये दी उसकी मी वृद्धि होती दै .॥ १२॥ तैरप्यायिपदेहोऽषौ छदविपति वे ॥१२ य सप्तीस्तस्य परान्त्यस्यवहयः संपारभूमयः.। | जन्मो की स्र दुनियाँ शरोर भूमिय का -स्मरण ततो निर्गदमायाति पीड्यमान इतस्ततः ॥१३ | रता है ॥ १२॥ इस गर्भ से मुक्तं देते हयी फिर नैवं करिष्यामि शुक्तमात्र इहोदत्। रेसा कोहै कायं नदीं करूंगा श्नौर वही यत्न
६ ४ करू गा जसे इस गभं मे पुनः न श्राना पड़े ॥ रथा तथा यतिष्यामि गभ नाप््याम्बहं यथा ॥१४॥ यद चिन्ता करता श्रा ज्नौर सकर जन्मों का
इति चिन्तयते स्मृत्वा जन्मदुःखशपानि वै। | स्मरण कर जे कुज दैवगति रथव कमं फल से यानि पृत्वानुभृतानि दैवमतानि यानि बै ॥१५।॥ इरा उसा उसको ज्ञान ठोजाता है. ॥ १५॥ फिर ततः कालक्रमाञ्जन्तुः परिवत्तत्यधोधुखः ।' | काल के क्रम से बह नीचे मुख करिया हच्मा- जीव
नवमे ' या दसं महीने को प्राप्त दोता हैः ॥ १६॥ नवमे दशमे वापि मासि सञ्जायते यतः ॥१६॥| उसके निकलने की इच्छा होने पर पाजापत्य की
निष्काम्यमाणो वतिन. मनापत्येन पीड्यते । ` | पेस्णा से बापु उसो निकालती है श्रौर व॒ निष्क म्यते च विलपन् हदि दुःखनिषीडितः ।१७।॥| निकल कर पीडित इदमा विलाप करता है ॥ १७॥ निष्कान्तशोदरान्मृच्चीमसद्यं प्रतिषचते | | उदर से निंकलते दी वह श्रसदय मून को भरा
भरामोति चेतनांचासौ बायुस्पशंसमन्वितः ॥१८॥ स त
-तुतस्तं बेष्णवी माया सम्कन्दति मोहिनी । | माया जो मोदिनीदे उसको आच्छादित कर देती
०११ ८ ` माकेर्टेयपुराण ८४
. श्रौर उससे विमोदित हो जने से उसका 0 सका क्षान विमोदितात्मासौ व्ञानभरंशमवाप्तुते ॥१६॥ नष्ट दो जातादे॥ १६॥ क्षान ष्ठ हो जाने पर
्रषट्ञानी बालभावं ततो जन्तुः प्रप्यते | ` जीव घालमाव को प्राप्त दोता है छीर फिर कमार ततः कौमारफावस्थां यौवनं इद्धतामपि ॥२०॥ श्रवस्था, यौवन श्रौर दधता फो ॥ २५ वद मरता ` एनश्च मरणं तदष्नन्म वाक्त मानवः । | दशनौ भिर जन्म पाता दै । इसी भकार संसार
[तवां ~ चक्र मे मदुप्य रदा के समानं ऊपर नीचे घूमता ततः ऽस्मिन् भ्राम्यते घटिगन््रवत् ॥२१॥॥ रहता हे ॥ २१॥ कमी वह स्वगं अ शरीर फमी
कदाचिद् सगमामोति कदाचिभिरयं नर; । | नस्क मे जाता दै । शौर कमी नरक म तथा कभी नरकचेवे स्रगच कदाचिच मतोऽष्जुते ॥२२॥ व जीता च्रीर मरता ५ ॥ कभी = कदाचिदत्रव पुनर्जतः खं ~ पृथ्वी पर शरीर त्याग छर श्रपने कर्मानुसार दू कदाचिद्रव एुननातः सवं कम्म सोऽश्ुते । जन्म मे जाता है नौर कभी श्रपने कमं का भोग कदाचिदुभुक्तकम्मां च यृतः सवश्पेन गच्छति ॥२३॥| करके थोड़े दी काल भै सत्यु पाता षै ॥ २३॥ द
कदाचिद =, पिताजी ! कमी शम श्रौर कमी धश्ुम कमं करने, दाद ठतो नायते श॒माशभे। से प्रारव्ध वश जीच जीता श्रौर मरता है शरीर
खलेफि नरके चैव युक्तभायो द्विजोत्तम ॥२४॥| कमो का फल भोगता इचा कभी स्वगं धीर कमी . नरक को जाता दै ॥ २७ ॥ हे पिता | नरके मदयन्
नरकेषु भहददुःखमेतदयत् स्रगवासिनः। डुभखो को देखकर स्वर्गवासी प्रसक्न होते रौर दृश्यन्ते तात मोदन्ते पात्यमानाश्च नारका; ॥२५॥| नारकी दुःखित दते दै ॥ २५॥ जो लोग स्वग मे' सर्गेऽपि दुःखमतुलं यदारोहणकालतः । | जते है उनको भी श्रतल दुभ इस चिन्तामे दोदा .
परिष्यामीत्येतन्मनसि वर्तते ॥२६॥ द कि कीं हम भी इस प्रग्निमं न गिर ॥ २६॥ न म्ये ह (4 नारकी लोगो को देखकर मदान् दुःख को माप्त ॥ भहददुःखमवाप्यते | | देते ह जीर दिन रात यही सो्वते दै करि करटी एतां ` तिमहं गन्तेतयहर्निशमनि तः ॥२७ । हमारी भी यद गति न हो जाय ॥ २७॥ उस जीय गर्भवासे महद्दुःखं जायमानस्य योनितः । | को भम श ध से ५ कर, याल्यावस्या ,
मथवा था दश्खहे दुःख [1 २० ]} ` जातस्य बालभावे च इधते दुःखमेव च ॥२८॥| थवा बहा, श | कोषसम्ब्दं यौवने ध काम, ब्रोध, श्या आदि से भौवन म भी भ्रति कमेष्यां कोधसम्न्धं यौवने चातिदुसहम् । | दुःख हे यदे म भी प्रायः दख ही, दुःख दै, टुःखभाया दृद्धता च मरणे दुःखषुत्तमम् ॥२६. | इससे मरण का ५ व ॥ (५ = +, . । यमदू तों दाय धसीटे जाकर नर म गिरेः ८ , ` कृष्यमाणस्य याम्ये नरकेषु च परात्यतः। ` । वमत जनम लेकर मरते ह श्रौर नरका भे: पुनश गों जन्माथ मरणं न॒रकस्तथा ॥१०॥| जाते है ॥ ३९ ॥ सी भांति इख | 1 ; यंसार्चद्गै घटियन््रत् घरीयन्न की तरह जीव प्रकृति कं चन प ४ 1 नन्तो पदिन् । चधा दुमा घूमता फिरता दै ॥ ३१॥ दे पिताजी | भ्राम्यन्ते भाकृतेवन्धेवदध्वा वध्यन्ति चासङर्२१॥ यदय पर संख 1 भी व ५ ध | ~ , सैकडध इभ्व लगे र्दवे ६! ध चके ` नास्ति तात सुखं किञ्चिदत्र दुःखशताङले । किय मलल करने बाला सँ यौ घम का पालन `
तस्मान्मोक्षाय यतता कथं सेव्या मया अ्रयी॥२२॥ क्या कर १॥ ३२ ॥
इति श्रीमाकरडेयपुराण मे पिता-त्र सम्बाद् (२) नासका ग्यारहवां श्र्याय समाप्त । | ~ "><
१८ माकंरटेयपुराए अ० १२
भारहवां भष्याय । पितोवाच पिता वोक्े- . (ि १ साघु बत्य त्वयाख्यातं संसारगहनं परम् । हे साधु पुर ! तुमने क्ञान-धदानरूपी माफल
न ४ देकर इख गहन वन रूपी संसार् का वर्णन हानपदोनसम्भूतं समाश्रित्य महाफलम् ॥ १ ॥| किया ॥१॥ हे मदामते ! जिस तरह क उसी नरकाः से रौरवस्तथ तरह अनेक नरक हैँ । सिस तरह तुमने रोर का ५ व | वशेन किया उसी. तरह विस्तार पूर्वक सच नर कों -वरितास्तात् समाचक्ष्व पिस्तरेण सदहामते ॥.२ का दृ्ान्त रन करो ॥ २॥
॥ पुज उवाच पुत्र वोला- ह ।सैरषस्ते समाख्यातः थमं नरको मया । प्रथम नरक रीरव हे जिसका हाल मने ठमसे
(व : पित! ¦ वर्णन किया । हे पिता ! चच महा रौरव नर का ॥५ आ वरन उुनिये ॥३॥ वेह चारो तरफ़ से वारह
योजनानां सदस्ाणि स्र पंच समन्तत; । हल्ञार थोजन है, उसकी भूमि तवि की दै. श्नौरः
त्र ताम्रमयी भृमिरधस्तस्य हुताशनः ॥ ४।| उसके नीचे श्रग्नि दै ॥ ४ ॥ उसके ताप से पसव | ९ दिशायं तप हैं रौर उदयकालके चन्द्रमाके समान रतापतप्ता सव्वाशा प्रोचदिन्दुसममभा । | जिसकी ज्योति दै बट दरशन शौर स्पशोषि के विमात्यपिमहारीद्रा दशनस्पशनादिषु ॥ ५॥| लिये महा भयानक दै ॥ ५॥ उसी नरक के वीचमं तस्यां द्धः कराभ्याश्चपटूभ्याज्चैव यमातुैः। | यमदूत दाथ श्नौर पांव वोँधकर पापियो को डाल
पापङ्न्मध्ये ; स॒ गच्छति ॥ ६ ५ देते ह शरीर वह पापी उसे गिरकर लोरखतादं ॥६॥ ष्यते पापडृन्सध्ये जुटान; स॒ गच्छति ॥ ६ स
(1 ९०. € कोलकं ४५ शकर काके कोल्ड थिकंमशकरतया = । | निद शारि उस मान र कीसनवीच कर खे भकष्यमाफस्तथा शभू तं भागँ विद्यते ॥ ७॥ ह ॥७॥ बद पापी पीडित होकर फिर वाप, मा, दद्मानः पितमातभरतिस्तातेति चाह्लः । भै, तात च्रादि को पुकारताहै ओौर उद्विग्न दोता
वद्त्यसङृदुष्ठिणनो न॒ शाम्तिमधिगच्छति ॥ ८ ।|| इअ कदं शान्ति नदी पाता हे ॥८॥ सदस वर्धो
५ दतिक्रान्तं तक दुश्ट-वुद्धि लोग पाप करने के कारण कष्ट भोग एवं तस्मानरमोषो वाप्यते । कर उससे मुक्त होते है ॥ ६॥ समी अकार तम
वरपायुतायुते | ५ 1 दष्ुद्धिमि ६ ; पापं यैः कृतं दु्ुद्धिभिः ॥ & ॥| नाम का दूसरा नरक हे जो ,मदा रौरव नरक से तथान्यस्तु तमो नाम सोऽतिशीतः खभावतः। | से भी अधिक दी है, स्वाभाविकतया जहां बहुत महारोरववदरयस्तया स॒ठमसा शृतः ॥१०॥ छर पी 1 ॥ शीतात्त स्तत्र तास्त धावन्तो नरास्तमसि दारुणे । | दारुण न्यकार म मारते ह शौरे पक दूसरे से परस्परं समासाद्य परिरभ्याश्रयन्ति च ॥११॥| लिपट कर श्राध्रय की तलाश मे भ्रमणे करते ह ॥
दन्तास्तषाज्व भज्यन्ते शीतार्तिपरिकम्पिताः | शीत से ्रातं होकर कोँपते-हुष उनके दांत ट्ट
जाते ह, भूख शरीर प्यास्त से व्याङ्कुल होकर अनेकं `
५ = वान्येऽ््युपद्रवा ११ व ति ॐ+ > पुच-खामवलास्तिव _ तथबान्यञ्युष्रनाः ।।१२॥| उपरो से युक्त होते दै ॥ १२] वाश्रं से उद् २ । हिमखण्डवहो वायुर्भिनत्यस्थीनि दारुणः 1 | कर हिमखरड उनकी डय को तोडते है रौर
न व) भल से पीडित होकर वे पने शरीर से गिरे हषः | तस्माद्शरुन्ति एपान्विताः ॥१३। ओर जूत को खाते है ॥३॥ परस्पर समागम लेलिहमाना ॒भ्नाम्यन्ते परस्परसमागमे । | मे पापी लोग प दूसरे को शीर चायते है, इस
| एवं तत्रापि सुमहान् हेशस्तमसि मानवैः ।|१९॥॥ भकार उस महान् अन्धकार मे पापी लोग मदान्.
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: ५ - जह्मणशरष्ट॒याबदूदुष्छृतसंक्षयः । ` का चेय नदीं होता तचत बद नरकमे रहता है ।
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| क पाते है ॥१७॥ हे पिता ! जवतक जीवके दुष्त , '
अ १२ । भकैरडेयपुरोण
नि्न्तन इति ख्यातस्ततोऽन्यो नरकोत्तमः ।१५ ` सके अतिरिक्तं निङृन्तन नाम . का दूसरा नरक है तस्मिन् कुलालचक्राणि भराम्यन्त्यविरतं पितः। य 1 की र
तेष्वारोप्य निकृत्यन्ते कालघेण मानवाः ॥१६॥ काल सू्रसे काया जावा है ॥ १६ ॥ हे दविजसत्तम ! यमदृत लोग कालसूत्र श्रंगुली मेँ लपेट कर उससे प्रालुगायुलिस्थन वत भापादतलमस्तकभू । पापियों को पांस से भस्तक तक काट डाल है, न. चेषां शो जायते द्विनसत्तस ॥१५७॥| लेकिन फिर भी उम पापिो की शत्य नदीं £ ` चित्नानि तेषां एतशः. खण्डान्येकयं वरजन्ति च| | ॥ १७॥ उनके शरीरो के सकद खरड हो जाते है | वर्पसहस्रारि पि यिलक्षर
एवं वर्षसहस्राणि चिन्ते पापकम्मिणः ॥१८॥| शौर वे खण्ड धनः मिलकर पक हो जते है, शस तावदयावदरोष स ४ प्रकार वे पापी हजारो वपं तक छदे जाते है ॥ जब । वै तत्पापं हि कषयं गतम् । | तका उनके पा य होकर निष नीं दोजते अभिष्य नरकं शरुष्व गदतो मम् ॥१६ तय तक उनको उस नरक रदा पता दै । अव त्रस्थनाकेदुःसमसहमलुभूयते | ८, | मँ अप्रतिष्ठ नाम नरक का दाल कता ह. उसको
- तान्येव ततर चक्राणि घटीयन्त्राणि चान्यते; ॥२०॥| उनिये ॥ १९॥ उस्म रहकर नारकी लोग .. भर । भल का श्रद्धमव करते दै । उसी मे चक्र श्रीर दुःखस्य हेतुभूतानि पापकृतां णाम् | | सरे टीयन्बर स्थित दै ॥ २०॥ यापी लोग दुः चक्रेष्वारोपिताः केचिदभाम्यन्ते तत्र मानवाः ॥२१॥| पाने के हेतु चक्र पर पडा कर घुमा जाते है॥२; ` यावद्षसहस्लाणि न तेपां जव तक हज्ञार वषं पर नदीं होते तव तक गक स्ञाणि न तेषां स्थितिरन्तरा । | वही कि अीयत्य ते जि
घटीयन्त्रेषु चैवान्यो वद्धस्तोये यथा घटी | जलका कलश वधा जाता दैवे वाँधे जते
` भ
भ्राम्यन्ते भानवा रक्तयुद्विगरन्तः पुनः पुनः। | ॥२२॥ उन भयुष्योकि धृमते-धूमते खधिर „ -~. ^ _ तैः ( लगता है, श्रो से उनद्ध सुखं चीडाया जाता ~ दुःखानि ते पराप्नुवन्ति यान्यसद्यानि जन्तुभिः। | उन जीवों दवारा जो श्रखह्य दुःख द वे भोगे जति
सिपत्रयनं नाम नरकं शरण चापरम् ॥२४॥| ६ । अव श्रसिप्न वन नामक न्य नरक का ९.६
व = __ „~, `| खनये ॥ २४॥ सहस्र योजन जिसका विस्तार दै, योजनानां सस्र व । | शरीर जिसकी थ्व. से मजवसितदै रौर. तपाः सूस्यकरशण्डयः सुदारुणः ॥२५॥| भरचरड खयं की किरण से दारुण ह ॥२५॥ ध भपत्म्ति सदा तत्र प्राणिनो नरकौकसः. | लोग सदा पेसे नरक मे गि जते. दे ्रोर-उ्
- ७: 3 + ६॥ के मध्य मे जो वन है उसमे पत्ते.तलवार की. `. न्पध्ये परिभाव्यते | ५ ५ १५ तलवास {1 ५9. तन्मध्ये च बनं रस्यं स्तिश्धपत्रं 8 ॥२ तेद ह ॥ २६। द द्विजसखचम ¡ बा तस
पत्राणि तत्र सङ्गानां फलानि दिनसत्तम । | पते श्नौर फल है रर बह बड़े-बड़े बलेवाम् छतत. ` एेवानश्च तत्र सवलाः स्यनन्त्यधुतशोभिताः ॥२७॥ शुरुड ॐ गुड, भृकते रहते है ॥ २७॥ जो बडे : . .
महावक्त्रा महाद्रा व्याघ्रा हव भयानकाः । | वाले दै श्र जिते डे न द ५ लोग्य शिशिरच्छायमग्रतः समान भयानक ह । उस वनकी छाया को + . ततस्तदनमालोक्य , शिभिरच्चायमप्रतः ॥२८।| गीत 0 वी
. :पयान्ति भाणिनस्ततर .तीनददपरिीडिताः । | प्रास -से दुःखित शोकर शा भाता ! हापिता!
हा मातहां वात इति कन्दन्तेऽतीव दुःखिताः ९६॥॥ श्रादि कहकर विलाप करते हए अति दुःखी द्: | ` है ॥२६॥ अग्नि से भूमि के जलती रढने के कारण
दह्यमानादिश्ुगला धरणीस्थेन वहिन । ` प
हे ९ ॥ । ९ भ जलते ने 91
तेषं गतानां तत्रासिपन्रपाती समीरण; ॥२०॥ वय र जलवे 41 तथा र व ५० ~“ „^, | वारो की तरह चोड लगती दे. ॥.२०॥ पत्ता % ।
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प्रवाति तेन पात्यन्ते तेषां खदंगान्थोपरि ।. | ऊपर से गिरना तलवास की तर्द दोतादै, ५. `
ततः पतन्ति ते भूमौ ` स्लत्पावकसश्चये ॥२१॥ चे पृथ्यीःपर अग्नि के देर की तरं निरते है ॥२१
` ई मकरेण ४ अ ----------------------------------------------~
व्यप्ासेषमदीतले | जीवो जिह्वा चाहर निकल श्राने के कारण घे सेलिदमान 99 क पृथी को चायते से मालुम होते दै, कत्ते शीष सारमेयास्ततः शीघधर' शातयन्ति शरीरतः ॥२२॥| दी उनके शीर से लिपट जाते द ॥२२॥ उनके तेषासङ्कानि सूदतामनेकान्यतिभीषणाः ! | च्ञ री यद दशा दने के कारण वे रोते 1 हे
असिं चैतत कर्षित तात ! श्रसिपत्र वन का हाल मैने तुमसे वयान घनं तात सयेतत् कीरिं तव ॥२२॥| किया ॥ ३३ ॥ श्रव उससे भौ परम भीषर तकु.
अतः प्रं भीमतरं त्कृम्पं निवोध मे) नामक्त नरक का हाल सुनिये । तङ्घम्भ फे चासो समन्ततस्तपषकुम्भा वदहिस्बालासमादृताः ।॥२४॥ त श की त है ॥ ३४ व र
व्वलदम्निचयोदृ््तैलायशर्णपूरिता पपरिताः इर ग्नि, गमं तेल श्रौर वाल् से पूणं है 1 । ल्वलदग्नि त = दमोयखाः नीचे सुख किये हए पापकर्म मचप्योँ को यमदूत तेषु दुष्कृतकम्पांणो याम्यः खधामुसाः ।२५॥| फक देते द ॥ २५॥ वहां उनके शरीर के शरक का क्षाथ्यन्ते विस्फुराद्वाच-गलन्सनज्जनलाविलाः । | क्वाय बन जाता है ओर शरीरं गत मन्वा श्रीर
विभीपरैः जल जलता है 1 उनके कपाल, नेच श्रौर श्स्थियों स्ुरकपाललनरास्थ च्छियमाना २॥२९॥ को बड़े-बड़े भयानक ॥ ३६ ॥ गिद्ध उपाड़कर छोड़
शैरत्याव्य सुच्यन्ते पुनस्तेष्वेव वेगितैः । देते हैँ फिर उनको उसी दशा मे करके यमदूत पुकःसिमपिमायन्ते तैलनैक्यं वरजन्ति च ॥२७]/ लोग उन खौलते तेल मे डाल देते हँ ॥ ३७॥ स गतैः सिरोगव-लादूःयोर-लगसिभिः । ` से उनका शिर, गात्र, स्नायु, मांस, त्वचा श्रीर तेः -त्वगस्थिमिः । | शस्यया दरवीमूत हो जाती दै 1 फिर यमदूत लोग ततो याम्यैनरराशच दव्न्यां धषटनषष्िताः ॥३८॥॥ दाथ मे शवा लेकर उनको उलट-पलट करते है ॥
ते भहा । | इसी धकार खोलते हप तेल के वत्तकुम्भमें पापियों कृतावतते महातेले मध्यन्ते पापकस्मिणः । क्ते मथते है 1 हे पिता } यह भेन श्रापसे त्षकुम्म